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‘वोक’ संस्कृति, वैचारिक सबवर्शन और भारतीय समाज पर गहरा खतरा

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‘वोक’ संस्कृति, वैचारिक सबवर्शन और भारतीय समाज पर गहरा खतरा


कैलाश चन्द्र

वर्तमान समय में भारतीय समाज एक ऐसे वैचारिक दौर से गुजर रहा है, जिसमें संस्कृति, परिवार, नैतिकता और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े प्रश्न नए रूप में सामने आ रहे हैं। भोपाल फिल्म फेस्टिवल को लेकर उठा विवाद किसी आयोजन की सामान्य नीति समीक्षा का विषय न होकर यह भारतीय समाज की वैचारिक दिशा और सांस्कृतिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। जिस आयोजन का सह-प्रस्तुतिकरण मध्यप्रदेश पर्यटन जैसे सरकारी संस्थान ने किया, वही मंच उन फिल्मों और व्यक्तियों को प्रदान करता दिखाई दिया, जो लंबे समय से भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के विरोध में विचार अभियान चलाते रहे हैं। यह परिस्थिति संकेत देती है कि सांस्कृतिक क्षेत्र में एक सुनियोजित वैचारिक प्रवाह सक्रिय है, जिसका लक्ष्य समाज की पारंपरिक संरचनाओं को बदलना है।

पिछले वर्षों में ‘वोक’ और ‘प्रगतिशील’ जैसे आकर्षक शब्दों की आड़ में ऐसे कार्यक्रमों की संख्या बढ़ी है, जिनका उद्देश्य धीरे-धीरे सामाजिक मान्यताओं को परिवर्तित करना और नई मानसिकता को सामान्य बनाना है। इन आयोजनों में प्रस्तुत फिल्मों की विषयवस्तु पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होता है कि कथा और कला के माध्यम से वैचारिक संदेश स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। उदाहरणस्वरूप ‘किस’ (२०२२) और ‘कुचुर (द इच)’ जैसी फिल्मों की मूल थीम समलैंगिकता, किशोर मनोविज्ञान और आनंद की अवधारणा को एक विशेष दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। इन फिल्मों के माध्यम से ऐसे विषयों को केंद्र में रखा गया है, जो भारतीय पारिवारिक और सामाजिक संरचना में संवेदनशील माने जाते हैं।

निर्देशक वरुण ग्रोवर जैसे व्यक्तित्व, जो लंबे समय से वामपंथी विचारधारा के समर्थक माने जाते हैं और सरकार, भारतीय जनता पार्टी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर खुली टिप्पणियों के लिए चर्चित रहे हैं, ऐसे आयोजनों में प्रमुख स्थान प्राप्त करते हैं। तब स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या करदाताओं के धन का उपयोग उन कार्यक्रमों के लिए किया जाना उचित है, जो भारतीय समाज की परंपरागत मान्यताओं और राष्ट्रवादी विमर्श की आलोचना को प्रोत्साहित करते हों। यह प्रश्न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरोध का नहीं, बल्कि राज्य की वैचारिक तटस्थता और सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का है।

वोक विचारधारा को यदि गहराई से समझा जाए तो यह महज सामाजिक जागरूकता का आंदोलन नहीं प्रतीत होती, सांस्कृतिक मार्क्सवाद की आधुनिक अभिव्यक्ति के रूप में उभरती है। इसका लक्ष्य समाज की पारंपरिक इकाइयों जैसे परिवार, धर्म, संस्कृति, स्त्री-पुरुष संबंध और नैतिक अनुशासन को पुनर्परिभाषित करना है। इस विचारधारा में व्यक्ति को सामूहिकता से ऊपर रखा जाता है, इच्छा को मर्यादा से अधिक महत्व दिया जाता है और आनंद को जीवन का मूल मूल्य घोषित किया जाता है। फिल्में और दृश्य माध्यम इस दिशा में अत्यंत प्रभावी साधन बन जाते हैं, क्योंकि वे भावनाओं, कथानक और कला के आवरण में विचारों को सहज रूप से स्थापित कर देते हैं।

किशोरावस्था जीवन का अत्यंत संवेदनशील चरण है। इस आयु में प्रस्तुत कथाएँ और दृश्य लंबे समय तक मानसिक संरचना को प्रभावित करते हैं। यदि फिल्मों में किशोर पात्रों के माध्यम से समलैंगिक संबंधों या शारीरिक आनंद को केंद्रीय विषय बनाया जाए, तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव दूरगामी हो सकता है। ‘किस’ (२०२२) में दो किशोर लड़कों के बीच चुंबन को कथा का केंद्र बनाना और ‘कुचुर (द इच)’ में किशोरी के शारीरिक अनुभवों को सामान्य प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करना कला की अभिव्यक्ति से आगे बढ़कर सामाजिक दिशा निर्धारण का प्रयास प्रतीत होता है। प्रश्न यह है कि क्या इन विषयों का प्रस्तुतीकरण मार्गदर्शन के उद्देश्य से है या प्रयोगवाद को प्रोत्साहन देने के लिए।

भारतीय चिंतन में कामना और संबंधों को सदैव जिम्मेदारी, संयम और सामाजिक संतुलन के साथ जोड़ा गया है। यहां स्वतंत्रता का अर्थ उच्छृंखलता नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण और कर्तव्यबोध से जुड़ा है। जब कला और अभिव्यक्ति के नाम पर किशोर जिज्ञासाओं को उन्मुक्त प्रयोग का क्षेत्र बना दिया जाता है, तब वह परंपरागत नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगाने के साथ-साथ भावनात्मक विकास को भी प्रभावित करता है। परिवार और संस्कार को दमनकारी संरचना के रूप में प्रस्तुत करना व्यक्ति को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से दूर ले जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे सामाजिक संतुलन को विचलित करती है और व्यक्तिवाद को बढ़ावा देती है।

मीडिया का एक वर्ग ऐसे आयोजनों को मानवाधिकार और प्रगतिशीलता का प्रतीक बताता है। राष्ट्रीय दृष्टिकोण यह पूछता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या है ? क्या स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक अराजकता है ?क्या कला का दायित्व समाज निर्माण है या विघटन ?विमर्श को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है मानो परंपरा समर्थक वर्ग अभिव्यक्ति का विरोध कर रहा हो, जबकि वास्तविकता में संघर्ष दो विचारधाराओं के बीच है। एक ओर हजारों वर्षों की सभ्यता से निर्मित सांस्कृतिक संरचना है, दूसरी ओर पश्चिम प्रेरित प्रयोगवादी प्रवृत्तियां।

यह विषय किसी एक फिल्म फेस्टिवल तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियां किस मानसिकता के साथ विकसित होंगी, परिवार संस्था का भविष्य क्या होगा और समाज मर्यादाओं को कितना महत्व देगा। यदि विश्वविद्यालय, चिकित्सा महाविद्यालय, पर्यटन विभाग और अन्य सरकारी संस्थान भी वैचारिक प्रयोगों के मंच बन जाएँ, तब यह सांस्कृतिक सुरक्षा का विषय बन जाता है। राज्य की भूमिका तटस्थ संरक्षक की होनी चाहिए, न कि किसी एक विचारधारा के संवाहक की।

भोपाल फिल्म फेस्टिवल एक उदाहरण के रूप में सामने आया है, जो दर्शाता है कि किस प्रकार वोक एजेंडा कलात्मक आवरण और मीडिया समर्थन के सहारे समाज में स्थान बनाने का प्रयास करता है। भारत हजारों वर्षों की सांस्कृतिक परंपरा वाला राष्ट्र है, जिसने अनेक वैचारिक आक्रमणों का सामना किया है। इस दृढ़ता को बनाए रखने के लिए समाज को सजग रहना होगा। कला को वैचारिक हथियार बनने से रोकना, करदाताओं के धन का उत्तरदायी उपयोग सुनिश्चित करना और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना समय की मांग है।

भारत को अपनी आत्मा के साथ आगे बढ़ना है। भावी पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि समाज सजग, संगठित और वैचारिक रूप से स्पष्ट रहे। जब जनमानस अपने सांस्कृतिक दायित्व को समझेगा और जागृत चेतना के साथ आगे आएगा, तभी राष्ट्र अपनी मूल पहचान को सुरक्षित रखते हुए प्रगति की दिशा में संतुलित कदम बढ़ा सकेगा। यही सांस्कृतिक आत्मरक्षा का मार्ग है और यही भारतीय समाज की दीर्घकालिक स्थिरता की आधारशिला है।

(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्तम्भकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी