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रूपये की लेन-देन में यूपीआई को मुफ्त रखने की जरूरत

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रूपये की लेन-देन में यूपीआई को मुफ्त रखने की जरूरत


डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी

भारत ने पिछले एक दशक में जिस डिजिटल बदलाव को सबसे तेजी से अपनाया है, उसमें यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है। कभी डिजिटल भुगतान बड़े शहर, कॉरपोरेट संस्थान और ऑनलाइन कारोबारों तक सीमित माना जाता था लेकिन आज रेहड़ी-पटरी वाले दुकानदार से लेकर बड़े मॉल, छोटे कारोबारी से लेकर आम उपभोक्ता तक यूपीआई रोजमर्रा की आर्थिक जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान पर दस रुपये का भुगतान हो या लाखों रुपया का कारोबारी लेनदेन, मोबाइल से भुगतान अब सामान्य व्यवहार बन गया है।

इसी बीच 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने जा रहे मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) से जुड़े नए नियमों को लेकर बहस तेज हो गई है। इस बदलाव को केवल भुगतान प्रणाली से जुड़ा तकनीकी विषय मानना उचित नहीं होगा। इसका सीधा संबंध देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था, छोटे व्यापारी, उपभोक्ता और सरकार के राजस्व से है। इसलिए इससे पैदा हो रही आशंकाओं को सरकार को गंभीरता से समझने की जरूरत है। यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि इसने डिजिटल भुगतान को सरल, तेज और आम लोगों के लिए लगभग सहज बना दिया। खासकर छोटे व्यापारियों के लिए यूपीआई ने नकदी रखने, खुले पैसे की समस्या और बैंकिंग लेन-देन की कई व्यावहारिक कठिनाइयों को कम किया। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि देश के उस असंगठित कारोबार का बड़ा हिस्सा भी डिजिटल वित्तीय व्यवस्था से जुड़ने लगा, जो लंबे समय तक नकदी आधारित अर्थव्यवस्था का हिस्सा था।

यहीं से एमडीआर को लेकर मूल सवाल पैदा होता है। यदि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने से अर्थव्यवस्था अधिक पारदर्शी होती है, कारोबार का औपचारिककरण बढ़ता है और सरकार को कर संग्रह में मदद मिलती है तो इस व्यवस्था की लागत का बोझ आखिर किस पर डाला जाना चाहिए? लोगों का तर्क है कि देश की जनता पहले से ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का भारी बोझ उठा रही है, ऐसे में डिजिटल भुगतान जैसी बुनियादी वित्तीय सुविधा को अधिकतम संभव सीमा तक मुफ्त रखना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। यूपीआई केवल एक निजी व्यावसायिक सुविधा नहीं रह गयी है, यह देश की आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण सार्वजनिक डिजिटल ढांचा बन चुका है।

इसका दूसरा पहलू नकदी प्रबंधन से जुड़ा है। नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को संचालित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक को नोटों की छपाई, सिक्कों की ढलाई, पुराने और खराब नोटों को वापस लेने तथा उन्हें नष्ट करने, करेंसी की सुरक्षा और परिवहन जैसी व्यवस्थाओं पर बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। डिजिटल भुगतान के विस्तार से नकदी पर निर्भरता कम होती है तो इसका अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ भी सरकार और पूरे वित्तीय तंत्र को मिलता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि डिजिटल भुगतान से होने वाली व्यापक आर्थिक बचत का कुछ हिस्सा डिजिटल भुगतान प्रणाली को सस्ता और सुगम बनाए रखने में क्यों नहीं लगाया जा सकता?

यूपीआई का एक और महत्वपूर्ण लाभ आर्थिक पारदर्शिता है। डिजिटल लेन-देन से कारोबार का रिकॉर्ड बनता है और आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा औपचारिक वित्तीय व्यवस्था में आता है। इसका असर कर अनुपालन और सरकारी राजस्व पर भी पड़ता है। जीएसटी संग्रह का लगातार ऊंचे स्तर पर पहुंचना अर्थव्यवस्था के औपचारिककरण और डिजिटल लेन-देन के विस्तार से जुड़े व्यापक बदलाव की ओर संकेत करता है इसलिए यह तर्क महत्वपूर्ण है कि जिस डिजिटल ढांचा से सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से राजस्व और पारदर्शिता का लाभ मिल रहा है, उसके संचालन की लागत का पूरा बोझ व्यापारी या उपभोक्ता पर डालना आर्थिक रूप से पुनर्विचार योग्य विषय है।

सबसे बड़ा खतरा छोटे कारोबारी और उपभोक्ताओं के व्यवहार में बदलाव का हो सकता है, यदि व्यापारी एमडीआर की लागत से बचने के लिए नकद भुगतान पर छूट देने लगते हैं और डिजिटल भुगतान पर अतिरिक्त राशि मांगने लगते हैं तो उपभोक्ता फिर से नकदी की ओर लौट सकते हैं, ऐसा हुआ तो पिछले एक दशक में विकसित डिजिटल भुगतान की आदत को झटका लग सकता है। यूपीआई की सफलता का आधार ही उसकी सरलता और कम लागत रही है।

आंकड़ों की दृष्टि से भी यूपीआई की भूमिका अब सामान्य भुगतान माध्यम से कहीं आगे निकल चुकी है। वर्ष 2026 में जनवरी से सितंबर के बीच डिजिटल भुगतान नेटवर्क द्वारा 205.24 अरब लेन-देन प्रोसेस किये जाने का दावा इसकी विशाल पहुंच को दर्शाता है। इतनी बड़ी संख्या में होने वाले लेन-देन के बीच मामूली शुल्क भी यदि व्यापक रूप से लागू होता है तो उसका संचयी प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती केवल एमडीआर की दर तय करने की नहीं बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य की दिशा तय करने की है। व्यापारी और उपभोक्ता दोनों चाहते हैं कि भुगतान व्यवस्था सरल और सस्ती रहे। सरकार का हित भी इसी में है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार जारी रखे।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी