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पश्चिम बंगाल में नई सरकार की अनिवार्यता का विमर्श

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पश्चिम बंगाल में नई सरकार की अनिवार्यता का विमर्श


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से एक व्यापक सामाजिक, वैचारिक और लोकतांत्रिक संघर्ष का मंच रही है। इस बार भी 2026 के विधानसभा चुनाव इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एक निर्णायक मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। अब यह चुनाव ही तय करेगा कि राज्य में लोकतंत्र की गुणवत्ता, जवाबदेही और संस्थागत मजबूती किस दिशा में आगे बढ़ेगी। ऐसे परिदृश्य में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार का मूल्यांकन करना अनिवार्य हो जाता है।

दरअसल, पिछले एक दशक में ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण देखने को मिला है। 2011 में परिवर्तन की उम्मीदों के साथ सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस ने शुरुआत में जनसमर्थन अर्जित किया, लेकिन समय के साथ यह शासन शैली एक व्यक्ति-केन्द्रित प्रशासन में बदलती चली गई। प्रशासनिक निर्णयों में संस्थाओं की भूमिका सीमित होती गई और राजनीतिक व प्रशासनिक तंत्र के बीच की दूरी कम होकर पक्षपातपूर्ण होते हुए दिखी। हालांकि ममता का राज इसी विश्वास पर बहाल हुआ था कि पश्चिम बंगाल से अराजकता की समाप्ति होगी, बांग्लादेश से होनेवाली घुसपैठ रुकेगी और हिंसा बंद होकर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। पर हकीकत में क्या हुआ?

यही कि वादों के अनुरूप ममता सरकार कुछ नहीं कर पाई, उल्टा यह सामने आया कि संस्थाओं की स्वतंत्रता और जवाबदेही समाप्त हो गई। ममता सरकार अपनी हर आलोचना को दबाने लगी। विपक्ष को हाशिए पर धकेल दिया गया और प्रशासनिक मशीनरी को राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। स्वभाविक है कि सभी संकेत लोकतंत्र के लिए खतरे के हैं। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार सवालों के घेरे में है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुआ जघन्य अपराध हम सभी ने देखा, कैसे एक प्रशासनिक संवेदनहीनता और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बन कर सामने आया है। ऐसे मामलों में सरकार की प्रतिक्रिया ने यह संदेश दिया कि ममता सरकार जनता की सुरक्षा से अधिक अपनी छवि बचाने में रुचि रखती है।

इसके अतिरिक्त, राजनीतिक हिंसा की घटनाएं, जोकि बंगाल की राजनीति का एक पुराना दाग रही हैं, अब भी समाप्त नहीं हुई हैं, बल्कि कहना चाहिए ममता राज आने के बाद इसमें बढ़ोत्तरी ही हुई है। चुनावी प्रक्रिया में हिंसा, विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमले और मतदाताओं को डराने-धमकाने के आरोप लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करते हैं।किंतु इस बात की फिकर किसे है! ममता का अपना अब तक फिक्स हो चुका वोट का चुनावी गणित है। इसलिए ही ममता सरकार की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक उसकी वोट बैंक आधारित राजनीति रही है।

यहां उल्लेखित है कि राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 28-29 फीसद है और लंबे समय तक एकमुश्त वोटिंग के कारण यह एक निर्णायक राजनीतिक कारक बनी रही है। कहना चाहिए कि तृणमूल कांग्रेस ने इस समीकरण को कुशलता से साध रखा है, किंतु इसके परिणामस्वरूप नीति-निर्माण में संतुलन की कमी दिखाई देती है, राज्य का जो समग्रता के साथ विकास होना चाहिए, वह जैसे अब भी इस राज्य के लिए एक स्वप्न जैसा है। पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक मुस्लिम विशेषकर बहुसंख्यक हिन्दुओं पर हावी दिखता है। इस प्रकार की राजनीति ने समाज में विभाजन की भावना को जन्म दिया है, जिसमें कि एक ओर जहां लगातार ममता सरकार पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के आरोप लगते हैं, वहीं दूसरी ओर बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय में असंतोष बढ़ा है। इसलिए यहां का अधिकांश बहुसंख्यक समाज सत्ता का बदलाव चाहता है।

इसका एक आधार फिर चुनावी आंकड़े भी हैं, जोकि इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। 2011 में 38.93 फीसद वोट से 184 सीटें, 2016 में 45 फीसद वोट से 211 सीटें और 2021 में 48 फीसद वोट से 213 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस अब नए राजनीतिक समीकरणों से जूझती दिख रही है। वस्तुत: 2023 के सागरदिघी उपचुनाव में कांग्रेस की अप्रत्याशित जीत और 2024 के लोकसभा चुनावों में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस का बढ़ता प्रभाव इस बात का संकेत है कि ममता बनर्जी का पारंपरिक वोट बैंक अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहा। इससे यह स्पष्ट होता है कि “एकमुश्त वोट” का पुराना गणित टूट रहा है।

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का पश्चिम बंगाल में तेजी से बढ़त बनाना भी ममता सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। 2014 में मात्र 17 फीसद वोट पाने वाली भाजपा ने 2019 में 41 प्रतिशत वोट और 18 सीटें हासिल की थीं। 2021 के विधानसभा चुनाव में 77 सीटों के साथ वह मुख्य विपक्ष बनकर उभरी। इसके अलावा, कांग्रेस-वाम गठबंधन भी अपनी खोई जमीन वापस पाने का प्रयास कर रहा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की “एकला चलो” रणनीति और वाम दलों का पुनर्गठन यह संकेत देता है कि बंगाल की राजनीति अब बहुकोणीय संघर्ष में बदल चुकी है। एक तरह से देखें तो यह प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है, क्योंकि यह सत्ता के एकाधिकार को चुनौती देती है।

इसके साथ ही जिस तरह से इस बार मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) का कार्य हुआ है और लगभग 58 लाख नामों का प्रारंभिक सूची से बाहर होना, यह बताता है कि अब तक जिस अवैध वोट बैंक के सहारे ममता की पार्टी राज्य की कई सीटों पर जीत दर्ज करती रही, इस बार वह चमात्कार करना आसान नहीं होगा। घुसपैठ और नागरिकता के प्रश्न पर सरकार का अस्पष्ट रुख भी यहां आम जन में आलोचना का विषय है। यह मुद्दा कहना होगा कि सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण से जुड़ा है।

ममता सरकार पर “प्रतीकात्मक हिंदुत्व” अपनाने के आरोप भी लगेते हैं, जैसे कि मंदिर उद्घाटन, दुर्गा पूजा को प्रोत्साहन आदि लेकिन आलोचकों का इस बारे में स्पष्ट मानना है कि ममता के द्वारा किए जाने वाले इस प्रकार के कार्य बांग्ला संस्कृति के लिए वास्तविक सांस्कृतिक पुनर्जागरण नहीं हैं, यह उनकी चुनावी रणनीति है। बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का वर्तमान राजनीतिक माहौल में लगातार क्षरण हो रहा है।

ऐसे में कहना यही होगा कि ममता बनर्जी का शासन, जोकि कभी परिवर्तन का प्रतीक था, अब कई मायनों में ठहराव, केंद्रीकरण और विवादों का पर्याय बन चुका है। हिंसा उसके केंद्र में है। अनेक बड़ी हिंसात्मक घटनाएं जैसे आज पश्चिम बंगाल की नीयति बन गई लगती हैं। स्वभाविक है इस संदर्भ में सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक स्वास्थ्य की आवश्यकता बन गया है। यदि जनता को लगता है कि शासन उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा, तो परिवर्तन ही लोकतंत्र का स्वाभाविक और आवश्यक परिणाम होता है।

2026 का चुनाव इसी परिवर्तन की संभावना का प्रतीक बनकर सामने दिखाई दे रहा है। यह चुनाव तय करेगा कि क्या बंगाल अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के अनुरूप एक अधिक जवाबदेह, समावेशी और संतुलित राजनीतिक व्यवस्था की ओर बढ़ेगा या फिर वर्तमान व्यवस्था के साथ आगे बढ़ेगा। आखिर, लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता है और उसे ही यहां तय करना है कि बंगाल का भविष्य किस दिशा में जाए!

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी