खून, खामोशी और खतरनाक मंसूबों का खेल
प्रणय विक्रम सिंह
यह दौर सिर्फ युद्ध का नहीं बल्कि वैश्विक पाखंड के बेनकाब होने का है। समय दुआओं का है लेकिन दुनिया बारूद और खामोशी के साये में खड़ी है। रमजान का महीना है। वो महीना, जिसमें रोज़े रखे जाते हैं, दुआएं मांगी जाती हैं, इफ़्तार की थालियों में उम्मीद सजती है लेकिन आज उसी वक्त ईरान और उससे जुड़े 22 मुल्कों की फिज़ा में दुआ नहीं, धुआं उठ रहा है। न कोई रोज़ा दिख रहा है, न इफ़्तार की रौनक, न सहरी की सादगी बस बारूद की बदबू है। और आसमान पर लाल रंग के सिवा कोई रंग नहीं।
हजारों घर ज़मीन में मिल चुके हैं, जिन चौखटों पर कभी दुआएं सजती थीं, वहां अब मातम पसरा है। बड़ी-बड़ी हस्तियां बेमौत मार दी गईं। लारिजानी, सुलेमानी और कहते हैं कि खामनेई सहित 56 शीर्ष नेता और कमांडर भी इस खामोश कत्लेआम की सूची में जोड़ दिए गए। यह दरअसल मौतों का सिलसिला भर नहीं बल्कि एक सभ्यता के आत्मविश्वास पर हुआ गहरा आघात है।
मोसाद की आंखें ईरान की दीवारों के भीतर तक उतर गई हैं। उसकी 'डीप पेनिट्रेशन स्ट्रेटेजी' ने ईरान की दीवारों को ही नहीं, उसकी व्यवस्था की जड़ों को भी हिला दिया। इंटेलिजेंस वॉरफेयर, इनसाइड नेटवर्क और टार्गेटेड एलिमिनेशन इन तीनों के त्रिकोण ने मिलकर यह साबित किया कि आधुनिक युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं, सिस्टम के भीतर लड़े जाते हैं। अपने ही घर के लोग अपने ही आसमान को निशाना बनवाने लगे, यह केवल जासूसी नहीं, बल्कि 'ट्रस्ट का टोटल ब्रेकडाउन' है।
अजीब वक्त है… न कोई मज़हब बचाने आया और जो 22 इस्लामिक मुल्क हैं वो भी जैसे खामोशी की चादर ओढ़े बैठे हैं। यहां तक कि जो गाज़ा की सड़कों को जाम कर देते थे, वे आज ईद की खरीदारी में मशगूल हैं, जैसे संवेदना भी अब 'सेलेक्टिव रिस्पॉन्स' बन चुकी हो।
ईरान का आसमान अमेरिका और इजराइल ने मिलकर रक्तरंजित कर दिया है। मोसाद ने चुन-चुन कर इतिहास की इस धरोहर को जख्मों का जखीरा बना दिया। इजराइल से तो दुश्मनी पुरानी है, पर अमेरिका…? उसे क्या मिला इस जंग से? शायद इसका उत्तर खुद ट्रंप भी नहीं जानते होंगे।
हां, एक सच है कि इतिहास गवाह है… हर युद्ध अपने साथ विजय से ज्यादा विनाश छोड़ता है। और यह भी तय है कि अमेरिका को इस जंग से यश नहीं, जलालत मिलेगी। अपने ही घर में सवाल उठेंगे, अपने ही लोग जवाब मांगेंगे। और जो 450 किलो यूरेनियम की चाह है वो ख्वाब ही रहेगा क्योंकि अगर ईरान ने बम नहीं बनाया तो उसने उसे कहीं और सुरक्षित कर दिया होगा... शायद रूस… शायद चीन।
डर एक था और वह सही भी था कि जिस दिन ईरान के पास परमाणु शक्ति आई, वह सीधे इज़राइल की ओर बढ़ेगी। और इज़राइल का अस्तित्व मिट सकता है। इस डर ने अमेरिका को युद्ध की ओर धकेला पर सवाल यह भी है कि पाकिस्तान के बमों पर यह खामोशी क्यों है…? क्या वे कभी ख़तरा नहीं बनेंगे…? या खतरे भी अब चयनित हो गए हैं…?
इसी परिप्रेक्ष्य में एक और घटना दिल दहला देती है। अभी 3 दिन पहले ही पाकिस्तान ने काबुल की राजधानी में एक अस्पताल को एयर स्ट्राइक में निशाना बनाया। जहां जीवन बचाने की कोशिश होती है, वहां मौत उतार दी गई। जहां दवाइयां होनी चाहिए थीं, वहां धुएं और चीखों का अंधकार फैल गया। 400 लोग मारे गए, 250 से अधिक घायल होकर तड़पते रह गए। पर इससे भी अधिक भयावह है उस त्रासदी पर पसरा सन्नाटा।
भारत में ईरान और गाज़ा के नाम पर सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने वाले लोग आज इस त्रासदी पर एक सुविधाजनक खामोशी ओढ़े हुए हैं। वैश्विक मंचों पर भी कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं। अमेरिका तो ऐसी चुप्पी साधे बैठा है जैसे इस हमले के बारे में वह जानता ही नहीं। यही वह क्षण है जब यह प्रश्न भीतर तक चीर देता है कि क्या निर्दोषों का रक्त भी अब 'जियोपॉलिटिकल इंटरेस्ट' के तराजू पर तौला जाने लगा है? क्या संवेदनाएं भी अब 'सेलेक्टिव सिम्पैथी' बन चुकी हैं?
दरअसल, युद्ध शुरू करना आसान होता है, पर उसे रोकना इतिहास के सबसे कठिन निर्णयों में से एक है। ऐसे समय में भारत जैसे राष्ट्र की नीति याद आती है जिसने 25 मिनट में दुश्मन के आतंकी ठिकाने ध्वस्त कर दिए, 11 एयरबेस उड़ा दिए और नूर खां के परमाणु भंडार तक ब्रह्मोस की आहट पहुंचा दी, बिना युद्ध को युद्ध बनाए।
दुनिया के बी-1 और बी-2 बॉम्बर जिन अभियानों को 'हाइपोथेटिकल प्लानिंग' में रखते हैं, उसका ट्रेलर भारत की धरती पर बनी एक स्वदेशी मिसाइल ने दिखा दिया। क्योंकि शक्ति का अर्थ केवल प्रहार नहीं प्रमाण भी होता है।
शायद यही फर्क है अहंकार और आचरण में, आक्रमण और आत्मसंयम में और युद्ध और नीति में। दुनिया को अब यह तय करना होगा कि उसे सत्ता, स्वार्थ और संघर्ष की लपटों में जलकर राख होना है या संतुलन, संयम और समझ की रोशनी में चलकर अपनी राह बनानी है। क्योंकि तलवारें जीत तो लेती हैं पर टिकती नहीं। सभ्यताएं वही जीवित रहती हैं, जो शक्ति नहीं, विवेक से दिशा चुनती हैं। जो लहू नहीं, लौ से अपना भविष्य रचती हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

