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वीबी-जी राम जी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करेगा मजबूत

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वीबी-जी राम जी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को करेगा मजबूत


डॉ.लोकेश कुमार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने ग्रामीण सशक्तीकरण को लेकर बड़ा कदम उठाया है, जो एक जुलाई, 2026 से पूरे देश में वीबी-जी राम जी के नाम से लागू होने जा रहा है। मनरेगा के स्थान पर विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ( वीबी-जी राम जी) योजना पूरे देश के ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर, समावेशी और सशक्त बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। गांवों से रोजगार की तलाश में शहरों में हो रहे पलायन को रोकने के लिए यह एक कारागार कदम है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने इस योजना में 95 हजार, 692 करोड़ रुपये का बजटीय आवंटन किया है, जो ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम के लिए अब तक का सर्वाधिक आवंटन राशि है। राज्यों के राज्यांश सहित इस कार्यक्रम का कुल परिव्यय 1.51 लाख करोड़ रुपए से अधिक होने का अनुमान है।

ग्रामीण क्षेत्र के ऐसे प्रत्येक पात्र परिवार को अब एक वित्तीय वर्ष में 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन का रोजगार देने की वैधानिक गारंटी प्रदान की गई है। पहले श्रमिकों को 15 दिन में भुगतान किया जाता था, अब साप्ताहिक भुगतान का प्रावधान किया गया है। भुगतान डीबीटी के माध्यम से सीधे बैंक अथवा डाकघर खातों में जाएगा, जिससे पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित होगी। वहीं, निर्धारित समय की अवधि में रोजगार उपलब्ध नहीं होने पर बेरोजगारी भत्ते और मजदूरी भुगतान में देरी होने पर क्षतिपूर्ति देना भी वैधानिक प्रावधान है। यह निर्णय ग्रामीण आय में वृद्धि और आजीविका सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। जिन मौजूदा मनरेगा जॉब कार्ड के लिए ई-केवाईसी की प्रक्रिया पूरी हो गई है, वे वीबी-जीरामजी अधिनियम, 2025 के प्रावधानों के अनुसार नए ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड जारी होने तक वैध बने रहेंगे।

यह मनरेगा का एक उन्नत और आधुनिक रूप है। यह ग्रामीण परिवारों को एक साल में 125 दिन के गारंटीकृत रोजगार और समय पर मजदूरी नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ते की कानूनी गारंटी देता है। ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिन तक के अकुशल शारीरिक काम करने की गारंटी दी जाती है। कृषि मौसम में 60 दिन की राहत प्रदान की गई। कृषि क्षेत्र में बुवाई और कटाई जैसे चरम समय के दौरान मजदूरों की कमी नहीं हो, इसलिए राज्य सरकारें 60 दिनों तक की अवधि की अग्रिम घोषणा करती हैं, जिनमें खेतों पर काम करने के लिए योजना के अंतर्गत काम रोक दिया जाता है। इसके अंतर्गत मुख्य रूप से जल सुरक्षा, ग्रामीण व आजीविका संबंधी अवसंरचना (बुनियादी ढांचे) और आपदा शमन से जुड़े कार्य किए जाते हैं।

पारदर्शिता और डिजिटल तकनीक के तहत ग्राम पंचायतें ही योजनाओं की पहचान कर उन्हें लागू करेगी। इसे डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, मोबाइल आधारित रिपोर्टिंग, रीयल-टाइम डैशबोर्ड) और सोशल ऑडिट के जरिए पारदर्शी बनाया गया है। यह योजना ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा को मजबूत करने का एक नया कानूनी ढांचा प्रदान किया है। विकसित भारत- जी राम जी विधेयक, 2025 विकसित भारत 2047 के साथ संयोजित एक नई सांविधिक संरचना के साथ मनरेगा का स्थान लेता है। ग्रामीण परिवार की आय सुरक्षा सुदृढ़ होगी।

मनरेगा दो दशकों से भारत की सामाजिक सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती की संरचना की आधारशिला रही है। 2005 में कार्यान्वित होने के बाद से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने रोजगार प्रदान करने, ग्रामीण आय को स्थिर करने और मूलभूत अवसंरचना निर्माण में अहम भूमिका निभाई है। समय के साथ, ग्रामीण भारत की संरचना और लक्ष्य में काफी बदलाव भी आ गए हैं। मोदी सरकार ने विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025, (जिसे विकसित भारत- जी राम जी विधेयक, 2025 भी कहा गया है) का प्रस्ताव रखा है। यह विधेयक मनरेगा में व्यापक वैधानिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो ग्रामीण रोजगार को विकसित भारत 2047 के दीर्घकालिक विजन के साथ संयोजित करता है और जवाबदेही, बुनियादी ढांचे के परिणामों और आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।

देश की आजादी के बाद से ग्रामीण विकास की नीतियों का प्रमुख विषय निर्धनता कम करने, खेती की पैदावार को बेहतर बनाने और अधिशेष और कम काम वाले ग्रामीण मजदूरों के लिए रोजगार करने का सृजन रहा है। मजदूरी वाले रोजगार कार्यक्रम धीरे-धीरे ग्रामीण रोजगार की सहायता करने के मुख्य माध्यम बन गए हैं। सबसे पहले ग्रामीण श्रमबल कार्यक्रम (1960 का दशक) और ग्रामीण रोजगार के लिए क्रैश स्कीम (1971) जैसे आरम्भिक कार्यक्रमों के साथ भारत के मजदूरी रोजगार पहलों की विविध चरणों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रगति हुई। इनके बाद 1980 और 1990 के दशक में अधिक संरचित प्रयास किए गए, जिसमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम को शामिल किया गया। इस योजना को बाद में जवाहर रोजगार योजना (1993) में विलय कर दिया गया। 1999 में यह सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना में संघटित हो गई, जिसका उद्देश्य कवरेज और समन्वय में सुधार करना था। रोजगार आश्वासन योजना और काम के बदले अनाज कार्यक्रम जैसी पूरक योजनाओं ने मौसमी बेरोजगारी और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान देकर एक ग्रामीण बेरोजगारी के कुछ दंश को शांत करने में मददगार साबित हुई। 1977 के महाराष्ट्र रोजगार गारंटी अधिनियम के साथ एक बड़ा बदलाव आया, जिसने काम करने के वैधानिक अधिकार की अवधारणा प्रस्तुत की गई । इनके अनुभवों के आधार पर सन 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का जन्म हुआ।

इस गारंटी योजना में बिना कौशल वाले काम करने को तैयार गांव के परिवारों को प्रति वर्ष कम से कम 100 दिन की गारंटी वाला काम देकर रोजी-रोटी की सुरक्षा बढ़ाना था। वित्त वर्ष 2013-14 और वित्त वर्ष 2025-26 के बीच महिलाओं की सहभागिता 48 प्रतिशत से धीरे-धीरे बढ़कर 58.15 प्रतिशत हो गई। कई राज्यों में निगरानी से पता चला कि जमीनी स्तर पर काम प्राप्त नहीं हो रहा था, व्यय वास्तविक प्रगति से मेल नहीं खा रहा था, श्रम केन्द्रित कार्यों में मशीनों का बहुत आयात में इस्तेमाल हो रहा था। महामारी के बाद के समय में केवल कुछ ही परिवार पूरे सौ दिन का काम पूरा कर पाए। इन रुझानों से पता चला कि डिलीवरी प्रणाली में तो सुधार हुआ, लेकिन मनरेगा का पूरा ढांचा लगभग चरमरा चुका था।

बहरहाल, हम यही कह सकते हैं कि यह गारंटीकृत रोजगार का विस्तार करके, राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं और कार्यों के बीच तालमेल बिठाकर मजबूत डिजिटल शासन को शामिल करके, यह कानून ग्रामीण रोजगार को सतत विकास और यथोचित आजीविका के लिए एक कार्यनीतिक साधन के रूप में स्थापित करता है, जो पूरी तरह से विकसित भारत 2047 के विजन पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / ईश्वर