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हाशिए पर वन्देमातरम्, धिक्कार है ऐसी लाचारी, पहले केरलम् और अब कर्नाटक!

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हाशिए पर वन्देमातरम्, धिक्कार है ऐसी लाचारी, पहले केरलम् और अब कर्नाटक!


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

क्या कोई संप्रभु राष्ट्र अपनी ही राष्ट्रीय चेतना के सबसे प्रखर उद्घोष को राजनीतिक सौदेबाजी, सरकारी निर्णयों और वोटबैंक की संकीर्ण गणनाओं के बीच दम तोड़ने के लिए छोड़ सकता है? यह प्रश्न आज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वन्देमातरम् उस भारत की आवाज है, जिसके लिए असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला यह उद्घोष ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में करोड़ों भारतीयों के भीतर स्वाधीनता की चेतना जगाने वाला मंत्र बना था।

जिस वन्देमातरम् को सुनकर स्वतंत्रता सेनानी फांसी के फंदे तक मुस्कराते हुए पहुंचे, आज उसी के स्वर को राजनीतिक सुविधा के अनुसार छोटा करने की बहस खड़ी हो गई है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि राष्ट्र की भावनाओं से जुड़े प्रतीकों को भी चुनावी गणित की कसौटी पर तौला जाने लगे?

केरलम् में वन्देमातरम् को लेकर विवाद नया नहीं है। विधानसभा के उद्घाटन सत्र में पुलिस बैंड द्वारा राष्ट्रगीत को पूरा न बजाए जाने पर राज्यपाल की आपत्ति सामने आई। स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में भी इसके गायन को लेकर राजनीतिक विवाद उठे। कांग्रेस सांसद राजमोहन उन्नीथन ने तो यह तक कहा कि केरलम् में वन्देमातरम् का पूरा संस्करण नहीं गाया जाएगा और राज्य अपनी पुरानी परंपरा पर कायम रहेगा।

सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो ने भी विवाद को और तीखा किया, जिसमें कांग्रेस-नीत गठबंधन के कुछ नेता वन्देमातरम् के गायन के दौरान बैठे दिखाई दिए। भाजपा ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताते हुए कांग्रेस पर जमात-ए-इस्लामी और मुस्लिम लीग जैसी ताकतों के दबाव में आने का आरोप लगाया। अब यही विवाद कर्नाटक पहुंच गया है।

मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार ने स्पष्ट किया है कि उनकी सरकार सार्वजनिक और सरकारी कार्यक्रमों में वन्देमातरम् के पहले दो अंतरे ही गाने की कांग्रेस की नीति पर कायम रहेगी। उनका कहना है कि स्वतंत्रता दिवस पर उनकी जानकारी के बिना सभी छह अंतरे गाए गए, पर भविष्य में ऐसा नहीं होगा। यहीं से सवाल उठता है कि क्या राष्ट्रगीत भी राजनीतिक दलों के निर्णय का विषय हो सकता है?

कर्नाटक में मंत्री प्रियांक खरगे की प्रतिक्रिया और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप ने इस विवाद को और राजनीतिक बना दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस रुख को राष्ट्रगीत को सीमित करने वाला निर्णय बताते हुए इसे वोटबैंक की राजनीति से जोड़ा है। भाजपा विधायक डी. वेदव्यास कामथ और नेता आर. अशोक ने भी कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया है, किंतु असली प्रश्न इससे कहीं बड़ा है।

प्रश्न कांग्रेस या भाजपा का नहीं, भारत की राष्ट्रीय चेतना का है। यदि किसी राजनीतिक दल को किसी समुदाय की भावनाओं के कारण राष्ट्रगीत के स्वरूप में परिवर्तन करना उचित लगता है, तो कल राष्ट्रीय प्रतीकों के दूसरे प्रश्नों पर भी ऐसी ही राजनीतिक सौदेबाजी की शुरुआत हो सकती है? क्या यह किसी को नहीं पता कि भारत विविधताओं का देश है? बेशक; हर नागरिक की धार्मिक और सांस्कृतिक आस्थाओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान! उनका क्या?

यहां ध्यान रहे, किसी नागरिक को वन्देमातरम् के अर्थ या उसके धार्मिक संदर्भ को लेकर वैचारिक आपत्ति हो सकती है, पर उसका समाधान राष्ट्रभावना को राजनीतिक दबाव के सामने झुका देना नहीं हो सकता। यह तर्क भी विचारणीय है कि वन्देमातरम् में मातृभूमि की तुलना दुर्गा या लक्ष्मी जैसी देवियों से की गई है, इसलिए कुछ लोग इसके पूरे स्वरूप को स्वीकार नहीं करते। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अनेक मुस्लिम नेता भी राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा रहे और वन्देमातरम् उस दौर में व्यापक स्वतंत्रता चेतना का उद्घोष बना, इसलिए इस पूरे प्रश्न को आज के संकीर्ण राजनीतिक चश्मे से देखना इतिहास के साथ न्याय नहीं अन्याय है।

वरिष्ठ अधिवक्ता एसवी श्रीनिवास का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्या राजनीतिक गणनाओं को यह तय करने दिया जा सकता है कि राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान किस प्रकार किया जाए? वन्देमातरम् चुनावी राजनीति का सौदेबाजी का मोहरा नहीं हो सकता। यह भारत की राष्ट्रीय चेतना की ऐतिहासिक अभिव्यक्ति है।वरिष्ठ अधिवक्ता आशुतोष कुमार झा ने केंद्र और राज्यों के संवैधानिक संबंधों की ओर ध्यान दिलाया है। भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है। संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है। संविधान के भाग 11 में केंद्र और राज्यों के विधायी तथा प्रशासनिक संबंधों की व्यवस्था की गई है।

इसी तरह से सातवीं अनुसूची के अंतर्गत संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से शक्तियों का विभाजन किया गया है, इसलिए यदि केंद्र ने राष्ट्रगीत के संबंध में कोई वैधानिक या प्रशासनिक व्यवस्था निर्धारित की है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि राज्य सरकारें उसके साथ किस सीमा तक और किस प्रकार चलेंगी। संघीय व्यवस्था का अर्थ टकराव नहीं, संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर सहयोग है।

आज सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि वन्देमातरम् को कांग्रेस बनाम भाजपा के विवाद में कैद न किया जाए। इसे किसी सरकार, दल या समुदाय की संपत्ति बनाने का प्रयास भी उचित नहीं होगा। यह उन पीढ़ियों की विरासत है जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान किसी व्यक्ति की पार्टीगत निष्ठा या मजहब या रिलीजन की संकीर्ण सोच से तय नहीं होना चाहिए। सरकारें आती-जाती हैं, राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, चुनाव परिणाम बदलते हैं, पर राष्ट्र की गरिमा स्थायी होती है।

केरलम् से कर्नाटक तक उठता यह विवाद इसलिए गंभीर है कि यह हमें चेताता है, यदि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को भी वोटबैंक की राजनीति के हवाले कर दिया गया, तो राष्ट्रभावना धीरे-धीरे राजनीतिक सुविधा की कैदी बन जाएगी। तुष्टिकरण की राजनीति की सीमा वहीं समाप्त होनी चाहिए, जहां राष्ट्र का सम्मान शुरू होता है। असहमति का अधिकार लोकतंत्र की शक्ति है, मगर राष्ट्र के गौरव के साथ समझौता लोकतंत्र की मजबूरी नहीं हो सकता।

आज आवश्यकता किसी राजनीतिक दल को नीचा दिखाने के स्थान पर उस मानसिकता को हराने की है जो राष्ट्रभावना को चुनावी गणित से छोटा समझती है। वन्देमातरम् को हाशिए से उठाकर उसके उचित राष्ट्रीय सम्मान के स्थान पर प्रतिष्ठित करना हम सभी का सामुहिक दायित्व है, क्योंकि जिस दिन किसी राष्ट्र को अपनी मातृभूमि का जयघोष करने में भी राजनीतिक अनुमति की आवश्यकता महसूस होने लगे, उसी दिन से राष्ट्र का स्वाभिमान कमजोर होने लगता है। ऐसे में हम सभी को प्रयासपूर्वक वन्देमातरम् का स्वर ऊंचा रखना होगा।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी