आखिर, मोदी सरकार ने सोनिया-राहुल से “वन्दे मातरम्” का पूरा गान करवा ही लिया !
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में भाव भंगिमाओं के आधार पर व्यक्ति के व्यवहार से उसके आचरण को अभिव्यक्त किया है। वे लिखते हैं, रस की निष्पत्ति (उत्पत्ति) भावों के बिना संभव नहीं है और भावों की अभिव्यक्ति शारीरिक चेष्टाओं यानी भंगिमाओं के माध्यम से ही होती है। “न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः।”(नाट्यशास्त्र, अध्याय 6, श्लोक 85)
इसका अर्थ यह है कि भाव के बिना रस की उत्पत्ति नहीं हो सकती और रस के बिना भाव का कोई अस्तित्व नहीं है। अब इन भावों का एक दृष्य 15 अगस्त के दिन कांग्रेस मुख्यालय में “वंदे मातरम” गायन के दौरान राहुल, खड़गे और सोनिया गांधी के इशारों में बात करते हुए देखने को मिला है।
आज भले ही राजनीतिक तौर पर इसके अपने मायने निकाले जाएं, भारतीय जनता पार्टी द्वारा सोनिया गांधी पर “वन्देमातरम्” गीत रोकने की कोशिश करने का आरोप लगाया जाए। जैसाकि “वंदे मातरम” की कुछ शुरुआती पंक्तियों के बाद ही सोनियाजी-राहुल को इसे लेकर असहज होते हुए सामने आए वीडियो में देखा जा सकता है। मगर इतना तो स्पष्ट है कि इनसे आखिरकार मोदी सरकार ने पूरा राष्ट्रगीत गान करवाया है।
हालांकि कांग्रेस की ओर से कहा जा रहा है कि सोनियाजी ने “वंदे मातरम” रोकने की कोशिश नहीं की थी। वह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मांग रही थीं। किंतु यह तो ओर भी अनुचित आचरण है, घण्टों भाषण देने खड़े रहने वाले क्या “वंदे मातरम” गान के लिए तीन मिनट दस सेकेंड भी सीधे नहीं खड़े हो सकते हैं? स्वभाविक है कि यह प्रश्न हर किसी के मन में आया है, जिसने उक्त वीडियो देखा है।
वस्तुत: कभी-कभी इतिहास भी अपने को दोहराता है, वह एक नए रूप में सामने आता है और कहता है, अपने अतीत से सीखो। क्योंकि भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में पहले भी कांग्रेस के मंचों और नेताओं द्वारा अनुचित व्यवहार किया जाता रहा और राष्ट्रगीत “वंदे मातरम” को रोकने का प्रयास हुआ है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मंचों पर “वंदे मातरम” को पूरा गाने से रोकने या उसे सीमित करने के मुख्य रूप से तीन बड़े ऐतिहासिक प्रसंग देखने को मिलते हैं, इस गीत के पूरे पाठ को लेकर शुरुआती दौर से ही कांग्रेस के भीतर और बाहर वैचारिक मतभेद दिखे। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम गाया था। यह पहला अवसर था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम हो गईं। “वंदे मातरम” का अर्थ है- हे मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान “वंदे मातरम” भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों का नारा बन गया था। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल की विशाल जनसभा में हजारों छात्रों और प्रदर्शनकारियों ने पहली बार सामूहिक रूप से “वंदे मातरम” का नारा लगाया। इसके बाद यह आंदोलन का मुख्य रणघोष बन गया।
बंगभंग (बंगाल का विभाजन) आधिकारिक तौर पर 16 अक्टूबर 1905 को जब तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्जन ने किया, तब इस विभाजन के विरोध में उपजे आंदोलन को देश के इतिहास में 'वन्दे मातरम आंदोलन' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन पूरे बंगाल में लोगों ने उपवास रखा, एक-दूसरे को राखी बांधी और सड़कों पर नंगे पैर चलते हुए सामूहिक रूप से “वंदे मातरम” गाया।
ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को हिंदू और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के आधार पर बांटकर 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाई थी। इसके विरोध में 1906 के बारीसाल सम्मेलन में 10,000 से अधिक हिंदुओं और मुसलमानों ने एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर “वंदे मातरम” गाते हुए मार्च निकाला, जिसने अंग्रेजों की विभाजनकारी नीति को सीधी चुनौती दी।
बंगभंग के विरोध में विदेशी कपड़ों और वस्तुओं के बहिष्कार तथा 'स्वदेशी' (भारतीय) वस्तुओं को अपनाने की शपथ इसी गीत को गाकर ली जाती थी। इस गीत ने आम जनता में देशप्रेम की ऐसी लहर पैदा की कि लोगों ने विदेशी सामानों की होली जलाई।
वस्तुत: इस गीत का प्रभाव इतना आक्रामक और तीव्र था कि लॉर्ड कर्जन और ब्रिटिश प्रशासन इससे डर गए। सरकार ने सार्वजनिक स्थानों और स्कूलों में 'वन्दे मातरम' बोलने या गाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। नारा लगाने वाले छात्रों को कोड़े मारे जाते थे, उन पर भारी जुर्माने लगाए जाते थे और जेलों में डाल दिया जाता था। ब्रिटिश दमन ने इस गीत को और अधिक लोकप्रिय और क्रांतिकारी बना दिया।
इतिहास में हम देखते हैं, यह आंदोलन केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहा। “वंदे मातरम” के जरिए राष्ट्रवाद की यह गूंज पंजाब, मद्रास (चेन्नई), बम्बई (मुंबई) और आंध्र प्रदेश तक फैल गई। दिसंबर 1905 के वाराणसी कांग्रेस अधिवेशन में इस गीत को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय मंचों पर अनिवार्य कर दिया गया, जिससे यह पूरे भारत की स्वाधीनता की आवाज बन गया। मगर समय बीतने के साथ जैसे-जैसे इस्लामिक सोच राष्ट्रीय आन्दोलन पर भी हावी होने की कोशिश करने लगी, “वंदे मातरम” के पूरे गान का भी विरोध होने लगा।
जिस कांग्रेस ने इसे कभी राष्ट्रीय स्वर देने में अहम भूमिका निभाई थी, अब विरोध के स्वर वहीं से उठ रहे थे। पहला प्रमुख प्रसंग साल 1923 के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन का है। इस अधिवेशन की अध्यक्षता मौलाना मोहम्मद अली कर रहे थे। जब प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर परंपरा के अनुसार मंच पर “वंदे मातरम” गाने के लिए खड़े हुए, तो मौलाना मोहम्मद अली ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए रुकने को कहा। मौलाना का तर्क था कि इस्लाम में संगीत की मनाही है और यह गीत उनके धार्मिक विश्वासों के अनुकूल नहीं है। किंतु पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर कहां रुकने वाले थे, उन्होंने रुकने से साफ मना कर दिया और दृढ़ता से कहा कि यह देश का राष्ट्रीय मंच है। उन्होंने विरोध के बावजूद अपना गायन पूरा किया, जिससे नाराज होकर मौलाना मोहम्मद अली कुछ देर के लिए मंच छोड़कर चले गए थे।
20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा सुभाष चंद्र बोस को लिखी गई एक चिट्ठी में “वंदे मातरम” गीत की पृष्ठभूमि, मुस्लिम समुदाय की आपत्ति और सांप्रदायिक राजनीति पर विस्तार से बात की गई। उन्होंने लिखा:प्रिय सुभाष, मुझे आनंदमठ का एक अंग्रेजी अनुवाद मिल गया है और वर्तमान में मैं इसे पढ़ रहा हूं ताकि इस गीत की पृष्ठभूमि को समझ सकूं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस (उपन्यास की) पृष्ठभूमि से मुसलमानों के असहज या उत्तेजित (Irritate) होने की पूरी संभावना है।
इसके बाद सबसे निर्णायक प्रसंग इसी अक्टूबर माह 1937 का है, जब कोलकाता में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई। इस बैठक में आधिकारिक तौर पर एक प्रस्ताव पास करके पूरे गीत के बजाय केवल इसके शुरुआती दो छंदों को ही सार्वजनिक मंचों पर गाने की मंजूरी दी गई और शेष हिस्से पर रोक लगा दी गई।
दरअसल, मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने गीत के उत्तरार्ध में आने वाले धार्मिक प्रतीकों (जैसे मातृभूमि को दुर्गा और लक्ष्मी देवी के रूप में दर्शाना) पर कड़ा ऐतराज जताया था। अब स्वभाविक है कि जैसा कांग्रेस अपने चरित्र के अनुसार हमेशा ही करती है सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के नाम पर, तब आगे कांग्रेस के आयोजनों में पूरे गीत को गाने की परंपरा समाप्त हो गई और इसी के साथ भारत के साथ एक छल कांग्रेस ने यह किया कि उसने “वंदे मातरम” के माध्यम से भारत माता की पूर्ण प्रार्थना से कई दशकों तक लगातार सभी को वंचित रखा, खासकर कांग्रेस से जुड़े लोगों को।
यहां इतिहास का संयोग दिखिए; जो कभी कांग्रेस के कर्णधारों ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा, वह इस बार घट गया, किंतु विचार हम सभी करें, यदि संसद में इसे कानूनी संरक्षण देने वाला नया कानून पास नहीं हुआ होता तो क्या यह दिन देखने को मिलता? निश्चित ही प्रत्येक भारतवासी के लिए अपनी “मां”, भारत माता की प्रार्थना का अनिवार्य होना सुखद है !
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

