वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना: बाघों की बढ़ती संख्या के साथ बढ़ रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष
डॉ. अरविंद नाथ तिवारी
बिहार का एकमात्र टाइगर रिजर्व, पश्चिम चंपारण स्थित वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना (Valmiki Tiger Reserve) आज देश की सफल बाघ संरक्षण परियोजनाओं में गिनी जाती है। नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े इस संरक्षित वन क्षेत्र में पिछले एक दशक में बाघों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। यह संरक्षण की सफलता का प्रमाण है, किंतु इसके साथ ही जंगल से सटे गांवों में मानव–बाघ संघर्ष गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। खेतों में काम कर रहे किसानों, घास काटने गई महिलाओं तथा जंगल पर निर्भर ग्रामीणों पर बाघों के हमलों की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं।
एक दशक में बाघों की संख्या राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण एवं अखिल भारतीय बाघ आकलन के अनुसार वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में बाघों की संख्या निम्न प्रकार बढ़ी है-
वर्ष बाघों की अनुमानित संख्या
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2010 9
2014 22–23
2018 33
2022 54
आँकड़ों से स्पष्ट है कि लगभग एक दशक में बाघों की संख्या छह गुना तक बढ़ी। 2022 के कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण में 1368 बाघ की तस्वीरें दर्ज हुईं, जिनसे 54 अलग-अलग बाघ की पहचान की गई। इससे प्रति 100 वर्ग किलोमीटर में बाघ घनत्व लगभग 4.32 दर्ज किया गया,जो बिहार के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाती है।
संरक्षण की सफलता और नई चुनौती
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व लगभग 901 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ा हुआ है। दोनों क्षेत्रों के बीच बाघों की प्राकृतिक आवाजाही बनी रहती है। बेहतर सुरक्षा, शिकार पर नियंत्रण, वैज्ञानिक निगरानी तथा पर्याप्त शिकार प्रजातियों की उपलब्धता के कारण बाघों की संख्या बढ़ी है, किन्तु वन क्षेत्र के आसपास लगभग डेढ़ सौ से अधिक गांव बसा है। हजारों परिवार कृषि, पशुपालन और जंगल से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर हैं, यही कारण है कि बाघ और मनुष्य का आमना-सामना पहले की तुलना में अधिक हो रहा है।
मानव–बाघ संघर्ष की स्थिति
पिछले कुछ वर्षों में मदनपुर, गोवर्धना, मंगुराहा, वाल्मीकिनगर, हरनाटांड़, गनौली तथा गंडक दियारा क्षेत्र में बाघों के हमलों की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। कई ग्रामीण घायल हुए तथा कुछ मामलों में मृत्यु भी हुई। हाल के वर्षों में खेतों में काम कर रही महिला एवं किसानों पर हमले की घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में दहशत का वातावरण बनाया है
हालाँकि, वन विभाग अथवा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने पिछले दस वर्ष में वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना के अंतर्गत कुल हमले, कुल मृतक, घायल, भुगतान किए गए मुआवजे तथा लंबित मुआवजों का समेकित वर्षवार आधिकारिक आँकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है इसलिए इन मामलों में अनुमानित संख्या देना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
मुआवजा व्यवस्था
राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के अनुसार बाघ के हमले में मृत्यु होने पर राज्य सरकार पीड़ित परिवार को अनुग्रह सहायता प्रदान करती है। हाल के मामलों में पश्चिम चंपारण में मृतक के आश्रितों को लगभग 10 लाख रुपया तक की सहायता स्वीकृत किये जाने की जानकारी सामने आई है।
वन विभाग के अनुसार मुआवजा भुगतान से पूर्व घटनास्थल की जांच, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, वन अधिकारियों की सत्यापन रिपोर्ट तथा अन्य औपचारिकताएँ पूरी की जाती हैं, इसी कारण कई मामलों में भुगतान में विलंब की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
वन विभाग की पहल
वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना प्रशासन द्वारा मानव–बाघ संघर्ष कम करने के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं- कैमरा ट्रैप एवं नियमित गश्ती, रैपिड रिस्पांस टीम की तैनाती, गांवों में माइकिंग एवं चेतावनी, ग्रामीणों के साथ जागरूकता बैठकें, नेपाल के अधिकारियों के साथ समन्वय, समस्या उत्पन्न करने वाले बाघों की निगरानी एवं आवश्यक होने पर रेस्क्यू। बाघ विकास प्राधिकरण के अनुसार वाल्मीकि टाइगर रिजर्व ने मानव–वन्य जीव संघर्ष प्रबंधन में उल्लेखनीय प्रयास किया है, हालांकि सीमावर्ती गांवों का दबाव अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
प्रमुख चुनौतियाँ
विशेषज्ञों के अनुसार मानव–बाघ संघर्ष के मुख्य कारण हैं-बाघों की बढ़ती संख्या, जंगल के किनारे खेती, पशुओं का जंगल में चरना, ईंधन एवं चारे के लिए जंगल पर निर्भरता, बाघों का नेपाल से आवागमन, वन क्षेत्र के समीप मानव गतिविधियों का विस्तार।
आगे की आवश्यकता
वन्यजीव विशेषज्ञों का मत है कि संरक्षण तभी सफल माना जायेगा जब स्थानीय समुदाय भी सुरक्षित रहे। इसके लिए आवश्यक है कि मानव–बाघ संघर्ष का वर्षवार सार्वजनिक डाटाबेस, मुआवजा भुगतान की समयबद्ध व्यवस्था, गांव स्तर पर त्वरित चेतावनी प्रणाली, सौर फेंसिंग एवं निगरानी तंत्र का विस्तार, ग्रामीणों के लिए वैकल्पिक आजीविका एवं ईंधन की व्यवस्था, वन विभाग, प्रशासन एवं स्थानीय समुदाय के बीच बेहतर समन्वय।
वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना ने बाघ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2010 में जहाँ केवल 9 बाघ दर्ज किये गये थे, वहीं 2022 में उनकी संख्या बढ़कर 54 हो गई, यह सफलता पूरे देश के लिए प्रेरणादायक है, किंतु इसके साथ बढ़ता मानव–बाघ संघर्ष यह संकेत देता है कि अब संरक्षण की अगली चुनौती स्थानीय लोगों की सुरक्षा, शीघ्र मुआवजा, पारदर्शी आंकड़ा प्रणाली तथा सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करना है। बाघ और मनुष्य, दोनों की सुरक्षा ही भविष्य के संरक्षण की वास्तविक कसौटी होगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

