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असहमति तर्कों से हो, उपहास से नहीं

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असहमति तर्कों से हो, उपहास से नहीं


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

लोकतंत्र में विचारों पर सहमति-असहमति जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है भाषा की मर्यादा। संसद में उठने वाली हर आवाज देश के लोकतांत्रिक संस्कारों का परिचय देती है। जब किसी वैज्ञानिक या शिक्षाविद के विचारों का उत्तर तथ्यों के बजाय व्यंग्य और उपहास से दिया जाता है, तब प्रश्न प्रश्न उठना स्वभाविक है, यह प्रश्न बौद्धिक विमर्श की गुणवत्ता का है।

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी द्वारा लोकसभा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि को गोमूत्र विशेषज्ञ कहकर संबोधित किए जाने के बाद देशभर के 215 वर्तमान एवं पूर्व कुलपतियों तथा शिक्षाविदों का खुला पत्र इसी व्यापक चिंता को व्यक्त करता है। यह पत्र किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में नहीं लिखा गया है। वस्तुत: इसका मूल आग्रह यह है कि लोकतांत्रिक असहमति का आधार तर्क, प्रमाण और शिष्ट भाषा होनी चाहिए।

संसद की गरिमा भी तीखी आलोचना से अधिक इस बात से बढ़ती है कि आलोचना कितनी तथ्यपरक और मर्यादित रही। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से कठिन प्रश्न पूछना है। वह पूछे; इससे कौन उसे रोक रहा है। सरकारी समितियों की संरचना पर सवाल उठाना भी उसका अधिकार है, पर यदि किसी सदस्य की योग्यता या विचारों पर आपत्ति है तो उसे तथ्यों के आधार पर चुनौती दी जानी चाहिए न कि उपहास उड़ाकर !

प्रोफेसर वी. कामकोटि का नाम पिछले वर्ष तब चर्चा में आया था, जब उन्होंने गोमूत्र के कुछ संभावित औषधीय गुणों का उल्लेख करते हुए वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला दिया। उनके इन दावों का व्यापक विरोध भी हुआ और समर्थन भी। स्वयं प्रोफेसर कामकोटि ने अपने पक्ष में प्रकाशित शोधपत्रों और वैज्ञानिक अध्ययनों का उल्लेख किया। इनमें 2021 में प्रकाशित एक शोध में गोमूत्र के कुछ पेप्टाइड्स की एंटीमाइक्रोबियल गतिविधि का उल्लेख किया गया था। साथ ही उसी अध्ययन में यह भी स्पष्ट कहा गया कि अन्य संभावित जैविक प्रभावों की पुष्टि के लिए व्यापक और अतिरिक्त अनुसंधान आवश्यक हैं। यही विज्ञान की कार्यप्रणाली है।

किसी निष्कर्ष को अंतिम सत्य मानने से पहले उसे लगातार परखा जाता है और नए प्रमाणों के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि विज्ञान में किसी विचार का उत्तर व्यंग्य न होकर शोध, शोध और शोध होता है, अनेक बार तो प्राप्त परिणामों को तब तक संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, जब तक कि पूरी तरह से वैज्ञानिक आधार पर संतुष्ट नहीं हो जाते हैं, इसलिए यदि कोई दावा गलत भी है तो उसे प्रयोगशाला, शोधपत्र और वैज्ञानिक परीक्षण के माध्यम से गलत सिद्ध किया जाता है और यदि उसमें कुछ संभावना मौजूद है तो उसे और अधिक कठोर परीक्षणों से गुजारा जाता है।

आज अनेक साक्ष्य इस बात के भी मौजूद हैं कि समय की धार पर अनेक वैज्ञानिक अवधारणाएं प्रारंभ में अस्वीकार्य मानी गईं, लेकिन बाद में प्रमाणों के आधार पर स्वीकार की गईं। वहीं अनेक लोकप्रिय मान्यताएं समय के साथ वैज्ञानिक परीक्षणों में गलत भी साबित हुईं। इसलिए विज्ञान में न तो अंधस्वीकृति का स्थान है और न ही पूर्वाग्रहपूर्ण अस्वीकृति का। हर विचार की कसौटी प्रमाण होते हैं। वस्तुत: वैज्ञानिक समुदाय की यही परंपरा मानव सभ्यता की प्रगति का आधार भी रही है।

कहना होगा कि यह सिद्धांत राजनीति पर भी समान रूप से लागू होता है। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र में स्वीकार्य हैं, किंतु व्यक्तिगत उपहास लोकतांत्रिक संवाद की गुणवत्ता को कम करता है। संसद में प्रयुक्त शब्द देश की सार्वजनिक संस्कृति को प्रभावित करते हैं, इसलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों पर समान रूप से यह दायित्व है कि वे आलोचना को गरिमा और तथ्यों की सीमाओं के भीतर रखें।

आज सांसद प्रियंका गांधी को लिखा गया 215 कुलपतियों और शिक्षाविदों का पत्र इसी सिद्धांत की याद दिलाता है। उनका कहना है कि किसी विद्वान के विचारों से असहमत हुआ जा सकता है, किंतु उसके संपूर्ण शैक्षणिक योगदान को एक राजनीतिक विशेषण तक सीमित कर देना स्वस्थ बौद्धिक संस्कृति के अनुरूप नहीं है। यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्वविद्यालय और शोध संस्थान स्वतंत्र चिंतन के केंद्र होते हैं। यदि वहां कार्यरत विद्वानों को सार्वजनिक विमर्श में तर्कों के बजाय उपहास का सामना करना पड़े, तो इसका प्रतिकूल संदेश पूरे शैक्षणिक समुदाय तक जाता है।

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संदेश यही है कि लोकतंत्र और विज्ञान, दोनों की शक्ति संवाद में निहित है। संवाद तब सार्थक बनता है, जब उसमें तर्क हों, प्रमाण हों और मर्यादा हो। यह सच है कि किसी भी विचार को स्वीकार करने या खारिज करने का अधिकार सभी को है, किंतु साथ में एक सच यह भी है कि किसी व्यक्ति की विद्वत्ता का मूल्यांकन उसके शोध, उसके तर्क और उसके योगदान से होना चाहिए, किसी राजनीतिक विशेषण से कदापि नहीं।

अत: इस संदर्भ में अच्छा हो कि सांसद कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा अपनी भूल सुधारें, देश के वैज्ञानिक समुदाय से खासकर जिनके बारे में उन्होंने संसद में अनुचित बोला है, उनसे माफी मांग लें। वैसे भी भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता भी इसी में है कि संसद में विचारों का विमर्श तीखा हो सकता है, पर भाषा संयमित रहना चाहिए। याद रहे, असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है, जबकि उपहास विमर्श को कमजोर करता है। यदि हम स्वस्थ लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक संस्कृति का निर्माण करना चाहते हैं, तो विचारों का उत्तर विचारों से और तर्कों का उत्तर तर्कों से देना ही सबसे उपयुक्त मार्ग है। उम्मीद करेंगे कि कांग्रेस की सांसद एवं राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड़ा इस बात की गंभीरता को समझेंगी।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी