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भारतीय प्रतिभा पर अमेरिकी प्रहार, अपने ही हितों से टकराता ट्रंप प्रशासन

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भारतीय प्रतिभा पर अमेरिकी प्रहार, अपने ही हितों से टकराता ट्रंप प्रशासन


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने आठ प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों को स्थायी निवास से जुड़ी श्रम प्रमाणन प्रक्रिया परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (पीईआरएम) से बाहर करने का फैसला लेकर वैश्विक तकनीकी जगत में हलचल पैदा कर दी है। इस कदम की चपेट में माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट, इन्फोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज और कैपजेमिनी जैसी कंपनियां आई हैं। अमेरिकी प्रशासन ने कथित अनियमितताओं और स्थानीय कर्मचारियों के रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का हवाला दिया है। हालांकि, कंपनीवार आरोपों के समर्थन में विस्तृत सार्वजनिक साक्ष्य सामने आना अभी बाकी है, किंतु जांच के निष्कर्ष आने से पहले इन सभी कंपनियों को कठघरे में खड़ा करना अमेरिका की नीयत पर गंभीर संदेह पैदा करता है।

इस प्रकरण का सबसे अहम पक्ष यह है कि अमेरिका जिस प्रतिभा के सहारे तकनीकी नेतृत्व बनाए रखने की कोशिश करता रहा है, उसी प्रतिभा के भविष्य को अनिश्चितता में धकेल रहा है। भारतीय आईटी पेशेवर दशकों से अमेरिकी कंपनियों, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और नवाचार केंद्रों में अपनी योग्यता साबित करते आए हैं। उनके योगदान को संदेह की दृष्टि से देखते हुए सामूहिक प्रतिबंध लगाना अमेरिकी आर्थिक हितों के साथ भी टकराव पैदा कर सकता है।

अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता देकर अमेरिकी नागरिकों के रोजगार और वेतन पर दबाव डाल रही हैं। अपने नागरिकों के रोजगार की रक्षा करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। अब इस परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (पीईआरएम) प्रक्रिया के अंतर्गत किसी नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित पद के लिए पर्याप्त योग्य और उपलब्ध अमेरिकी कर्मचारी मौजूद हैं या नहीं, साथ ही विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से समान पदों पर कार्यरत अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन तथा कार्यस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ेगा।

वस्तुत: अमेरिकी श्रम विभाग इस प्रक्रिया की निगरानी करता है। रोजगार संबंधी सुरक्षा की व्यवस्था पहले से मौजूद होने के बावजूद कंपनियों के आवेदन रोक देना निश्चित ही भारत के पेशेवरों के लिए बहुत अपमानजनक है। यदि किसी कंपनी ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसके विरुद्ध प्रमाणों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल यह है कि किसी क्षेत्र में विदेशी कर्मचारियों की बड़ी संख्या अपने आप धोखाधड़ी का प्रमाण कैसे बन सकती है? वास्तव में यह प्रश्न अमेरिकी प्रशासन को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए ।

देखा जाए तो इस एक निर्णय से यहां रह रहे भारतीय एवं जो यूएस जाने की कतार में हैं, उनमें अधिकांश लोगों की वर्षों की पढ़ाई, पेशेवर अनुभव, कर भुगतान और रोजगार के आधार पर तैयार भविष्य की योजनाएं अचानक अनिश्चितता से घिर गई हैं। जिन परिवारों ने बच्चों की शिक्षा, घर खरीदने और दीर्घकालीन आर्थिक सुरक्षा से जुड़े फैसले लिए हैं, उनके लिए यह प्रशासनिक बदलाव गहरे व्यक्तिगत प्रभाव पैदा कर सकता है।

अमेरिकी सरकार यह कैसे भूल सकती है कि प्रतिभा की वैश्विक आवाजाही किसी एक पक्ष को शक्तिशाली नहीं बनाती है। कंपनियां दुनिया भर से विशेषज्ञ चुनती हैं क्योंकि आधुनिक तकनीक, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में श्रेष्ठ कौशल की मांग लगातार बढ़ रही है।

फिर अमेरिका को यह भी समझना चाहिए कि भारतीय मूल के लोगों का अमेरिका की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान है। Indiaspora और Boston Consulting Group की संयुक्त इम्पैक्ट रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिकी आबादी का लगभग 1.5 प्रतिशत है और कारोबार, विज्ञान, शिक्षा तथा सार्वजनिक जीवन में उसका प्रभाव उसकी जनसंख्या हिस्सेदारी से कहीं अधिक है।

इस योगदान को समझने के लिए बड़ी कंपनियों के नेतृत्व पर नजर डालना पर्याप्त है। सुंदर पिचाई और सत्या नडेला जैसे भारतीय मूल के प्रमुख उद्योग नेता वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों का संचालन कर रहे हैं। भारतीय इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और उद्यमियों ने सॉफ्टवेयर विकास, डिजिटल भुगतान, चिकित्सा तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर सुरक्षा के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

भारतीय समुदाय अमेरिकी कारोबार में निवेश करता है, रोजगार के अवसर पैदा करता है, कर चुकाता है और अनुसंधान एवं उद्यमिता में भागीदारी निभाता है। उपलब्ध संस्थागत अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि भारतीय-अमेरिकी समुदाय अमेरिका की आर्थिक प्रगति का महत्वपूर्ण सहभागी है। दूसरी ओर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस द्वारा भारतीय पेशेवरों के संदर्भ में ‘इंडेंटर्ड सर्वेंट्स’ (ठेका नौकर) जैसी अपमानजनक शब्दावली का इस्तेमाल विवाद का दूसरा गंभीर पहलू है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस अभिव्यक्ति को अनुचित, आपत्तिजनक और अपमानजनक बताया है। मंत्रालय ने भारतीय पेशेवरों की उच्च शिक्षा, कौशल और अमेरिकी अर्थव्यवस्था तथा नवाचार तंत्र में उनके योगदान का उल्लेख किया है। ‘इंडेंटर्ड सर्वेंट्स’ शब्द औपनिवेशिक इतिहास से जुड़ा है। उन्नीसवीं शताब्दी में अनेक भारतीय श्रमिक अनुबंधित श्रम व्यवस्थाओं के तहत मॉरीशस, सूरीनाम और कैरेबियाई क्षेत्रों में ले जाए गए थे। उन व्यवस्थाओं में शोषण और कठोर परिस्थितियों का इतिहास दर्ज है। आधुनिक तकनीकी पेशेवरों के लिए इसी शब्दावली का प्रयोग वास्तव में संवेदनशीलता की अनदेखी करता है।

वस्तुत: लोकतांत्रिक समाज में रोजगार नीति पर कठोर बहस हो सकती है। कंपनियों की जवाबदेही भी तय की जा सकती है। फिर भी, किसी देश के कुशल पेशेवरों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली भाषा दो मित्र देशों के बीच भरोसे को कमजोर करती है। भारत की आपत्ति इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए।

भारत और अमेरिका के संबंध व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, शिक्षा, अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीतिक साझेदारी जैसे अनेक आयामों से जुड़े हैं। दोनों देश चीन के बढ़ते प्रभाव, आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग के विषयों पर भी साझा हित रखते हैं।

ऐसी परिस्थिति में भारतीय पेशेवरों के स्थायी निवास से जुड़े अवसरों पर प्रतिबंध व्यापक संबंधों में असहजता बढ़ाता है। भारत का विदेश मंत्रालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि कुशल पेशेवरों की आवाजाही दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी है। भारतीय प्रतिभा अमेरिकी कंपनियों को विशेषज्ञता और नवाचार देती है, जबकि अमेरिकी बाजार भारतीय पेशेवरों को अनुभव तथा विकास के अवसर उपलब्ध कराता है।

ट्रंप प्रशासन की नीतियों का मूल्यांकन इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। घरेलू राजनीति में रोजगार संरक्षण का संदेश देना आसान हो सकता है, मगर वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसका असर कहीं अधिक जटिल होता है। कंपनियां अपनी भर्ती रणनीति बदल सकती हैं, परियोजनाएं दूसरे देशों में स्थानांतरित कर सकती हैं और प्रतिभाशाली कर्मचारी कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया या अन्य तकनीकी केंद्रों की ओर रुख कर सकते हैं।

रॉयटर्स (न्यूज एजेंसी) की रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने भी आगाह किया है कि कुशल विदेशी प्रतिभा के लिए स्थायी निवास के अवसर सीमित करने से अमेरिकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर पड़ सकती है। यदि प्रतिभाशाली लोग अमेरिका आने से बचने लगें या वहां से बाहर जाने लगें, तो उसका लाभ प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं को मिल सकता है।

अब भारत को इस प्रकरण में तीन मोर्चों पर सक्रिय रहना चाहिए। पहला, कूटनीतिक स्तर पर अमेरिकी प्रशासन से स्पष्ट जानकारी और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग की जाए। दूसरा, प्रभावित कंपनियों तथा पेशेवरों को उपलब्ध कानूनी विकल्पों की जानकारी दी जाए। तीसरा, भारतीय तकनीकी उद्योग को घरेलू अनुसंधान, उच्च कौशल प्रशिक्षण और वैश्विक बाजारों के विविधीकरण पर अपना निवेश बढ़ाना चाहिए।

भारतीय आईटी कंपनियां पहले से अमेरिकी बाजार में स्थानीय कर्मचारियों की भर्ती और स्थानीय परिचालन क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम कर रही हैं। इस प्रवृत्ति को आगे बढ़ाने से कंपनियों की परिचालन स्थिरता मजबूत हो सकती है। साथ ही भारत को अपने यहां ऐसा तकनीकी वातावरण तैयार करना होगा, जहां विश्वस्तरीय शोधकर्ता, इंजीनियर और उद्यमी देश में रहकर भी वैश्विक स्तर का काम कर सकें।

अमेरिका को भी यह समझना होगा कि आर्थिक महाशक्ति बनने की यात्रा में प्रतिभा, पूंजी और नवाचार की खुली आवाजाही की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई उचित है, मगर व्यापक प्रतिबंधों को पारदर्शी प्रमाणों, निष्पक्ष सुनवाई और स्पष्ट समयसीमा से जोड़ना जरूरी है। सच यही है कि भारत के कुशल पेशेवरों के योगदान को संदेह और अपमान की दृष्टि से देखने के बजाय साझेदारी की शक्ति के रूप में स्वीकार करना अमेरिका के अपने हित में है।

अमेरिका यदि अपनी तकनीकी श्रेष्ठता, निवेश आकर्षण और वैश्विक प्रतिष्ठा बनाए रखना चाहता है, तो उसे आरोपों की जगह प्रमाण, सामूहिक संदेह की जगह निष्पक्ष जांच और अपमानजनक भाषा की जगह सम्मानजनक संवाद को प्राथमिकता देनी होगी। भारत के लिए भी यह अवसर है कि वह अपने पेशेवरों के सम्मान की रक्षा करते हुए आत्मनिर्भर तकनीकी क्षमता को और मजबूत करे।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी