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प्रशिक्षण के इंतजार में क्यों खड़े हैं देश के भावी अफसर?

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प्रशिक्षण के इंतजार में क्यों खड़े हैं देश के भावी अफसर?


अभिषेक शुक्ल

प्रतिवर्ष अगस्त और सितंबर का महीना लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में एक नई ऊर्जा लेकर आता है, लेकिन अब अक्टूबर गुजर रहा है और संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के नवीनतम बैच का आधारभूत प्रशिक्षण कार्यक्रम अब तक शुरू नहीं हो सका है। अंतिम परिणाम घोषित होने के बावजूद, सैकड़ों चयनित उम्मीदवार सेवा और संवर्ग आवंटन की राह देख रहे हैं। इस अभूतपूर्व देरी के केंद्र में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की प्रशासनिक उलझनें और आरक्षण नियमों, विशेषकर अन्य पिछड़ा वर्ग के क्रीमी लेयर प्रावधानों से जुड़े गहरे कानूनी विवाद हैं।

इस वर्तमान गतिरोध की मुख्य वजह कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र का गलत प्रशासनिक अनुपालन है। मूल कार्यालय ज्ञापन स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रथम और द्वितीय श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए क्रीमी लेयर का निर्धारण माता-पिता के पद और उनकी पदोन्नति की आयु के आधार पर होगा, न कि उनके वेतन के आधार पर। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया था कि आय की गणना में वेतन और कृषि से होने वाली आय को नहीं जोड़ा जाएगा। हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए विभाग और राजस्व अधिकारियों ने स्पष्टीकरण पत्र का सहारा लेकर लगातार गलतियां कीं। पदों की समानता तय न होने की आड़ में अधिकारियों ने इन कर्मचारियों के वेतन को अन्य आय के साथ जोड़कर कई मेधावी उम्मीदवारों को आरक्षण के लाभ से वंचित कर दिया।

इस अन्याय के खिलाफ मामला जब उच्चतम न्यायालय पहुंचा, तो अदालत ने 2026 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकार की इस कार्यप्रणाली को असंवैधानिक और भेदभावपूर्ण करार दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मूल ज्ञापन के तहत वेतन को सामाजिक उन्नति का एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता। अदालत ने सरकार को छह महीने के भीतर प्रभावित उम्मीदवारों को समायोजित करने और आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त पद सृजित करने का निर्देश दिया। वर्तमान में कार्मिक विभाग इसी फैसले के पेंच में उलझा है। हाल ही में केंद्र सरकार ने न्यायालय में एक याचिका दायर कर इस फैसले को पूर्वव्यापी के बजाय भविष्यलक्षी प्रभाव से लागू करने की मांग की है, ताकि पुरानी भर्तियों को फिर से खोलने से होने वाली प्रशासनिक अराजकता से बचा जा सके। जब तक इस पर न्यायालय का अंतिम आदेश नहीं आ जाता, तब तक नए बैच का सेवा आवंटन रुका हुआ है।

आरक्षण नियमों के गलत प्रयोग का यह विवाद कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि यह भर्ती एजेंसियों द्वारा आरक्षित वर्ग के मेधावी उम्मीदवारों को अनारक्षित श्रेणी में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया और कानूनों की जटिलताओं को न समझ पाने की एक बड़ी शृंखला का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रांतीय सिविल सेवा परीक्षा 2025 के अंतिम परिणाम पर लगी रोक और राज्य का 69,000 सहायक शिक्षक भर्ती मामला इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहां मेधावी आरक्षित उम्मीदवारों को अनारक्षित श्रेणी में सही ढंग से स्थानांतरित नहीं किया गया। अकसर एजेंसियां यह समझने में विफल रहती हैं कि आयु सीमा या परीक्षा शुल्क में दी गई रियायतें किसी भी मेधावी आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी को अपनी उत्कृष्ट मेधा के आधार पर अनारक्षित श्रेणी में जाने से नहीं रोकती हैं।

लोक सेवा भर्ती परीक्षाओं में लगातार बढ़ते मुकदमों और चयन प्रक्रियाओं के अंतहीन गतिरोध से निपटने के लिए अब बुनियादी और संस्थागत सुधारों की सख्त जरूरत है। इसके समाधान के रूप में सबसे पहला कदम भर्ती अधिकारियों का विधिक व संवैधानिक क्षमता निर्माण है। राज्य लोक सेवा आयोगों और केंद्रीय विभागों के नीति निर्माताओं को आरक्षण न्यायशास्त्र का गहन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही, मानवीय और प्रशासनिक त्रुटियों को रोकने के लिए आरक्षण रोस्टर प्रणाली और पदों की गणना को मानकीकृत तकनीकी प्रणाली के माध्यम से पूरी तरह स्वचालित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक भर्ती एजेंसी में सामान्य प्रशासकों पर निर्भरता कम कर संवैधानिक व सेवा विधि के विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र विधिक प्रकोष्ठ स्थापित किया जाना चाहिए, जो किसी भी विज्ञापन के जारी होने से पूर्व ही नियमों की बारीक न्यायिक समीक्षा करे।

चयनित उम्मीदवारों का प्रशिक्षण अकादमी पहुंचने का यह लंबा इंतजार केवल कुछ व्यक्तियों की आजीविका का नुकसान नहीं है, बल्कि यह देश की शीर्ष नौकरशाही की आपूर्ति शृंखला में एक बड़ा गतिरोध है। जब तक सभी जिम्मेदार एजेंसियां आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों को स्पष्ट रूप से नहीं अपनातीं और आवश्यक तकनीकी व विधिक सुधार लागू नहीं करतीं, तब तक न्यायिक हस्तक्षेप और मुकदमों का यह अंबार भारत की सार्वजनिक भर्ती प्रणाली की एक स्थायी और दुर्भाग्यपूर्ण विशेषता बनी रहेगी।

(लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद