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समान नागरिक संहिता का बाल-अधिकार दृष्टिकोण

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समान नागरिक संहिता का बाल-अधिकार दृष्टिकोण


- मध्यप्रदेश के बच्चों के सुरक्षित भविष्य की आधारशिला

- डॉ. निवेदिता शर्मा

भले ही भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को गरिमा, समानता, सुरक्षा और विकास का अधिकार प्रदान करता है, किंतु जब भी हम परिवार, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार या सामाजिक परंपराओं की चर्चा करते हैं, तब प्रायः वयस्कों के अधिकारों और दायित्वों पर अधिक विचार होता है। जिसकी वाणी अक्सर सबसे कम सुनाई देती है, वे हैं हमारे बच्चे।

वास्तव में किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात से मापी जाती है कि वह अपने बच्चों के अधिकारों और हितों की कितनी प्रभावी रक्षा करती है। आज जब मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की दिशा में विचार कर रहा है, तब यह आवश्यक है कि इसका प्रारूप वैवाहिक, पारिवारिक और उत्तराधिकार संबंधी कानूनों का एकीकरण करने तक सीमित न रहे, वह बाल-अधिकारों की सुरक्षा का भी सशक्त दस्तावेज बने।

इसी दृष्टि से मध्य प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर विचार करते समय सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होना चाहिए कि इससे हमारे बच्चों का जीवन कितना बेहतर, सुरक्षित और न्यायपूर्ण बनेगा। यूसीसी का मूल दर्शन “बालक का सर्वोत्तम हित” होना चाहिए, क्योंकि बच्चे किसी भी विवाद, निर्णय या व्यवस्था के पक्षकार नहीं होते, किंतु उसके परिणामों से सबसे अधिक प्रभावित रहते हैं।

जब परंपरा और बचपन आमने-सामने हों-

हमारे समाज में अनेक परंपराएं और रीति-रिवाज लंबे समय से प्रचलित रहे हैं। अधिकांश परंपराएं समाज को जोड़ने का कार्य करती हैं, किंतु यदि कोई परंपरा किसी बच्चे के स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा या सम्मान में बाधक बनती है, तो वहां बच्चे के अधिकारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यूसीसी में यह स्पष्ट होना चाहिए कि विवाह, तलाक, अभिरक्षा, संरक्षकता, भरण-पोषण, दत्तक ग्रहण और उत्तराधिकार से जुड़े प्रत्येक निर्णय में बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि होगा। कोई भी धार्मिक प्रथा, सामाजिक मान्यता या व्यक्तिगत कानून बच्चे के अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता।

बाल विवाह : एक बच्ची के सपनों पर सबसे बड़ा प्रहार-

एक कम उम्र की बच्ची, जिसके हाथों में किताबें होनी चाहिए, वह विवाह और मातृत्व की जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाती है। एक किशोर, जिसे शिक्षा और कौशल के अवसर मिलने चाहिए, वह समय से पहले वयस्क जीवन की चुनौतियों में उलझ जाता है, इसलिए यूसीसी में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 की सर्वोच्चता को पूर्ण स्पष्टता के साथ स्थापित किया जाना जरूरी है। कोई भी धर्म, मत, पंथ, समुदाय या परंपरा बाल विवाह को वैधता न दे सके। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि बाल विवाह से जन्मे बच्चों को किसी प्रकार की सामाजिक या कानूनी हानि न हो। बच्चों को उनके माता-पिता के निर्णयों की सजा नहीं मिलनी चाहिए।

तलाक का सबसे मौन पीड़ित होता है बच्चा-

पति-पत्नी का संबंध टूटता है, पर उस टूटन की सबसे गहरी आवाज अक्सर बच्चे के मन में सुनाई देती है। अनेक बच्चे माता-पिता के विवादों के बीच असुरक्षा, भय, अकेलेपन और मानसिक तनाव का सामना करते हैं। कई बार वे स्वयं को ही इस टूटन का कारण मानने लगते हैं, इसीलिए यूसीसी में यह व्यवस्था होनी चाहिए कि जहां भी तलाक या वैवाहिक विवाद का मामला हो और बच्चे उससे जुड़े हों, वहां उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, निवास और भावनात्मक सुरक्षा की स्पष्ट योजना प्रस्तुत की जाए। न्यायालय आवश्यकता पड़ने पर “चाइल्ड वेलफेयर इम्पैक्ट असेसमेंट” कर सके, ताकि यह समझा जा सके कि प्रस्तावित निर्णय का बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी परिस्थिति में बच्चे को माता-पिता के संघर्ष का हथियार न बनने दिया जाए।

संयुक्त अभिभावकत्व मिले

एक बच्चा माता या पिता में से किसी एक का नहीं होता। वह दोनों के स्नेह, मार्गदर्शन और संरक्षण का अधिकारी है, इसलिए तलाक के बाद भी बच्चे का दोनों अभिभावकों से संपर्क और भावनात्मक जुड़ाव बना रहना चाहिए। अभिरक्षा का निर्णय कानूनी अधिकारों के आधार तक सीमित न होकर बच्चे की वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाए। पर्याप्त आयु और समझ रखने वाले बच्चों की राय को भी महत्व दिया जाना चाहिए। आखिरकार, उनके जीवन से जुड़े निर्णयों में उनकी आवाज क्यों न सुनी जाए?

हर बच्चा समान है, उसकी जन्म-परिस्थिति नहीं-

एक सभ्य समाज बच्चों को उनके जन्म की परिस्थितियों से न पहचानते हुए उनके व्यक्तित्व और अधिकारों से पहचानता है। चाहे बच्चा विवाह से जन्मा हो, लिव-इन रिलेशनशिप से, दत्तक ग्रहण के माध्यम से परिवार में आया हो या किसी पूर्व वैध बहुविवाह से उत्पन्न हुआ हो, उसके अधिकार समान होने चाहिए। उत्तराधिकार, शिक्षा, पहचान, भरण-पोषण और संपत्ति के मामलों में किसी भी प्रकार का भेदभाव बच्चों के साथ अन्याय होगा।

विशेष रूप से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पुत्र और पुत्री को समान उत्तराधिकार अधिकार प्राप्त हों। संयुक्त परिवार की सहदायिकी संपत्ति में पुत्री को जन्म से वही अधिकार और दायित्व प्राप्त हों जो पुत्र को होते हैं। यह सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा।

लिव-इन संबंधों में भी बच्चे के अधिकार सर्वोपरि रहें-

समाज बदल रहा है और पारिवारिक संरचनाएं भी परिवर्तित हो रही हैं, किंतु परिस्थितियां चाहे जो हों, बच्चे के अधिकार कभी कम नहीं हो सकते। यदि किसी लिव-इन रिलेशनशिप से बच्चा जन्म लेता है, तो उसे पूर्ण वैधता, सम्मान और समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए। जन्म पंजीयन, शिक्षा, स्वास्थ्य, भरण-पोषण और उत्तराधिकार में किसी प्रकार का भेदभाव न हो। यदि ऐसा संबंध समाप्त होता है, तो बच्चे की अभिरक्षा और भरण-पोषण की स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।

घरेलू हिंसा बच्चों को भी घायल करती है-

जब किसी घर में हिंसा होती है, तो उसके निशान वहां रह रहे बच्चों के मन पर भी पड़ते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर भय, अवसाद, असुरक्षा और व्यवहारिक समस्याओं से जूझते हैं, इसीलिए विवाह-विच्छेद, अलगाव या घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में बच्चों की सुरक्षा का जोखिम मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर बाल कल्याण समिति या बाल संरक्षण इकाइयों को तत्काल जोड़ा जाना जाए, ताकि किसी भी बच्चे को संकट की स्थिति में अकेला न छोड़ा जाए।

दत्तक ग्रहण : एक जीवन के पुनर्निर्माण की प्रक्रियाृ

हम सभी जानते हैं कि दत्तक ग्रहण किसी बच्चे को परिवार, पहचान और भविष्य देने की प्रक्रिया है, इसलिए यह जरूरी है कि पूरी तरह पारदर्शी, वैधानिक और बाल-केंद्रित हो। सभी दत्तक ग्रहण प्रक्रियाएं किशोर न्याय अधिनियम और सीएआरए के दिशा-निर्देशों के अनुरूप संचालित हों तथा अवैध या अनौपचारिक दत्तक ग्रहण पर पूर्ण रोक हो। दत्तक ग्रहण के बाद भी समय-समय पर निगरानी की व्यवस्था हो, ताकि बच्चे का समुचित विकास सुनिश्चित किया जा सके।

यूसीसी का वास्तविक उद्देश्य : हर बच्चे को समान अवसर-

अत: समान नागरिक संहिता की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसने कितने कानूनों को एकरूप किया, बल्कि इससे मापी जाएगी कि उसने कितने बच्चों को असमानता, उपेक्षा और असुरक्षा से मुक्त किया। मध्यप्रदेश के लिए यह एक ऐतिहासिक अवसर है कि वह ऐसी यूसीसी का निर्माण करे, जिसमें हर निर्णय का केंद्र बच्चा हो; जहां किसी बच्चे के अधिकार उसकी पारिवारिक, सामाजिक या धार्मिक पृष्ठभूमि से निर्धारित न हों और जहां हर बच्चे को यह भरोसा हो कि कानून उसके साथ खड़ा है।

क्योंकि अंततः किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसकी आने वाली पीढ़ियां होती हैं। यदि हम उनके अधिकारों और सपनों की रक्षा कर सके, तो वास्तव में हम एक अधिक न्यायपूर्ण, संवेदनशील और समृद्ध समाज की दिशा में आगे बढ़ेंगे। यहां यह भी बता दें कि बच्चों के हित में यह निर्णय सिर्फ मप्र तक सीमित नहीं होने चाहिए, हर राज्य में और देश के स्तर पर जब भी इस तरह की पॉलिसी बने, सभी पर यह लागू होना आज समय की आवश्यकता है।

(लेखिका, मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी