तिलक ने गणेश उत्सव और शिवाजी महोत्सव के माध्यम से राजनीतिक चेतना जगाई
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती (23 जुलाई) पर विशेष
-डॉ. लोकेश कुमार चन्देल
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक महान स्वतंत्रता सेनानी, महान विचारक, बेहतरीन शिक्षक और समाज सुधारक के रूप में अपनी अनूठी पहचा बनाई। वे महात्मा गांधी से पहले कांग्रेस के बड़े नेता और गरम दल के शीर्षस्थ नेताओं में शुमार थे। उनकी जयंती 23 जुलाई को मनाई जाती है। उनका जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। उन्होंने नारा दिया था- ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।’ उनका मानना था कि देश की स्वतंत्रता के लिए सबसे पहले राष्ट्रीय भावना, धार्मिक, सांस्कृतिक एकता स्थापित करना आवश्यक है। इसके लिए उन्होंने चार सिद्धांत स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा को स्वदेशी विचारधारा के साथ प्रतिपादित किया गया। इस चार सूत्रीय रणनीति ने स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत नींव रखी।
राष्ट्रीय चेतना का विकास
तिलक ने भारतीयों में आत्मसम्मान, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत की। उन्होंने जनता को राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक बनने के लिए प्रेरित किया। तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया। इसका उद्देश्य विभिन्न जातियों और वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाकर सामाजिक एकता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करना था। तिलक यह अच्छी तरह जान चुके थे कि केवल अतीत के गौरवगान से कुछ हासिल नहीं होगा। वे जानते थे कि जब तक युवाओं का मजबूत संगठन उठ खड़ा नहीं होगा, तब तक क्रांति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो पाएगा। वे यह भी जानते थे कि भारतीय युवाओं में जो सांस्कृतिक चेतना सो गई है, उसे जगाना आवश्यक है। युवाओं के बिना मजबूत संगठन की बात सोची भी नहीं जा सकती। उस दौर में गणेशोत्सव का जो स्वरूप था, वह आज से बिल्कुल भिन्न था। सन 1893 में तिलक ने पुणे में गणेशोत्सव की नींव रखी।
धार्मिक आयोजन के रूप में गणेशोत्सव मनाने की परंपरा गांव-गांव और शहर-शहर में बहुत पहले से चली आ रही थी लेकिन जब देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए युवाओं के संगठन की आवश्यकता महसूस हुई, तब तिलक को गणपति बप्पा से बड़ा कोई धार्मिक पुरोधा नहीं मिला। उन्होंने गणेशोत्सव मनाने की जो राष्ट्रीय परंपरा की एक नींव डाल दी, वह 132 वर्ष पूरे होने के बाद भी चल रही है। वे गणों के स्वामी हैं, व्रातपति हैं, समूह के देवता हैं इसलिए समूह से प्यार करते है। राष्ट्र के विकास का आधार मनुष्य के श्रम की पूंजी है इसीलिए तिलक ने गणेशजी को राष्ट्र का आराध्य बनाया। विघ्नहर्ता गणेश जी उन सभी को सुहाते हैं जो कर्म में जुते हुए हैं और अपने मानस में श्रद्धा और विश्वास को स्थापित कर निर्भय हो जाना चाहते हैं।
शिवाजी महोत्सव का आयोजन
तिलक ने महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती को सार्वजनिक रूप से मनाने की परंपरा शुरू की। शिवाजी के जीवन चरित्र से युवाओं में साहस, देशभक्ति और स्वाभिमान की भावना का विकास हुआ। इसके साथ ही 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना में सहयोग किया। बाद में डेक्कन एजुकेशन सोसायटी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि शिक्षा का राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान होता है। उनका मानना था कि शिक्षा व्यक्ति को आजादी का पाठ अच्छी तरह पढ़ाती है।
इसके बाद 3 जुलाई, 1908 को बाल गंगाधर तिलक को अंग्रेजों ने राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। बर्मा के मांडले में 1908 से 1914 तक तिलक को 6 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। 1908 में उन्हें 6 वर्ष के लिए मांडले (बर्मा, वर्तमान म्यांमार) की जेल भेजा गया।
बाल गंगाधर तिलक का राजनीतिक करियर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे स्वराज की मांग को जन-आंदोलन बनाने वाले प्रमुख नेताओं में थे। तिलक ने 1889 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रवेश किया। प्रारंभ में कांग्रेस के भीतर गरम विचारधारा के प्रमुख नेता माने जाने लगे। उनका मानना था कि केवल प्रार्थना और याचिका से स्वतंत्रता नहीं मिलेगी। उन्होंने लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर ‘लाल-बाल-पाल’ की प्रसिद्ध तिकड़ी का नेतृत्व किया। स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज के कार्यक्रमों का समर्थन किया।
बंगाल विभाजन का विरोध
बाल गंगाधर तिलक ने 1905 में बंगाल विभाजन के विरुद्ध जन-आंदोलन का नेतृत्व किया। इसके लिए उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा दिया। सन 1907 में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरमपंथी और गरमपंथी नेताओं के बीच मतभेद बढ़ गए। इसके बाद कांग्रेस दो धड़ों में विभाजित हो गई।
होमरूल लीग की स्थापना
बाल गंगाधर तिलक ने जेल से लौटने के बाद सन 1916 में होमरूल लीग की स्थापना की। इसके बाद भारत को स्वशासन दिलाने की मांग को लेकर होमरूल लीग के आन्दोलन का नेतृत्व किया। इसी वर्ष कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौते का भी समर्थन किया।
तिलक ने स्वराज की मांग को राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्य लक्ष्य बनाया, स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलनों को लोकप्रिय बनाया। गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव के माध्यम से जनता में राष्ट्रीय चेतना जगाई। केसरी (मराठी) और मराठा (अंग्रेजी) समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की आलोचना की और राष्ट्रवाद का प्रचार किया।
स्वदेशी का प्रचार
भारतीय वस्तुओं के उपयोग और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने का आह्वान किया। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता को बल मिला। तिलक ने धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को सामाजिक एकता तथा राष्ट्रीय जागरण का माध्यम बनाया। उन्होंने लोगों को जाति, क्षेत्र और भाषा से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। स्वतंत्रता सेनानी तिलक का 1 अगस्त, 1920 को निधन हो गया। लेकिन उनके विचारों ने आगे चलकर महात्मा गांधी सहित अनेक नेताओं को प्रेरित किया। केसरी (मराठी) और मराठा (अंग्रेजी) समाचार पत्रों का प्रकाशन किया।
इन समाचार पत्रों के माध्यम से सामाजिक समस्याओं, राष्ट्रीय चेतना और ब्रिटिश शासन की नीतियों पर जनता को जागरूक किया।
बहरहाल, हम यही कह सकते हैं कि बाल गंगाधर तिलक ने शिक्षा, पत्रकारिता, सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने समाज को संगठित कर स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मजबूत जनाधार तैयार किया। इसी कारण से उन्हें ‘लोकमान्य’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित

