देश में आरक्षण की दशा और दिशा
डाॅ.अरविंद नाथ तिवारी
देश में आरक्षण का प्रश्न केवल राजनीति का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और राष्ट्रीय विकास से जुड़ा विषय है। आजादी के लगभग 80 वर्ष बाद भी आरक्षण पर बहस उतनी ही तीखी है जितनी संविधान लागू होने के समय थी। एक पक्ष इसे ऐतिहासिक अन्याय के प्रतिकार का आवश्यक साधन मानता है, जबकि दूसरा पक्ष यह मानता है कि वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. भीमराव राव आंबेडकर ने आरक्षण को सामाजिक रूप से वंचित वर्गों को अवसर प्रदान करने का एक संवैधानिक साधन माना था। संविधान सभा की चर्चाओं में उन्होंने यह कहा था कि उद्देश्य समान अवसर उपलब्ध कराना है, ना कि समाज को स्थायी रूप से विभाजित करना।
संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए विधानसभा और लोकसभा में राजनीतिक आरक्षण प्रारंभ में 10 वर्ष के लिए रखा गया था, जिसे बाद में संसद ने समय-समय पर संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से बढ़ाया। वहीं, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए संविधान ने कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की। डॉ. आंबेडकर जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता को भारतीय समाज की गंभीर समस्या मानते थे। 1932 के पूना समझौते के बाद पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर आरक्षित सीटों की व्यवस्था बनी। यह समझौता डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुआ था, इसलिए यह कहना कि वे केवल किसी एक पक्ष के दबाव में आरक्षण के पक्षधर हुए, इतिहास का पूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करता।
स्वतंत्रता के बाद विभिन्न सरकारों, विशेषकर कांग्रेस के लंबे शासनकाल में, आरक्षण व्यवस्था को बनाये रखा गया और समय-समय पर उसका विस्तार भी हुआ। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का निर्णय जनता दल सरकार ने लिया, जबकि बाद की विभिन्न सरकारों ने भी आरक्षण संबंधी प्रावधानों को जारी रखा। हाल के वर्षों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ई डब्ल्यू एस ) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण भी लागू किया गया, जो आर्थिक आधार पर आरक्षण का एक नया उदाहरण है, जो केन्द्र सरकार की एक उपलब्धि है।
आरक्षण व्यवस्था की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि इसका लाभ कई बार एक ही परिवार या अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग तक सीमित रह जाता है। अनेक विशेषज्ञों का मत है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर भी ऐसे परिवार हैं जिन्हें बार-बार आरक्षण का लाभ मिलता है, जबकि उसी समुदाय के अत्यंत गरीब और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले लोग अभी भी अवसरों से वंचित हैं। यही कारण है कि आरक्षण की समीक्षा, लाभार्थियों की पहचान और वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचाने की मांग समय-समय पर उठती रही है। दूसरी ओर, आरक्षण के समर्थकों का तर्क है कि सामाजिक भेदभाव केवल आर्थिक स्थिति से समाप्त नहीं हो जाता। उनका कहना है कि आज भी अनेक क्षेत्रों में जाति आधारित भेदभाव मौजूद है, इसलिए केवल आर्थिक आधार पर्याप्त नहीं होगा।
उच्चतम न्यायालय ने भी कई मामलों में माना है कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन आरक्षण का महत्वपूर्ण आधार है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि लंबे समय तक आरक्षण जारी रहने से सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं में अवसरों की कमी की भावना उत्पन्न हुई है, इसी बहस के बीच आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग आरक्षण को लागू किया गया, जिससे आर्थिक आधार को भी नीति का हिस्सा बनाया गया। आज सत्ता और विपक्ष की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां आरक्षण समाप्त करने की बात नहीं करतीं।
इसका एक कारण यह है कि आरक्षण करोड़ों लोगों के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा विषय बन चुका है। दूसरा कारण यह है कि भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न सामाजिक वर्ग महत्वपूर्ण मतदाता हैं और कोई भी दल इस विषय पर अत्यधिक जोखिम नहीं लेना चाहता। साथ ही, कई दलों का मानना है कि जब तक सामाजिक असमानताएं पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं, तब तक आरक्षण की आवश्यकता बनी रहेगी। भविष्य की दृष्टि से अनेक नीति विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि आरक्षण व्यवस्था की समय-समय पर निष्पक्ष समीक्षा हो, वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचे, गुणवत्तापूर्ण विद्यालयी शिक्षा और कौशल विकास पर अधिक निवेश हो तथा जिन वर्गों में अपेक्षाकृत संपन्न तबका लगातार लाभ ले रहा है, वहां सुधार के विकल्पों पर विचार किया जाए। इससे सामाजिक न्याय और समान अवसर दोनों उद्देश्यों के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
अंततः यह प्रश्न केवल जातिगत आरक्षण बनाम आर्थिक आरक्षण का नहीं है। भारत जैसे विविध समाज में नीति-निर्माण का लक्ष्य ऐसा होना चाहिए जिसमें सामाजिक भेदभाव से प्रभावित लोगों को न्याय भी मिले और आर्थिक रूप से कमजोर प्रत्येक नागरिक को आगे बढ़ने का अवसर भी। आरक्षण पर बहस तथ्यों, संविधान और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर होनी चाहिए, न कि केवल भावनाओं या राजनीतिक नारों के आधार पर।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार/अरविंद नाथ तिवारी
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

