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भारत की आजादी में वीर बलिदानियों व महापुरुषों की भूमिका

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भारत की आजादी में वीर बलिदानियों व महापुरुषों की भूमिका


डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी

भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल किसी एक व्यक्ति, एक आंदोलन या एक विचारधारा की देन नहीं है। यह अनेक धारा, संघर्ष, बलिदानों और राजनीतिक प्रयोगों का परिणाम था। महात्मा गांधी का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश ऐसे दौर में हुआ जब कांग्रेस मुख्यतः शिक्षित और राजनीतिक वर्ग की संस्था थी। गांधी ने स्वतंत्रता के संघर्ष को गांव, किसान, मजदूर, महिलाओं और सामान्य जनता तक पहुंचाया। चंपारण सत्याग्रह, खेड़ा सत्याग्रह और अहमदाबाद मिल आंदोलन से लेकर असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन तक गांधी ने भारतीय राजनीति को जनआंदोलन का स्वरूप दिया, उन्होंने सामान्य भारतीय को यह विश्वास दिया कि बिना हथियार उठाए भी साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।

चंपारण इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। बिहार के चंपारण में नील की जबरन खेती और किसानों के शोषण के विरुद्ध गांधी का सत्याग्रह केवल स्थानीय किसान समस्या का आंदोलन नहीं था। उसने भारतीय जनता को यह अनुभव कराया कि संगठित और अहिंसक प्रतिरोध से सत्ता को झुकाया जा सकता है, लेकिन यह कहना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा कि गांधी के सत्याग्रह के कारण अकेले भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता का संघर्ष कई धाराओं में एक साथ चल रहा था। क्रांतिकारी आंदोलन, किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन, कांग्रेस की राजनीतिक गतिविधियां, समाजवादी विचारधारा और विदेशों में भारतीयों के प्रयासों ने भी ब्रिटिश शासन पर दबाव बनाया।

यहीं नेताजी सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सुभाषचंद्र बोस गांधी की रणनीति से सहमत नहीं थे। वे मानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से हटाने के लिए अधिक आक्रामक और सैन्य रणनीति आवश्यक है, उन्होंने आजाद हिंद सरकार की स्थापना की और आजाद हिंद फौज के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को सैन्य चुनौती देने का प्रयास किया। आजाद हिंद फौज सैन्य दृष्टि से अंततः ब्रिटिश सेना को पराजित नहीं कर सकी लेकिन उसका प्रभाव केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं था। युद्ध के बाद आजाद हिंद फौज के अधिकारियों पर चले मुकदमों ने पूरे देश में व्यापक जनभावना पैदा की। भारतीय सेना और जनता के भीतर यह भावना मजबूत हुई कि अंग्रेजों के लिए भारतीय सैनिकों की निष्ठा हमेशा के लिए सुनिश्चित नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक और सैन्य रूप से कमजोर हो चुका था। इसलिए भारत पर लंबे समय तक शासन बनाए रखना उसके लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया था।

इस दृष्टि से देखा जाय तो गांधी और सुभाष की भूमिकाओं को एक-दूसरे के विरोधी खेमों में रखकर समझना अधूरा होगा। गांधी ने भारतीय समाज को राजनीतिक रूप से जागृत और संगठित किया, जबकि सुभाष ने भारतीय स्वतंत्रता की आकांक्षा को अंतरराष्ट्रीय और सैन्य आयाम देने का प्रयास किया। एक ने जनशक्ति को संगठित किया, दूसरे ने औपनिवेशिक सत्ता के सैन्य आधार को चुनौती देने का प्रयास किया, इसके अतिरिक्त भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल और असंख्य क्रांतिकारियों के बलिदान ने भारतीय स्वतंत्रता चेतना को गहरा किया। सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने राजनीतिक संघर्ष को अलग-अलग स्तरों पर आगे बढ़ाया। लाखों अनाम भारतीयों ने जेलें भरीं, आर्थिक कठिनाइयां झेलीं और आंदोलन में भाग लिया।

इसलिए 15 अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता को किसी एक व्यक्ति की विजय कहना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। भारत की आजादी अनेक शक्तियों के संयुक्त दबाव का परिणाम थी। गांधी उस व्यापक संघर्ष के सबसे प्रभावशाली जननेताओं में से एक थे लेकिन वे अकेले स्वतंत्रता के निर्माता नहीं थे।

अब प्रश्न आता है- गांधी को राष्ट्रपिता क्यों कहा गया?

यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्रपिता गांधी की कोई संवैधानिक या विधिक उपाधि नहीं है। यह एक सम्मानसूचक संबोधन है, जो उनकी भूमिका और राष्ट्रीय जीवन पर उनके व्यापक प्रभाव के संदर्भ में प्रचलित हुआ। सुभाषचंद्र बोस ने 1944 में गांधी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। बाद के वर्षों में यह संबोधन जनमानस में व्यापक रूप से स्थापित हो गया।

आज के परिप्रेक्ष्य में गांधी की प्रासंगिकता पर भी बहस होनी चाहिए। गांधी के सभी विचारों को आंख बंद करके स्वीकार करना आवश्यक नहीं है, उनके आर्थिक विचार, औद्योगीकरण संबंधी दृष्टिकोण, जाति और सामाजिक प्रश्नों पर उनके विचार तथा राजनीतिक प्रयोग आज आलोचना और पुनर्मूल्यांकन के विषय हो सकते हैं लेकिन गांधी की अहिंसा, सत्य, जनभागीदारी, नैतिक राजनीति और सत्ता के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रतिरोध की अवधारणाएं आज भी महत्वपूर्ण हैं। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक और नागरिक अधिकार आंदोलनों ने गांधी के अहिंसक संघर्ष से प्रेरणा ली।

युवा पीढ़ी को गांधी से सहमत होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता बल्कि उसे गांधी, सुभाष, भगत सिंह और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को पढ़ने, उनके विचारों की तुलना करने और स्वयं निष्कर्ष निकालने का अवसर मिलना चाहिए। राष्ट्रभक्ति का अर्थ अपने इतिहास को ईमानदारी से समझना है। गांधी को राष्ट्रपिता मानना या न मानना व्यक्तिगत या वैचारिक प्रश्न हो सकता है, लेकिन उनकी ऐतिहासिक भूमिका से इनकार करना कठिन है। उसी प्रकार सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद फौज की भूमिका को कम करके देखना भी इतिहास के साथ अन्याय होगा।

भारत की आजादी गांधी की अहिंसा मात्र से नहीं मिली और न ही केवल सुभाषचंद्र बोस की सैन्य रणनीति से। गांधी के जनांदोलनों, सुभाष की चुनौती, क्रांतिकारियों के बलिदान, राजनीतिक नेतृत्व, जनता के व्यापक प्रतिरोध, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की कमजोर स्थिति और भारतीय सैनिकों तथा नौसैनिकों में बढ़ते असंतोष- इन सभी ने मिलकर वह ऐतिहासिक परिस्थिति बनाई जिसमें ब्रिटिश शासन के लिए भारत पर नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता गया।

इसलिए गांधी को समझने का सही तरीका उन्हें देवता बनाना नहीं बल्कि इतिहास के एक अत्यंत प्रभावशाली और जटिल व्यक्तित्व के रूप में देखना है। सुभाष को समझने का सही तरीका भी गांधी के विरोध में खड़ा करके उनकी महत्ता तय करना नहीं है। भारत की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति की निजी उपलब्धि नहीं थी; यह करोड़ों भारतीयों के संघर्ष का परिणाम थी।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी