जीवन का आधार है पर्यावरण
विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) पर विशेष
रमेश सर्राफ धमोरा
दुनिया में हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन लोगों को कई कार्यक्रमों के जरिये प्रकृति को संरक्षित रखने, पेड़-पौधे लगाने, हरे पेड़ न काटने, नदियों को साफ रखने और प्रकृति से खिलवाड़ न करने जैसी चीजों के लिए जागरुक किया जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस एक अभियान है। जिसका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए लोगों को प्रेरित करना है।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1972 में पहली बार विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया था। विश्व स्तर पर इसकी शुरुआत 5 जून 1974 को स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुई थी। जहां 119 देशों की मौजूदगी में पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन किया गया था। साथ ही प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का निर्णय लिया गया था। इस सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का गठन भी हुआ था। हर वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस के लिए एक थीम निर्धारित की जाती है। विश्व पर्यावरण दिवस 2026 की थीम है- जलवायु के लिए अभी। यह थीम जलवायु परिवर्तन की तात्कालिकता और इसके वास्तविक, ठोस समाधानों पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान करती है।
पर्यावरण दो शब्दों परि और आवरण से मिलकर बना है। परि का अर्थ होता है हमारे आसपास या हमारे चारों ओर। आवरण का अर्थ होता है हम चारों ओर जिससे घिरे हैं। अर्थात पर्यावरण का अर्थ हमारे आसपास के वातावरण से है। पर्यावरण पेड़-पौधों, वायु हमारे आसपास की सभी चीजों से मिलकर बनता है। पर्यावरण हमारे दैनिक जीवन से सीधा संबंध रखता है। मानव और पर्यावरण एक-दूसरे से संबंधित तथा एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। पर्यावरण प्रदूषण जैसे पेड़ों का कम होना, वायु प्रदूषण आदि मनुष्य के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालता हैं। मानव की अच्छी बुरी आदतों का प्रभाव सीधा पर्यावरण पर पड़ता है। विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य मानव जाति को पर्यावरण के प्रति सचेत करना हैं। उसका उद्देश्य पूरी प्रकृति व पर्यावरण की सुरक्षा करना है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की मेकिंग पीस विद नेचर रिपोर्ट पृथ्वी पर मंडरा रहे तीन बड़े पर्यावरणीय संकटों जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान और प्रदूषण से निपटने के लिए एक वैज्ञानिक खाका प्रदान करती है। रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता की हानि और प्रदूषण तीनों आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। ये मानव अस्तित्व के लिए एक स्व-निर्मित खतरा हैं। प्रदूषण के कारण हर साल लगभग 90 लाख लोग असामयिक रूप से अपनी जान गंवाते हैं। लगभग 10 लाख प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं।
मानवता ने पिछले 50 वर्षों में प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक और अस्थिर दोहन किया है जिससे हमारी पृथ्वी की जीवन-समर्थन क्षमता कमजोर हो गई है। सतत भविष्य के लिए जरूरी है कि अर्थव्यवस्थाओं और वित्तीय प्रणालियों को इस तरह से बदला जाए जो प्रकृति को नुकसान पहुंचाने के बजाय उसे बहाल करने में निवेश करें।
पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए 2030 तक कार्बन डाइऑक्साइड के वैश्विक उत्सर्जन में 2010 की तुलना में 45% की कमी और 2050 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करना अनिवार्य है। भोजन, ऊर्जा और सामग्री के उत्पादन के वर्तमान तरीकों में सुधार करना होगा ताकि पृथ्वी के संसाधनों का अधिक न्यायसंगत और सुरक्षित उपयोग हो सके। सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जलवायु, जैव विविधता और प्रदूषण से जुड़ी नीतियों को एक साथ लागू करने की आवश्यकता है। रिपोर्ट इस निष्कर्ष पर जोर देती है कि आने वाले दशकों में प्रकृति के साथ शांति स्थापित करना मानवता के लिए सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक कार्य है।
सरकार हर वर्ष नदियों के पानी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अरबों रुपए खर्च करती आ रही है। उसके उपरांत भी नदियों का पानी शुद्ध नहीं हो पाता है। मगर देश में लाकडाउन के चलते बिना कुछ खर्च किए नदियों का पानी अपने आप शुद्ध हो गया था। पर्यावरणविदों के मुताबिक जिन नदियों के पानी से स्नान करने पर चर्म रोग होने की संभावनाएं व्यक्त की जाती थी, उन नदियों का पानी शुद्ध हो जाना बहुत बड़ी बात थी। देश की सबसे अधिक प्रदूषित मानी जाने वाली गंगा नदी सबसे शुद्ध जल वाली नदी बन गयी थी। वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा का पानी साफ होने की वजह पानी में घुले डिसाल्वड की मात्रा में आई 500 प्रतिशत की कमी थी।
देश में तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण बड़ी मात्रा में कृषि भूमि आबादी की भेंट चढ़ती गई। जिस कारण वहां के पेड़ पौधे काट दिये गये व नदी नालों को बंद कर बड़े-बड़े भवन बना दिए गए। जिससे वहां रहने वाले पशु, पक्षी अन्यत्र चले गए। पुराने समय में पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिये बड़-पीपल जैसे घने छायादार पेड़ों को काटने से रोकने के लिये उनकी देवताओं के रूप में पूजा की जाती रही है। इसी कारण गावों में आज भी लोग बड़, पीपल का पेड़ नहीं काटते हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के दूसरे तरीकों सहित सभी देशों के लोगों को एक साथ लाकर जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने और जंगलों के प्रबन्ध को सुधारना है। वास्तविक रुप में पृथ्वी को बचाने के लिये आयोजित इस उत्सव में सभी आयु वर्ग के लोगों को सक्रियता से शामिल करना होगा। तेजी से बढ़ते शहरीकरण व लगातार काटे जा रहे पड़ो के कारण बिगड़ते पर्यावरण संतुलन पर रोक लगानी होगी।
प्रदूषण के उच्च स्तर के कारण आज हमारा पर्यावरण खतरे में हैं। पर्यावरण के सभी घटक जीवमंडल, जलमंडल, वायुमंडल सभी प्रदूषण में फंस गए हैं। प्रदूषण का बढ़ता प्रभाव सामान्य प्राकृतिक पर्यावरण को बहुत अधिक प्रभावित कर रहा हैं। ज्वालामुखी का फटना जंगल में अपने आप आग लगना आदि प्राकृतिक प्रदूषण की घटनाएं हैं। जल का मैला होना, वाहनों से निकलने वाला धुआं, कल-कारखानों से निकलने वाला धुएं से उत्पन्न होने वाला प्रदूषण, वनों की कटाई आदि मानव द्वारा निर्मित प्रदूषण हैं। मानव द्वारा निर्मित प्रदूषण से प्रकृति व पर्यावरण का विनाश तेजी से हो रहा हैं। प्रदूषण के मुख्य रूप जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और मृदा प्रदूषण हैं। ऐसे में पर्यावरण प्रबंधन की वर्तमान में बहुत आवश्यकता है।
आज पर्यावरण प्रदूषण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या और बड़ी-बड़ी इमारतों के कारण पर्यावरण की प्रकृति नष्ट हो रही है। हर जगह-जगह घने वृक्ष काट कर बड़ी बिल्डिंगों का निर्माण करना पर्यावरण और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हैं। इतना ही नहीं जहां वाहनों का धुआं, मशीनों की आवाज, खराब रासायनिक जल आदि की वजह से, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण हो रहा है। जिसके कारण हमें अनेक बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। पर्यावरण के अभाव में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
हमें भविष्य में जीवन को बचाये रखने के लिए पर्यावरण की सुरक्षा को सुनिश्चित करना होगा। यह पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। हर व्यक्ति को आगे आकर पर्यावरण संरक्षण की मुहिम का हिस्सा बनना होगा तभी हम पृथ्वी को सुरक्षित रख सकेंगे। इस दिन हमें आमजन को भागीदार बना कर उन्हें इस बात का अहसास करवाना होगा कि बिगड़ते पर्यावरण असंतुलन का खामियाजा हमें व हमारी आने वाली पीढ़ियों को उठाना पड़ेगा। इसलिये हमें अभी से पर्यावरण को लेकर सतर्क व सजग होने की जरूरत है। हमें पर्यावरण संरक्षण की दिशा में तेजी से काम करना होगा तभी हम बिगड़ते पर्यावरण असंतुलन को संतुलित कर पाएंगे। तभी हमारी आने वाली पीढ़ियां शुद्ध हवा में सांस ले पाएगी।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / रमेश

