home page

वंदे मातरम साझा विरासत है, इसके भाव को समझना जरूरी

 | 
वंदे मातरम साझा विरासत है, इसके भाव को समझना जरूरी


डाॅ.अरविंद नाथ तिवारी

स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने का अवसर नहीं है, बल्कि यह उन संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रीय प्रतीकों को स्मरण करने का दिन भी है, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता की चेतना को मजबूत किया। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण संस्करण के गायन को लेकर जिस प्रकार का राजनीतिक विवाद सामने आया है, उसने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि राष्ट्रभक्ति के प्रतीकों को राजनीति से कितना अलग रखा जा सकता है।

15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गायन के दौरान सोनिया गांधी की कुछ गतिविधियों को भाजपा नेताओं ने गीत को रोकने अथवा उसके पूर्ण गायन पर आपत्ति के रूप में प्रस्तुत किया। कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रयास नहीं था और संबंधित हाव-भाव का अर्थ अलग था। इसलिए उपलब्ध वीडियो और बयानों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी नेता ने जानबूझकर राष्ट्रगीत का अपमान किया,लेकिन विवाद का दूसरा पक्ष अधिक महत्वपूर्ण है—क्या ‘वंदे मातरम्’ का पूरा गायन होना चाहिए? इसका उत्तर भावनात्मक राजनीति से नहीं, बल्कि इतिहास और संवैधानिक परंपरा के आधार पर तलाशना चाहिए।

‘वंदे मातरम्’ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इस गीत ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्र भारत में 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया था कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान रहेगा और ‘वंदे मातरम्’ कोडाॅ.अरविंद नाथ तिवारी

भी समान सम्मान दिया जाएगा।

यहां एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य समझना जरूरी है। ‘वंदे मातरम्’ की पूरी रचना और सार्वजनिक समारोहों में प्रचलित इसके पहले दो पदों में अंतर है। ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से कांग्रेस ने 1937 में सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए इसके पहले दो पदों को स्वीकार किया था। इसलिए आज यदि कोई राजनीतिक दल पहले दो पदों का गायन करता है, तो उसे सीधे राष्ट्रगीत के अपमान के रूप में देखना इतिहास की जटिलता को नजरअंदाज करना होगा।

दूसरी ओर, वर्तमान केंद्र सरकार ने 2026 में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर इसके छह पदों वाले पूर्ण संस्करण को व्यापक रूप से प्रस्तुत करने की पहल की है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, 26 मार्च 2026 से आकाशवाणी के प्रसारण में छह पदों वाला संस्करण शामिल किया गया, जिसकी अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है। सरकार ने इस वर्ष देशभर में पूर्ण संस्करण के सामूहिक गायन और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी प्रोत्साहित किया है।

इसलिए पूर्ण ‘वंदे मातरम्’ का गायन अपने आप में न तो गलत है और न ही असंवैधानिक। बल्कि उचित सम्मान और गरिमा के साथ इसका गायन राष्ट्रीय चेतना को मजबूत कर सकता है। समस्या तब पैदा होती है ,जब किसी राष्ट्रीय प्रतीक को किसी एक राजनीतिक दल की विचारधारा या दूसरे दल के विरुद्ध राजनीतिक हथियार बना दिया जाता है।

इस विवाद में सत्ता पक्ष का तर्क है कि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता संग्राम का अमूल्य प्रतीक है, इसलिए इसके पूर्ण गायन में बाधा डालना राष्ट्रभावना का अपमान है। यह तर्क भावनात्मक रूप से प्रभावशाली है। दूसरी ओर, विपक्ष यह कह सकता है कि किसी व्यक्ति के हाव-भाव या कुछ सेकंड के वीडियो के आधार पर उसकी देशभक्ति पर सवाल उठाना उचित नहीं है। कांग्रेस ने भी यही स्पष्टीकरण दिया है कि गीत को रोकने का प्रयास नहीं किया गया था।

मेरी दृष्टि में दोनों पक्षों के बीच वास्तविक बहस यहीं से शुरू होनी चाहिए। राष्ट्रभक्ति को किसी पार्टी की संपत्ति नहीं बनाया जा सकता। ‘वंदे मातरम्’ केवल भाजपा का नहीं है, कांग्रेस का भी नहीं है और किसी अन्य दल का भी नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की साझा विरासत है। जिस प्रकार तिरंगा किसी दल का झंडा नहीं है, उसी प्रकार राष्ट्रगीत भी किसी राजनीतिक संगठन की पहचान नहीं हो सकता।

पूर्ण गायन के लाभ स्पष्ट हैं,इससे युवा पीढ़ी को ‘वंदे मातरम्’ के मूल साहित्यिक और ऐतिहासिक स्वरूप से परिचित होने का अवसर मिलेगा। स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से नई पीढ़ी का संबंध मजबूत होगा। सामूहिक गायन से राष्ट्रीय एकता, देशप्रेम और सांस्कृतिक चेतना को बल मिल सकता है। सरकार द्वारा 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों का घोषित उद्देश्य भी राष्ट्रीय गौरव और एकता की भावना को मजबूत करना है,लेकिन इसके कुछ संभावित नुकसान भी हैं।

यदि पूर्ण ‘वंदे मातरम्’ को किसी व्यक्ति की देशभक्ति जांचने का पैमाना बना दिया गया, तो इससे सामाजिक और धार्मिक विभाजन बढ़ सकता है। भारत जैसे बहुधार्मिक देश में राष्ट्रीय एकता तभी मजबूत होगी जब देशभक्ति स्वैच्छिक सम्मान, संवैधानिक मूल्यों और पारस्परिक संवेदनशीलता पर आधारित हो। राष्ट्रगीत का सम्मान आवश्यक है, लेकिन उसके नाम पर राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए नुकसानदेह होंगे ,इसलिए वर्तमान विवाद का सबसे उचित निष्कर्ष यही है कि ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण गायन किया जा सकता है और उसे सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन इसे राजनीतिक निष्ठा की परीक्षा नहीं बनाया जाना चाहिए। सत्ता पक्ष को भी यह समझना होगा कि राष्ट्रवाद केवल विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने का माध्यम नहीं है, और विपक्ष को भी यह स्वीकार करना होगा कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संवेदनशीलता लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।

देश को आज ऐसी राजनीति की जरूरत है जिसमें ‘वंदे मातरम्’ पर विवाद खड़ा करने के बजाय उसके पीछे छिपे भाव—मातृभूमि के प्रति सम्मान, स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान, राष्ट्रीय एकता और भारत की गरिमा—को समझा जाय, यदि पूरा गीत देश को जोड़ता है तो उसका स्वागत होना चाहिए, यदि उसके किसी हिस्से को लेकर ऐतिहासिक या धार्मिक संवेदनशीलता है, तो उसका समाधान संवाद से होना चाहिए।

अंततः ‘वंदे मातरम्’ का सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि उसके नाम पर भारतीय समाज को बांटा न जाए। राष्ट्रगीत को राजनीति का हथियार बनाने के बजाय राष्ट्र की साझा विरासत के रूप में स्वीकार किया जाए। सत्ता और विपक्ष दोनों यदि इस भावना को समझ लें, तो वर्तमान विवाद देश को बांटने के बजाय राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का अवसर बन सकता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी