home page

दिमागी नक्सलवादः बंदूक से विचार तक की चुनौती

 | 
दिमागी नक्सलवादः बंदूक से विचार तक की चुनौती


डॉ. अरविंद नाथ तिवारी

15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 21वीं सदी की उन दशकों पुरानी चुनौतियों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिन्होंने भारत की विकास यात्रा को लंबे समय तक प्रभावित किया, तो उनके भाषण का एक शब्द विशेष रूप से चर्चा का विषय बन गया—‘दिमागी नक्सल।’

प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद और माओवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में नहीं देखा बल्कि उसके कारण बर्बाद हुए युवा, उजड़े परिवार और माताओं से छिने उनके बेटों की पीड़ा का भी उल्लेख किया। उनका संदेश स्पष्ट था कि बंदूक उठाने वाला नक्सलवाद जितना खतरनाक है, उतना ही खतरनाक वह विचार भी हो सकता है, जो हिंसा, अलगाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास को वैचारिक समर्थन देता है।

यहीं से ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर देश में नई बहस शुरू हुई है।

भारत में नक्सलवाद का इतिहास कई दशक पुराना है। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे देश के अनेक हिस्सों में फैलता गया। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के कई क्षेत्रों में नक्सली हिंसा ने अपनी जड़ें जमाईं। एक समय ऐसा था जब देश के बड़े भूभाग को वामपंथी उग्रवाद प्रभावित माना जाता था। सड़क निर्माण से लेकर स्कूल भवन तक, सरकारी संस्थान से लेकर सुरक्षा बलों के शिविरों तक, हिंसा का साया दिखाई देता था।

बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों में नक्सली गतिविधियों का प्रभाव लंबे समय तक रहा। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में तो स्थिति और भी गंभीर रही। सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला, बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल, सरकारी संपत्ति को नुकसान और निर्दोष ग्रामीणों पर दबाव—इन घटनाओं ने विकास की गति को प्रभावित किया।

यह कहना उचित होगा कि नक्सलवाद का सबसे बड़ा नुकसान केवल सुरक्षा बलों या सरकारी संपत्ति को नहीं हुआ। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन गरीब और आदिवासी परिवारों को हुआ, जिनके नाम पर नक्सली राजनीति करने का दावा करते रहें। जिन क्षेत्रों में विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सबसे अधिक आवश्यकता थी, उन्हीं क्षेत्रों में हिंसा ने विकास के रास्ते को लंबे समय तक बाधित किया।

केंद्र सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए सुरक्षा कार्रवाई के साथ-साथ सड़क, मोबाइल नेटवर्क, बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर दिया। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, बेहतर खुफिया तंत्र और केंद्र-राज्य के समन्वय के कारण नक्सली हिंसा का प्रभाव काफी कम हुआ है।

हालांकि, इस परिवर्तन को केवल किसी एक सरकार की उपलब्धि के रूप में देखना इतिहास को सरल बनाना होगा। नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष में अनेक सरकार, सुरक्षा बल और राज्य पुलिस के जवानों ने बलिदान दिया है, लेकिन यह भी तथ्य है कि पिछले वर्षों में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास की रणनीति को अधिक आक्रामक और समन्वित रूप दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप नक्सली हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई।

सवाल है कि प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ क्यों कहा?

इस शब्द का अर्थ समझने के लिए हमें बंदूक से आगे बढ़कर विचार की दुनिया को समझना होगा। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना नागरिक अधिकार है। सत्ता की नीतियों का विरोध करना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। किसी विचारधारा से असहमति भी लोकतांत्रिक अधिकार है। इसलिए हर सरकार-विरोधी व्यक्ति, हर वामपंथी विचारक या हर आलोचक को ‘दिमागी नक्सल’ कहना न तो उचित होगा और न ही लोकतांत्रिक दृष्टि से स्वीकार्य।

लेकिन यदि कोई विचार हिंसा को जायज ठहराता है, संवैधानिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने को लक्ष्य बनाता है, युवाओं को लोकतांत्रिक रास्ते के बजाय हथियार उठाने के लिए प्रेरित करता है या देश की एकता और अखंडता को कमजोर करने वाली हिंसक राजनीति को वैचारिक संरक्षण देता है, तो उस विचारधारा पर सवाल उठाना आवश्यक है।

यही ‘दिमागी नक्सल’ की बहस का मूल बिंदु होना चाहिए।

आज का भारत 20वीं सदी के भारत से अलग है। सोशल मीडिया, इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विचारों के प्रसार को अत्यंत तेज कर दिया है। एक विचार कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे में हिंसा या अतिवाद को वैचारिक रूप से आकर्षक बनाना पहले की तुलना में आसान भी हो गया है।

युवाओं के सामने आज रोजगार, शिक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और सामाजिक अवसरों की नई दुनिया है। ऐसे समय में उन्हें हिंसा, घृणा और अलगाव की राजनीति से दूर रखना केवल सरकार का नहीं, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षण संस्थानों और नागरिक संगठनों का भी दायित्व है।

नक्सलवाद के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। जिन क्षेत्रों में दशकों तक गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और प्रशासनिक उपेक्षा रही, वहां केवल बंदूक के बल पर समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। सुरक्षा के साथ विकास आवश्यक है। सड़क पहुंचेगी तो बाजार पहुंचेगा। स्कूल खुलेगा तो शिक्षा पहुंचेगी। अस्पताल बनेगा तो स्वास्थ्य सुविधा मिलेगी। मोबाइल नेटवर्क पहुंचेगा तो सूचना का अधिकार मजबूत होगा। बैंकिंग सुविधा पहुंचेगी तो आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी।

इसलिए नक्सलवाद के खिलाफ अंतिम लड़ाई केवल जंगलों में नहीं बल्कि गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और विकास की कमी के खिलाफ भी लड़नी होगी।

मनमोहन सिंह सरकार के समय देश के कई हिस्सों में नक्सली हिंसा गंभीर चुनौती बनी हुई थी। सुरक्षा बलों के जवानों पर हमले होते थे और कई इलाकों में सरकारी मशीनरी की पहुंच सीमित थी। उस दौर की परिस्थितियों को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि आज नक्सली हिंसा में आई कमी कितनी महत्वपूर्ण है। लेकिन इतिहास का निष्पक्ष मूल्यांकन यही कहेगा कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई किसी एक राजनीतिक दल की नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र और भारतीय राज्य की सामूहिक लड़ाई रही है। केंद्र की अलग-अलग सरकारों और राज्यों की सरकारों ने अपने-अपने स्तर पर प्रयास किए। सबसे बड़ा श्रेय उन सुरक्षा बलों और पुलिसकर्मियों को जाता है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपना जीवन देश के लिए न्योछावर किया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय गंभीर राष्ट्रीय बहस हो। क्या किसी विचार को हिंसा का समर्थन करने का अधिकार है? क्या लोकतंत्र में बदलाव का रास्ता बंदूक हो सकता है? क्या असहमति और हिंसक विद्रोह के बीच अंतर स्पष्ट नहीं होना चाहिए? इन सवालों के जवाब देश को तलाशने होंगे।

भारत की शक्ति उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में है। यहां सत्ता बदलने के लिए चुनाव हैं, सरकार की आलोचना के लिए स्वतंत्र मीडिया और सार्वजनिक मंच हैं, न्याय के लिए न्यायपालिका है और अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान है। जब इतने लोकतांत्रिक रास्ते उपलब्ध हों, तब हिंसा को परिवर्तन का माध्यम बनाना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। इसलिए प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को केवल राजनीतिक नारे के रूप में देखने के बजाय एक चेतावनी के रूप में भी समझा जा सकता है—हिंसा की बंदूक भले ही कमजोर पड़ जाए, लेकिन यदि हिंसा को जन्म देने वाली मानसिकता जीवित रहती है तो चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

भारत को नक्सलवाद से मुक्त करने का अंतिम लक्ष्य केवल जंगलों में हथियारों की आवाज बंद करना नहीं होना चाहिए। अंतिम लक्ष्य ऐसा भारत बनाना होना चाहिए जहां किसी युवा को बंदूक उठाने की आवश्यकता महसूस न हो, जहां आदिवासी और गरीब समाज विकास से वंचित न रहे, जहां असहमति लोकतांत्रिक संवाद में व्यक्त हो और जहां परिवर्तन का रास्ता संविधान से होकर गुजरे। यही नक्सलवाद के खिलाफ स्थायी विजय होगी। बंदूक से नक्सलवाद को हराया जा सकता है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ को समाप्त करने के लिए विचार का मुकाबला विचार, विकास और लोकतंत्र से ही करना होगा।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी