बिहार में सुशासन की कसौटी पर भरत तिवारी प्रकरण
डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति राज्य की दंडात्मक क्षमता नहीं बल्कि कानून का शासन होता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि न्याय कानून की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार हो, न कि संदेह, शक्ति या दबाव के आधार पर। जब किसी पुलिस मुठभेड़ पर गंभीर प्रश्न उठने लगें, जब न्यायिक प्रक्रिया से पहले गोलियों की गूंज सुनाई दे और जब देश के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता सार्वजनिक मंच से गंभीर आरोप लगाएँ, तब वह घटना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का मामला नहीं रह जाती बल्कि शासन, प्रशासन और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन जाती है।
भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में हुए भरत तिवारी एनकाउंटर ने बिहार की राजनीति और प्रशासन के सामने ऐसे ही अनेक सवाल खड़े कर दिये हैं। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव कुमार सिंह ने मीडिया के समक्ष दावा किया है कि यह कोई सामान्य पुलिस मुठभेड़ नहीं थी। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरे घटनाक्रम के पीछे जवइनिया गांव के विस्थापितों के लिए आई लगभग 1400 करोड़ रुपये की राशि से जुड़े कथित वित्तीय घोटाले को छिपाने का उद्देश्य था।
आरोपों की सत्यता का निर्णय केवल सक्षम न्यायालय अथवा निष्पक्ष जांच एजेंसी ही कर सकती है। इसलिए किसी भी पक्ष को दोषी या निर्दोष घोषित करना अभी न्यायोचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि इतने गंभीर आरोपों को केवल सरकारी बयान या औपचारिक स्पष्टीकरण से खारिज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में पारदर्शिता केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की आधारशिला होती है। यदि जनता के मन में संदेह पैदा हो जाय तो उस संदेह का समाधान निष्पक्ष जांच से ही संभव है।
बिहार लंबे समय से सुशासन की राजनीति का दावा करता रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक पहचान कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक सुधार और जवाबदेह शासन के आधार पर बनी है। भारतीय जनता पार्टी भी सुशासन, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई को अपनी प्रमुख राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में शामिल करती रही है। ऐसे में यदि किसी पुलिस मुठभेड़ पर व्यापक संदेह पैदा होता है तो उसका प्रभाव केवल पुलिस विभाग तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी शासन व्यवस्था की साख पर पड़ता है।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार देता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति के अपराध का निर्धारण न्यायालय करेगा, पुलिस नहीं। यदि कोई व्यक्ति गंभीर अपराधों का आरोपी भी हो, तब भी उसे न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने का अधिकार प्राप्त है। लोकतंत्र में पुलिस का दायित्व अपराधियों को कानून के समक्ष प्रस्तुत करना है, न कि स्वयं अभियोजन, न्यायाधीश और दंडाधिकारी की भूमिका निभाना। यही कारण है कि देश की सर्वोच्च अदालत भी विवादित पुलिस मुठभेड़ों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर बार-बार बल देती रही है।
भरत तिवारी प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि वह निर्दोष थे या दोषी। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या बिहार में कानून की प्रक्रिया पर जनता का भरोसा पहले जैसा बना हुआ है? यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि न्यायिक प्रक्रिया के स्थान पर मुठभेड़ ही अंतिम रास्ता बनती जा रही है, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होगी। कानून का शासन केवल अपराधियों को दंडित करने से नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने से मजबूत होता है।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है। विपक्ष स्वाभाविक रूप से इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़ेगा। वहीं, सरकार के पास यह अवसर भी है कि वह निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच कराकर यह संदेश दे कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। यदि जांच निष्पक्ष होगी और दोषी पाये जाने वाले किसी भी व्यक्ति पर बिना भेदभाव कार्रवाई होगी, तो जनता का विश्वास और मजबूत होगा, लेकिन यदि जांच की निष्पक्षता पर ही प्रश्न उठते रहे, तो यह विवाद सरकार की राजनीतिक छवि पर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ सकता है।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों, विशेषकर उपचुनावों के परिणामों को लेकर भी विभिन्न प्रकार के विश्लेषण सामने आ रहे हैं। कुछ विश्लेषक इन्हें जनता के बदलते राजनीतिक मूड से जोड़ रहे हैं। हालांकि किसी एक चुनाव परिणाम को सीधे इस प्रकरण से जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि चुनाव अनेक स्थानीय, सामाजिक और राजनीतिक कारणों से प्रभावित होते हैं। फिर भी इतना स्पष्ट है कि आज का मतदाता केवल विकास योजनाओं और घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होता। वह न्याय, पारदर्शिता, संवैधानिक मूल्यों और जवाबदेही को भी उतना ही महत्व देता है।
लोकतंत्र में सरकारें केवल चुनाव जीतने से मजबूत नहीं होतीं बल्कि जनता के विश्वास से होती हैं। यह विश्वास तभी कायम रहता है जब न्याय केवल किया ही न जाय, बल्कि निष्पक्ष रूप से होता हुआ दिखाई भी दे। भरत तिवारी प्रकरण का अंतिम सत्य जो भी हो, बिहार के हित में यही आवश्यक है कि पूरे मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो, यदि ऐसा होता है तो न केवल सच्चाई सामने आयेगी, बल्कि कानून के शासन और सुशासन की अवधारणा भी मजबूत होगी, यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी अपेक्षा है और यही बिहार की शासन व्यवस्था के सामने वास्तविक कसौटी भी।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

