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तमिलनाडुः हिंदू बहुसंख्यक राज्य में भी द्रविड़ राजनीति क्यों पड़ती है भारी?

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तमिलनाडुः हिंदू बहुसंख्यक राज्य में भी द्रविड़ राजनीति क्यों पड़ती है भारी?


- डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत की राजनीति को अक्सर सरल समीकरण में समझने की कोशिश की जाती है- जहाँ हिंदू आबादी अधिक होगी, वहाँ भारतीय जनता पार्टी स्वतः मजबूत होगी। लेकिन तमिलनाडु इस धारणा को चुनौती देता है। तमिलनाडु में हिंदू आबादी लगभग 85 प्रतिशत से अधिक है। राज्य मंदिरों, परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं के लिए प्रसिद्ध है, फिर भी भाजपा यहाँ अब तक वैसी राजनीतिक सफलता हासिल नहीं कर पाई जो उसे उत्तर और पश्चिम भारत के कई राज्यों में मिली। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है? क्या तमिलनाडु की राजनीति धर्म से अलग किसी और आधार पर चलती है? या भाजपा राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक मानसिकता को अब तक पूरी तरह समझ नहीं पाई?

तमिलनाडु को समझने के लिए सबसे पहले उसके राजनीतिक इतिहास को समझना जरूरी है। यह राज्य केवल चुनावी राजनीति से नहीं बल्कि एक बड़े सामाजिक आंदोलन से प्रभावित रहा है। बीसवीं सदी में ई. वी. रामासामी यानी पेरियार के नेतृत्व में द्रविड़ आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ब्राह्मणवादी वर्चस्व, जातिगत ऊँच-नीच और उत्तर भारतीय प्रभुत्व का विरोध था। पेरियार ने तर्कवाद, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता को राजनीति का केंद्र बनाया। बाद में इसी विचारधारा से डीएमके और एआईएडीएमके जैसी शक्तिशाली पार्टियाँ उभरीं।

यही वह बिंदु है जहाँ तमिलनाडु की राजनीति बाकी भारत से अलग हो जाती है। उत्तर भारत में जहाँ धार्मिक पहचान अक्सर चुनावी राजनीति का बड़ा आधार बनती है, वहीं तमिलनाडु में “तमिल पहचान” अधिक महत्वपूर्ण रही। यहाँ भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय गर्व को राजनीति के केंद्र में रखा गया। लोगों के भीतर यह भावना गहरी रही कि दिल्ली की राजनीति तमिल समाज की विशिष्टता को पूरी तरह नहीं समझती। भाजपा को कई बार इसी कारण उत्तर भारतीय पार्टी के रूप में देखा गया।

तमिलनाडु में हिंदी विरोध का इतिहास भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बना। 1960 के दशक में जब हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने की कोशिश हुई, तब तमिलनाडु में बड़े आंदोलन हुए। लोगों को लगा कि उनकी भाषा और संस्कृति पर खतरा है। यही आंदोलन द्रविड़ दलों को मजबूत बनाने का कारण बना। आज भी तमिल पहचान और भाषा का मुद्दा यहाँ बेहद संवेदनशील है। भाजपा भले हिंदी थोपने से इनकार करे लेकिन उसके राष्ट्रीय विमर्श को कई लोग हिंदी और उत्तर भारतीय संस्कृति के प्रभाव से जोड़कर देखते हैं।

यह कहना गलत होगा कि तमिलनाडु में हिंदू धर्म का प्रभाव नहीं है। राज्य में प्रसिद्ध मंदिरों की लंबी परंपरा है- मीनाक्षी अम्मन मंदिर, रामनाथस्वामी मंदिर और बृहदीश्वर मंदिर जैसे धार्मिक स्थल केवल पूजा के केंद्र नहीं बल्कि तमिल संस्कृति और गौरव का हिस्सा भी हैं। लेकिन तमिलनाडु में धार्मिक आस्था का अर्थ हमेशा राजनीतिक हिंदुत्व नहीं रहा। यहाँ लोग मंदिरों में गहरी श्रद्धा रखते हैं लेकिन वोट देते समय क्षेत्रीय हित, सामाजिक न्याय और स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं।

भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि वह लंबे समय तक तमिलनाडु में मजबूत स्थानीय नेतृत्व तैयार नहीं कर पाई। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ, गुजरात में नरेन्द्र मोदी और मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान समय-समय पर भाजपा की क्षेत्रीय ताकत का चेहरा बने। लेकिन तमिलनाडु में दशकों तक पार्टी के पास ऐसा कोई जनाधार वाला नेता नहीं था जो आम तमिल मतदाता से भावनात्मक जुड़ाव बना सके। हाल के वर्षों में के. अन्नामलाई ने भाजपा को नई ऊर्जा दी है लेकिन अभी भी पार्टी का संगठन राज्य के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में उतना मजबूत नहीं जितना द्रविड़ दलों का है।

तमिलनाडु की राजनीति में सामाजिक न्याय और आरक्षण का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है। द्रविड़ आंदोलन ने पिछड़े वर्गों और गैर-ब्राह्मण समुदायों को राजनीतिक शक्ति दी। यही कारण है कि राज्य में सामाजिक न्याय की राजनीति बहुत गहराई से स्थापित हो चुकी है। भाजपा की छवि लंबे समय तक अलग रही है। हालांकि भाजपा ने अब पिछड़े वर्गों और दलित समुदायों तक पहुँच बढ़ाने की कोशिश की है लेकिन तमिलनाडु में द्रविड़ दलों की सामाजिक पकड़ अब भी ज्यादा मजबूत है।

इसके अलावा तमिलनाडु में कल्याणकारी राजनीति का मॉडल भी दूसरे दलों के लिए चुनौतीपूर्ण है। मुफ्त राशन, महिला सहायता योजनाएँ, छात्रवृत्तियाँ, स्वास्थ्य सेवाएँ और सब्सिडी जैसी योजनाओं ने द्रविड़ दलों को जनता से गहराई से जोड़े रखा। यहाँ मतदाता केवल वैचारिक मुद्दों पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सुविधाओं और राज्य सरकार की योजनाओं के आधार पर भी वोट करते हैं। भाजपा का राष्ट्रीय विकास मॉडल लोगों को आकर्षित करता है लेकिन तमिलनाडु में स्थानीय कल्याणकारी राजनीति की पकड़ बहुत मजबूत है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि तमिलनाडु में राजनीति का भावनात्मक केंद्र “क्षेत्रीय स्वाभिमान” रहा है। यहाँ लोग खुद को पहले तमिल मानते हैं- हालाँकि इसका अर्थ अलगाववाद नहीं बल्कि सांस्कृतिक गर्व है। भाजपा का राष्ट्रवादी विमर्श कई बार इस क्षेत्रीय अस्मिता से टकराता दिखाई देता है। द्रविड़ दल इस भावना को लगातार मजबूत करते रहे हैं कि वे “तमिल हितों” के असली रक्षक हैं।

यह भी सच है कि भाजपा पूरी तरह कमजोर नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है। शहरी क्षेत्रों, शिक्षित युवाओं और कुछ मध्यमवर्गीय समूहों में पार्टी ने अपनी उपस्थिति मजबूत की है। सोशल मीडिया और राष्ट्रवादी मुद्दों के माध्यम से भाजपा ने राज्य में नई राजनीतिक जगह बनाने की कोशिश की है। लेकिन वोट प्रतिशत बढ़ना और सत्ता तक पहुँचना दोनों अलग बातें हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ दलों का संगठनात्मक नेटवर्क, बूथ स्तर की पकड़ और दशकों पुरानी राजनीतिक संस्कृति भाजपा के लिए बड़ी बाधा बनी हुई है।

इसके साथ ही गठबंधन की राजनीति भी एक महत्वपूर्ण कारण है। तमिलनाडु में चुनाव अक्सर बड़े गठबंधनों के आधार पर लड़े जाते हैं। द्रविड़ दलों ने समय-समय पर राष्ट्रीय पार्टियों को अपने साथ जोड़कर चुनावी समीकरण मजबूत किए। भाजपा कभी एआईएडीएमके के साथ रही लेकिन यह गठबंधन उसे व्यापक जनसमर्थन में तब्दील नहीं करा पाया। कई मतदाता भाजपा को सहयोगी पार्टी के रूप में स्वीकार करते हैं लेकिन मुख्य शक्ति के रूप में नहीं।

तमिलनाडु की राजनीति यह भी दिखाती है कि भारत केवल धार्मिक पहचान से नहीं चलता। यहाँ भाषा, संस्कृति, जातीय संरचना, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय भावनाएँ मिलकर राजनीति को आकार देती हैं। यही कारण है कि हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद राज्य में भाजपा को वैसी सफलता नहीं मिली जैसी उत्तर भारत के कई राज्यों में मिली।

दरअसल, तमिलनाडु भारतीय लोकतंत्र का अलग अध्याय है। यहाँ मंदिर भी हैं, आस्था भी है, धार्मिक परंपराएँ भी हैं लेकिन राजनीति का केंद्र केवल धर्म नहीं है। यहाँ मतदाता अपनी क्षेत्रीय पहचान, सामाजिक अधिकारों और स्थानीय मुद्दों को भी उतनी ही गंभीरता से देखते हैं। भाजपा यदि तमिलनाडु में मजबूत होना चाहती है तो उसे केवल हिंदुत्व की राजनीति से आगे बढ़कर तमिल समाज की सांस्कृतिक संवेदनाओं, भाषा, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को गहराई से समझना होगा।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश