स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती : एक संत की हत्या पर न्याय का इंतजार
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत के लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के सामने कुछ ऐसे प्रश्न खड़े हैं, जिनका उत्तर सिर्फ शासन की नीयत और प्रशासनिक जवाबदेही में छिपा हुआ है। ओडिशा के प्रसिद्ध संत, जनजातीय समाज के हितैषी और सनातन संस्कृति के प्रखर प्रवक्ता श्रद्धेय स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या ऐसा ही एक प्रश्न बनकर आज भी देश के सामने खड़ी है।
उनकी हत्या को लगभग दो दशक बीतने को हैं, किंतु न्याय की प्रक्रिया आज भी अधूरी दिखाई देती है। अब जब उनकी हत्या और उसके बाद हुई हिंसा की जांच से संबंधित महत्वपूर्ण आयोगों की रिपोर्टों के ही लापता होने की बात सामने आई है, तब यह मामला पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता का विषय बन गया है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत में किसी न्यायिक अथवा अर्ध-न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट भी गायब हो सकती है? यदि हां, तो फिर देश की संस्थाओं पर जनता भरोसा कैसे करे? जिन रिपोर्टों को वर्षों की जांच, साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर तैयार किया गया, वे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचने के बाद अचानक गायब हो जाती हैं और किसी को उनकी जानकारी नहीं होती। क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या इसके पीछे कोई बड़ा सच छिपा हुआ है?
स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती स्मृति न्यास ने जो सवाल उठाए हैं, वे उनके अनुयायियों की भावनाओं से जुड़े होने के साथ आज हर उस नागरिक की चिंता हैं जो कानून के शासन में विश्वास रखता है। यदि किसी सामान्य व्यक्ति की फाइल गायब हो जाए तो उसे अपनी गलती का दंड भुगतना पड़ता है लेकिन जब राज्य के सबसे महत्वपूर्ण कार्यालयों से न्यायिक जांच रिपोर्टें लापता हो जाती हैं, तब सवाल यह है कि आखिर जवाबदेही तय करने में वर्षों क्यों लग रहे हैं?
यह भी विचारणीय है कि जिन रिपोर्टों को 2016 और 2018 में मुख्यमंत्री कार्यालय भेजा गया था, वे 2024 तक सुरक्षित क्यों नहीं रखी जा सकीं? उसी अवधि की अन्य फाइलें वापस मिल जाती हैं, किंतु सबसे संवेदनशील जांच रिपोर्टें गायब रहती हैं। क्या यह मात्र संयोग है? क्या सरकार जनता को यह विश्वास दिला सकती है कि इतने महत्वपूर्ण दस्तावेज बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के स्वयं ही लुप्त हो गए? क्या इससे यह संदेह पैदा नहीं होता कि भले ही सरकार उड़ीसा में बदल गई है, किंतु कथित अपराधियों की पकड़ सचिवालय पर अब भी भारी है! निश्चित ही इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
यह सर्वविदित है कि लोकतंत्र में सरकारें बदलती हैं पर संस्थाएं और अभिलेख जनता की संपत्ति होते हैं। यदि सत्ता परिवर्तन के दौर में महत्वपूर्ण दस्तावेजों के गायब होने की आशंका पैदा होती है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। सरकार को स्पष्ट रूप से बताना होगा कि रिपोर्टें कहां हैं, उन्हें किसने संभाला और आखिर उनकी वर्तमान स्थिति क्या है।
एक और बड़ा प्रश्न न्याय प्रक्रिया को लेकर है। यदि हत्या के इतने वर्षों बाद भी आयोगों की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो सकीं, तो आखिर किसकी रक्षा की जा रही है? जनता को सत्य जानने का अधिकार है। लोकतंत्र में गोपनीयता का उपयोग सत्य को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। यदि रिपोर्टों में ऐसे तथ्य हैं जो समाज को वास्तविकता से अवगत करा सकते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करने में संकोच क्यों?
वस्तुत: यह सभी को स्मरण रखना चाहिए कि संत स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरण और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए लंबा कार्य करनेवाले महान व्यक्तित्व हैं। उन्होंने अवैध धर्मांतरण के खिलाफ मुखर आवाज उठाई थी। ऐसे व्यक्ति की हत्या यदि आज भी विवादों और अनुत्तरित प्रश्नों से घिरी हुई है तो यह किसी एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं बल्कि उन हजारों-लाखों लोगों की भावनाओं के साथ भी अन्याय है जो उन्हें अपना मार्गदर्शक मानते हैं।
अत: सरकार का यह दायित्व है कि वह सिर्फ प्राथमिकी दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री न माने। इससे अधिक आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध हो। यदि दस्तावेजों को जानबूझकर हटाया गया, छिपाया गया या नष्ट किया गया है तो यह न्याय प्रक्रिया को बाधित करने का गंभीर कृत्य है। ऐसे लोगों की पहचान कर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
विश्व हिंदू परिषद और अन्य संगठनों द्वारा सीबीआई जांच की मांग भी इसी अविश्वास की पृष्ठभूमि में उठी है। जब राज्य की व्यवस्था स्वयं संदेह के घेरे में हो तब स्वाभाविक रूप से एक स्वतंत्र एजेंसी की मांग उठेगी। सरकार को इस मांग को जनता के विश्वास की कसौटी पर देखना चाहिए और एक स्वतंत्र एजेंसी को इस पूरे मामले में जांच अतिशीघ्र सौंप देना चाहिए।
2026 स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का जन्म शताब्दी वर्ष है। देशभर में उनके योगदान को स्मरण करने की तैयारी हो रही है, किंतु विडंबना देखिए; जिस संत को श्रद्धांजलि देने की बात हो रही है, उनकी हत्या के पीछे का पूरा सच आज भी धुंध में छिपा हुआ है। क्या यह किसी सभ्य लोकतंत्र के लिए गौरव का विषय हो सकता है? ऐसे में आज आवश्यकता व्यवस्था में जनता का विश्वास पुनर्स्थापित करने की है।
अत: मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी की सरकार के सामने यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि वह इस मामले में पूर्ण पारदर्शिता दिखाती है, रिपोर्टों को सार्वजनिक करती है, दोषियों की जवाबदेही तय करती है और हत्या की साजिश से जुड़े हर व्यक्ति को कानून के कटघरे तक पहुंचाती है, तभी यह कहा जा सकेगा कि न्याय जीवित है।
अन्यथा देश यह पूछने को मजबूर होगा कि आखिर एक संत की हत्या पर न्याय का इंतजार कब तक? क्या न्याय भी किसी फाइल की तरह सरकारी दफ्तरों में खो गया है? और यदि ऐसा नहीं है तो सत्य को सामने आने से रोका क्यों जा रहा है? अब इन प्रश्नों का उत्तर ओडिशा सरकार के पूरे लोकतांत्रिक तंत्र को देना ही चाहिए ।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

