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बंगाल में सत्ता परिवर्तन से आगे बढ़कर सामाजिक पुनर्जागरण की दस्तक

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बंगाल में सत्ता परिवर्तन से आगे बढ़कर सामाजिक पुनर्जागरण की दस्तक


बंगाल में सत्ता परिवर्तन से आगे बढ़कर सामाजिक पुनर्जागरण की दस्तक


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार का गठन निश्चित ही राज्य की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दिशा बदलने वाले निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बनी नई सरकार ने अपने गठन के साथ ही स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब बंगाल की राजनीति किसी एक विचार, एक वर्ग या एक राजनीतिक परिवार तक सीमित न रहकर सर्वसमावेशी रहेगी।

नई सरकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें समाज के लगभग प्रत्येक वर्ग को स्थान देकर व्यापक सामाजिक संतुलन स्थापित किया गया है। लंबे समय तक वामपंथी शासन और उसके बाद तृणमूल शासन के दौरान जिस प्रकार राजनीतिक हिंसा, वैचारिक असहिष्णुता, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पक्षपात की घटनाएं एवं आरोप सामने आए, उसके बाद भाजपा की यह सरकार स्वयं को लोककल्याणकारी, सहभागितापूर्ण और भयमुक्त शासन के रूप में प्रस्तुत करने के लिए पहले ही दिन से संकल्पित दिखी है।

नई मंत्रिपरिषद की संरचना यह स्पष्ट करती है कि भाजपा ने बंगाल में व्यापक सामाजिक आधार तैयार करने की गंभीर कोशिश की है। बंगाल की जनता भी इस परिवर्तन को एक दल परिवर्तन के रूप में नहीं देख रही, उसके लिए इस व्यवस्था परिवर्तन के विशेष मायने हैं, जिसमें वह अपने लिए एक सुनहरा भविष्य देखती है। जिन लोगों ने आज मंत्री पद की शपथ ली, उनमें हर वर्ग का प्रतिनिधित्व समाहित है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, अग्निमित्रा पॉल जहां सामान्य वर्ग से हैं, वहीं खुदीराम टुडू के माध्यम से भारत के जनजाति समाज को प्रतिनिधित्व मिला है। इसी तरह से दिलीप घोष हैं, जोकि पिछड़ा वर्ग से आते हैं। निसिथ प्रामाणिक राजबंशी हैं। इनमें एक नाम अशोक कीर्तनिया का भी है, वह भी बंगाल के पिछले और अति पिछड़े वर्ग मतुआ समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस तरह से बंगाल की सत्ता में सभी का सहभाग एक साथ समान रूप से दिखाई दे रहा है। वस्तुत: भाजपा का संदेश साफ है, वह यह कि सत्ता के केंद्र में समाज का हर वर्ग रहेगा। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी ने यहां गांव, सीमावर्ती क्षेत्रों, वनवासी इलाकों और पिछड़े समाजों से आए चेहरों को प्रमुखता एवं प्रमाणिकता के साथ आगे बढ़ाया है। इसके साथ ही आज पश्चिम बंगाल में भाजपा यह भी संदेश देने में भी सफल रही है कि भय और भ्रष्टाचार से मुक्त शासन की आवश्यकता जो इस राज्य में लम्बे समय से जरूरी माना जा रहा था, वह अब इस राज्य में होता हुआ दिखेगा।

कहना होगा कि ममता शासन से जुड़े पुराने अनुभव इस राज्य के बहुत बुरे रहे हैं। उस दौर में पश्चिम बंगाल लगातार राजनीतिक हिंसा और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा। पंचायत चुनावों से लेकर विधानसभा चुनावों तक अनेक स्थानों पर हिंसा, बूथ कब्जे और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर हमलों की घटनाओं ने लोकतंत्र को आहत किया। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने महिला सुरक्षा और प्रशासनिक निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी, पशु तस्करी और अवैध वसूली जैसे मामलों ने राज्य सरकार की छवि को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

स्वभाविक है कि इन घटनाओं ने आम नागरिकों के भीतर असुरक्षा और असंतोष की भावना को और गहरा किया। भाजपा ने इन्हीं मुद्दों को जनता के बीच प्रमुखता से उठाकर परिवर्तन की आवश्यकता को मजबूत आधार दिया। वस्तुत: इसी पृष्ठभूमि में सुवेंदु सरकार का गठन उन लोगों के लिए आशा का संदेश बनकर सामने आया, जोकि लंबे समय से भयमुक्त और निष्पक्ष शासन की अपेक्षा कर रहे थे।

इसके साथ यह भी आज के दिन याद आ रहा है कि कैसे बंगाल का राजनीतिक इतिहास वामपंथी शासन से प्रभावित रहा है! प्रारंभिक वर्षों में भले ही वामपंथ को व्यापक समर्थन मिला दिखता हो, किंतु समय बीतने के साथ सभी ने देखा कि राजनीतिक जड़ता, उद्योगों के पलायन और वैचारिक कठोरता के साथ हिंसा ने पूरे राज्य को पीछे धकेल दिया था। नंदीग्राम और सिंगूर की घटनाएं आज भी बंगाल के राजनीतिक इतिहास पर गहरे घाव के रूप में याद की जाती हैं। किसानों के आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और हिंसक संघर्षों ने राज्य की छवि को गंभीर क्षति पहुंचाई। उद्योगों का राज्य से बाहर जाना और युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों का सीमित होना भी बड़ी चिंता का विषय बना।

वामपंथी शासन के अंतिम वर्षों में यह धारणा मजबूत हो गई थी कि विचारधारा प्रशासनिक व्यवहारिकता पर भारी पड़ रही है। आज अच्छा यह है कि भाजपा अब उसी पृष्ठभूमि को सामने रखकर विकास, निवेश और सुशासन आधारित राजनीति का नया विकल्प प्रस्तुत कर रही है। राज्य की नई सरकार इस संदेश के साथ आगे बढ़ती दिखाई दे रही है कि बंगाल को वैचारिक टकराव के स्थान पर विकास, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और जनविश्वास की राजनीति की आवश्यकता बनाया जाएगा। “सोनार बांग्ला” का संकल्प भाजपा ने जनता के सामने रखा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई अवसरों पर कह भी चुके हैं, “बंगाल का विकास भारत के विकास का आधार है।” भाजपा अब इसी भावनात्मक और वैचारिक आधार को शासन व्यवस्था में परिणत करने का प्रयास कर रही है। आज सुवेंदु अधिकारी सरकार का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही माना जा रहा है कि बंगाल अब भय, हिंसा और राजनीतिक वर्चस्व की राजनीति से आगे बढ़कर विकास, सहभागिता और सामाजिक संतुलन की नई दिशा में कदम रखता हुआ दिखेगा, जहां सत्ता का अर्थ समाज के हर वर्ग को सम्मान और अवसर देना भी होगा। फिलहाल तो नई सरकार से यही उम्मीद की जा रही है!

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी