बुजुर्गों की छत पर अब बच्चों का अधिकार नहीं, माता-पिता की गरिमा सर्वोपरि
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
कभी जिस घर की नींव माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई, त्याग और सपनों से रखी थी, उसी घर में यदि बुढ़ापे में उन्हें अपमान, भय और असुरक्षा का सामना करना पड़े, तो सवाल फिर स्वभाविक तौर पर संपत्ति से आगे यह मनुष्य की गरिमा का बन जाता है। वस्तुत: सुप्रीम कोर्ट का बुधवार को सामने आया निर्णय इसी बुनियादी प्रश्न को केंद्र में लाता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि बढ़ती उम्र किसी व्यक्ति को असुरक्षित, अपमानित या अपने ही घर में बेबस होकर जीने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। यदि बच्चे या रिश्तेदार बुजुर्ग माता-पिता के जीवन और सुरक्षा के लिए खतरा बनते हैं या उनके भरण-पोषण और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को बाधित करते हैं, तो “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007” के तहत गठित ट्रिब्यूनल परिस्थितियों के अनुसार उन्हें संपत्ति से बाहर करने का आदेश दे सकता है।
अब एक तरह से देखा जाए तो यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कोर्ट ने संपत्ति के मालिकाना हक से आगे बढ़कर उस सामाजिक उद्देश्य को देखा है, जिसके लिए वरिष्ठ नागरिक कानून बनाया गया था। बुजुर्गों को सिर्फ भोजन और आर्थिक सहायता के साथ ही सम्मान, सुरक्षा और रहने की सुरक्षित जगह उपलब्ध कराना इसका उद्देश्य है।
उक्त मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता से जुड़ा है। गुप्ता ने 5 जून 2022 को अपने बेटे को अपनी संपत्ति से हटाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया था। यह संपत्ति उन्होंने स्वयं खरीदी थी। विवाद की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को उस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया, किंतु इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन आदेशों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट की व्याख्या यह थी कि 2007 का कानून वरिष्ठ नागरिक को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का स्पष्ट अधिकार नहीं देता। यहीं से मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत के सामने मूल प्रश्न यह बना कि क्या बुजुर्गों की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल के पास बेदखली का आदेश देने की शक्ति है?
सुप्रीम कोर्ट ने ने कहा कि 2007 का कानून कल्याणकारी कानून है और उसकी व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो उसके उद्देश्य को आगे बढ़ाए। धारा 7 के तहत गठित ट्रिब्यूनल और धारा 8 के तहत उसे प्राप्त शक्तियों को सिर्फ कागजी औपचारिकता मानकर नहीं देखा जा सकता। यदि बुजुर्ग की देखभाल, सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करने के लिए किसी बच्चे या रिश्तेदार को संपत्ति से हटाना आवश्यक हो, तो ऐसी राहत दी जा सकती है।
यानी अदालत का संदेश साफ है कि संपत्ति पर अधिकार मालिकाना दस्तावेज का विषय नहीं है; जब उस संपत्ति में रहने वाला वरिष्ठ नागरिक अपने ही बच्चों से असुरक्षित हो जाए, तब कानून का पहला उद्देश्य उसकी सुरक्षा और गरिमा बन जाता है। इसलिए न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिए गए इस दिशा में निर्णय बताते हैं कि बुजुर्गों का हक उनकी अर्जित संपत्ति पर उनके जीवित रहते हुए सदैव ही बना रह सकता है।
इस संबंध में सितंबर 2025 में “कमलाकांत मिश्रा बनाम अतिरिक्त कलेक्टर” मामले को भी देखा जा सकता है। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिक ट्रिब्यूनल की बेदखली संबंधी शक्ति को और स्पष्ट किया। लगभग 80 वर्षीय कमलकांत मिश्रा और उनकी 78 वर्षीय पत्नी की संपत्तियों पर उनके बेटे ने कब्जा कर लिया था और उन्हें अपनी ही संपत्तियों में रहने नहीं दिया जा रहा था। ट्रिब्यूनल ने संपत्ति खाली कराने और माता-पिता को मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को गलत माना और कहा कि कल्याणकारी कानून के तहत ट्रिब्यूनल को ऐसी स्थिति में बच्चे या रिश्तेदार को हटाने की शक्ति हो सकती है।
इसी तरह से यह फैसला मौजूदा निर्णय के कानूनी आधार को समझने में खासा महत्वपूर्ण है। जिसमें कि “उर्मीला दीक्षित बनाम सुनील शरण दीक्षित” जनवरी 2025 केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और भरण-पोषण से जुड़े कानून की कल्याणकारी प्रकृति को रेखांकित किया। यदि इन फैसलों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर ओर साफ होती है। न्यायालय अब वरिष्ठ नागरिक कानून को आज सिर्फ आर्थिक भरण-पोषण का कानून नहीं मान रही हैं। इसके केंद्र में बुजुर्ग का सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन है।
भारतीय परिवारों में अक्सर माता-पिता जीवनभर की कमाई से घर बनाते हैं और बाद में बच्चों के नाम संपत्ति कर देते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब संपत्ति हस्तांतरण के बाद वही बच्चे माता-पिता की उपेक्षा करने लगते हैं, इसलिए आज सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश शायद यही है कि बुजुर्गों की सुरक्षा को पारिवारिक दया पर नहीं छोड़ा जा सकता। माता-पिता ने बच्चों को पालने में अपनी जिंदगी लगा दी, इसका अर्थ यह नहीं कि बुढ़ापे में उन्हें उसी घर में अपमान सहने के लिए मजबूर किया जाए।
कानून यहां परिवार को बुजुर्ग को संरक्षण देने के लिए कह रहा है। यहां समझ लें कि अदालत का हस्तक्षेप उस अंतिम दीवार की तरह है, जिसके पीछे एक बुजुर्ग अपने सम्मान के साथ खड़ा हो सकता है और यही इस फैसले का व्यापक अर्थ है। जिस व्यक्ति ने जीवनभर परिवार को घर दिया, उसे जीवन के अंतिम पड़ाव में अपने ही घर में गरिमा से रहने का अधिकार भी कानून सुनिश्चित करता है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

