बचपन की कोई कीमत नहीं होती, न्याय केवल मुआवजा नहीं, जीवन का सहारा भी होना चाहिए
डॉ. निवेदिता शर्मा
मां... मैं फिर कब दौड़ पाऊंगी? यह प्रश्न किसी पांच वर्ष की बच्ची का है, जिसने शायद अभी जीवन का अर्थ भी ठीक से नहीं समझा था। उसे यह नहीं पता कि रीढ़ की हड्डी में लगी चोट क्या होती है, स्थायी लकवा क्या होता है और व्हीलचेयर पर बीतने वाला जीवन कितना लंबा और कठिन होता है। उसे तो बस इतना मालूम है कि पहले वह अपने दोस्तों के साथ खेलती थी, आंगन में तितलियों के पीछे दौड़ती थी, मां की उंगली छोड़कर स्कूल की ओर भागती थी, वैसा ही उसका जीवन फिर से हो जाए, क्योंकि पैर उसकी सुनते ही नहीं, वह उठना चाहती है, दौड़ना चाहती है।
अब उसके बचपन का बड़ा हिस्सा अस्पतालों, दवाइयों, फिजियोथेरेपी, डायपर, कैथेटर और दूसरों की मदद पर निर्भर हो गया है। शायद इसी मानवीय पीड़ा को महसूस करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐसा निर्णय दिया है, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि जब किसी बच्चे का पूरा भविष्य सड़क दुर्घटना में छिन जाए, तब उसकी विकलांगता का आकलन उसके पूरे जीवन पर पड़े प्रभाव से किया जाएगा।
23 जून 2018 को एक पांच वर्षीय बच्ची अपनी मां और दादी के साथ यात्रा कर रही थी। तेज गति से चल रही कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। इस हादसे ने उस बच्ची की रीढ़ की हड्डी को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया और वह स्थायी रूप से लकवाग्रस्त हो गई। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने उसे लगभग 14.84 लाख रुपये का मुआवजा दिया, जिसे बाद में उच्च न्यायालय ने कुछ बढ़ाकर लगभग 20 लाख रुपये के आसपास पहुंचाया, परन्तु प्रश्न यह था कि क्या इतनी राशि उस बच्ची के जीवनभर की चिकित्सा, देखभाल, शिक्षा, रोजगार, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन के अधिकार की भरपाई कर पाएगी?
इसी गहरे प्रश्न का उत्तर सर्वोच्च न्यायालय ने मानवीय दृष्टि से दिया है। न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मुआवजे को बढ़ाकर 87.15 लाख रुपये कर दिया और कहा कि क्षतिपूर्ति की गणना के लिए बच्ची की कार्यात्मक विकलांगता 100 प्रतिशत मानी जाएगी। यह निर्णय इसलिए विशेष है क्योंकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चों के के लिए शरीर के किसी अंग की चिकित्सकीय क्षति को देखना पर्याप्त नहीं है।
यदि कोई बच्चा जीवनभर चलने-फिरने, स्वयं बैठने, दैनिक कार्य करने और अपने भविष्य का निर्माण करने की क्षमता खो देता है, तो व्यवहारिक रूप से उसके लिए आय प्राप्त करने की संभावना, स्वतंत्र जीवन और सामान्य बचपन समाप्त हो जाता है, इसलिए ऐसी स्थिति में कार्यात्मक विकलांगता को 100 प्रतिशत मानना ही न्यायोचित होगा।
इस तरह से सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में उस पूरे जीवन को देखा जो अब दुर्घटना के कारण पूरी तरह बदल चुका है। अदालत ने माना कि बच्ची को जीवनभर प्रशिक्षित परिचारक की आवश्यकता होगी। नियमित फिजियोथेरेपी जारी रहेगी। मूत्र असंयम के कारण डायपर और कैथेटर जैसे चिकित्सा उपकरणों पर हर महीने खर्च होगा। उसके माता-पिता पर आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का स्थायी बोझ रहेगा। न्यायालय ने भविष्य की कमाई की क्षमता को भी ध्यान में रखा और कहा कि बच्चों की काल्पनिक आय का निर्धारण मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता।
एक तरह से जिस राज्य में दुर्घटना हुई, वहां 2018 में कुशल श्रमिक के न्यूनतम वेतन को आधार मानते हुए भविष्य की संभावनाओं के साथ आय का आकलन किया गया। यह सिद्धांत इस बात का प्रतीक है कि कानून अब बच्चों के संभावित भविष्य को भी मूल्यवान मानता है। यहां बताएं कि न्यायालय का यह फैसला कोई अकेला निर्णय नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों से जुड़े मोटर दुर्घटना मामलों में लगातार ऐसी संवेदनशील न्यायिक सोच विकसित की है, जिसने क्षतिपूर्ति के पारंपरिक दृष्टिकोण को नई दिशा दी है।
बेबी साक्षी ग्रेओला बनाम मंजूर अहमद सिमोन के मामले में न्यायालय ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि नाबालिग बच्चों की काल्पनिक आय का आधार संबंधित राज्य के कुशल श्रमिक का न्यूनतम वेतन होना चाहिए। मई 2026 में 14 वर्षीय पूर्णतः विकलांग बालक के मामले में अदालत ने मुआवजा बढ़ाकर 56.83 लाख रुपये करते हुए कहा कि दुर्घटना के कारण समाप्त हुआ पूरा भविष्य भी न्याय का विषय है।
सात वर्षीय सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चे के मामले में न्यायालय ने कहा कि सिर्फ शारीरिक विकलांगता का प्रतिशत नहीं, बल्कि बचपन का आनंद, शिक्षा, युवावस्था, सामाजिक जीवन और विवाह जैसी संभावनाओं के नष्ट होने को भी क्षतिपूर्ति में शामिल किया जाना चाहिए। कजोल बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे ऐतिहासिक मामले में तो सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में कहा था कि ऐसी बच्ची अपने मित्रों के साथ खेल नहीं सकेगी, जीवन की सामान्य खुशियों का अनुभव नहीं कर सकेगी और यह क्षति किसी साधारण गणना से नहीं आंकी जा सकती।
इन निर्णयों ने बीमा कंपनियों के लिए भी स्पष्ट संदेश दिया है कि गंभीर रूप से घायल बच्चों के मामलों में औपचारिक मुआवजा देना पर्याप्त नहीं होगा। क्योंकि क्षतिपूर्ति का उद्देश्य पीड़ित बच्चे के पूरे जीवन को यथासंभव सम्मानजनक बनाना है। हर दुर्घटना किसी परिवार के सपनों को तोड़ती है। एक क्षण की लापरवाही किसी बच्चे का पूरा जीवन बदल देती है, इसलिए सड़क सुरक्षा यातायात नियमों का विषय तो है ही, साथ में बाल अधिकारों का भी विषय है। वाहनों की तेज गति, लापरवाह ड्राइविंग, सीट बेल्ट और बाल सुरक्षा उपकरणों की अनदेखी, ओवरलोडिंग तथा यातायात नियमों का उल्लंघन अंततः सबसे बड़ी कीमत उन मासूमों से वसूलता है, जिनका इन गलतियों से कोई संबंध नहीं होता।
बच्चों का अधिकार उन्हें सुरक्षित, स्वस्थ, सम्मानजनक और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन का अधिकार देता है, जबकि राज्य के नीति-निर्देशक तत्व बच्चों के संरक्षण और उनके समुचित विकास पर विशेष बल देते हैं। ऐसे में जब कोई सड़क दुर्घटना किसी बच्चे के पूरे भविष्य को अंधकार में धकेल देती है, तब न्यायालय का दायित्व हो जाता है कि उस संवैधानिक गरिमा की रक्षा करना जिसके कि ये बच्चे भी सच्चे अधिकारी हैं। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय इसी संवेदनशील संवैधानिक दृष्टि का सशक्त उदाहरण है। यहां न्याय यह सुनिश्चित करता है कि दुर्घटना के बाद उसका शेष जीवन अभाव, असहायता और उपेक्षा में न बीते।
(लेखिका, मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

