अर्थव्यवस्था मजबूत, फिर शेयर बाजार क्यों गिर रहा है?
प्रहलाद सबनानी
भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर तेज बनी हुई है। उद्योगों की गतिविधियां बढ़ रही हैं। बैंकिंग व्यवस्था मजबूत हो रही है। निर्यात में विस्तार दिखाई दे रहा है और कर संग्रह लगातार ऊंचे स्तर पर पहुंच रहा है। इसके बावजूद शेयर बाजार में लगातार गिरावट ने कई सवाल खड़े किए हैं। सेंसेक्स 1 अक्टूबर 2025 के 80,983 अंक से घटकर 1 अक्टूबर 2026 को 71,910 अंक और निफ्टी 24,836 से गिरकर 22,422 अंक पर आ गया। यानी एक वर्ष में दोनों प्रमुख सूचकांक में लगभग 10 से 11 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। क्या यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी का संकेत है? उपलब्ध आर्थिक संकेतक इसका समर्थन करते दिखाई नहीं देते।
शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था के बीच संबंध अवश्य है, पर दोनों हमेशा एक दिशा में नहीं चलते। शेयर बाजार मुख्यतः सूचीबद्ध कंपनियों की भविष्य की आय, लाभप्रदता और निवेशकों की अपेक्षाओं के आधार पर मूल्य तय करता है। इसके साथ वैश्विक पूंजी का प्रवाह भी बाजार की दिशा प्रभावित करता है। मौजूदा गिरावट को समझने के लिए विदेशी संस्थागत निवेशकों के व्यवहार, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, कच्चे तेल की कीमतों, डॉलर की मजबूती और भारतीय शेयरों के अपेक्षाकृत ऊंचे मूल्यांकन को देखना होगा।
विदेशी पूंजी की बड़ी निकासी
वर्ष 2026 में अब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 2.8 लाख करोड़ रुपये की निकासी की है। वैश्विक निवेशकों के लिए इस समय अमेरिका के बॉन्ड, अमेरिकी शेयर बाजार और कुछ उभरते बाजार अधिक आकर्षक दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका में बॉन्ड यील्ड का ऊंचा स्तर सुरक्षित निवेश के साथ बेहतर रिटर्न का विकल्प प्रस्तुत करता है। अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित नवाचार से उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ने की उम्मीद भी वहां निवेश आकर्षित कर रही है।
वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा तकनीकी क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों की संभावनाएं विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं। चीन भी इस दौड़ में महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक कमजोर प्रदर्शन के कारण चीनी कंपनियों का कीमत-आय अनुपात भारतीय कंपनियों की तुलना में अधिक आकर्षक हो गया है। जहां चीन में औसत पीई अनुपात 12 के नीचे बताया जा रहा है, वहीं भारत में यह 20 से ऊपर है। ऐसे में वैश्विक निवेशक समान पूंजी से अधिक संभावित मूल्य प्राप्त करने के लिए चीन की ओर भी देख रहे हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बीच भारतीय संस्थागत निवेशक बाजार में पूंजी लगा रहे हैं। म्यूचुअल फंडों के माध्यम से हर महीने 30,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश भारतीय शेयर बाजार में हो रहा है। इसका अर्थ है कि बाजार से पूंजी पूरी तरह बाहर नहीं जा रही, उसका स्वामित्व और प्रवाह एक हिस्से में विदेशी निवेशकों से घरेलू निवेशकों की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
युद्ध, तेल और डॉलर का दबाव
वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष और अन्य अंतरराष्ट्रीय तनावों का असर ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं, जबकि एक वर्ष पहले यह लगभग 65 डॉलर थीं। भारत अपनी कच्चे तेल की खपत का 90 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। इसलिए तेल की कीमतों में बड़ी वृद्धि से आयात बिल, चालू खाते और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
फिर भी यह समझना आवश्यक है कि आशंका और वास्तविक आर्थिक स्थिति दो अलग-अलग चीजें हैं। भारत में महंगाई को नियंत्रण में रखने के प्रयास अब तक प्रभावी रहे हैं। बाजार भविष्य की संभावित चुनौतियों को वर्तमान कीमतों में शामिल करता है। इसी कारण किसी वैश्विक जोखिम की आशंका भी शेयरों की कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
डॉलर की मजबूती ने दबाव और बढ़ाया है। डॉलर इंडेक्स 1 अक्टूबर 2025 के 97.71 से बढ़कर 1 अक्टूबर 2026 को 101.80 के स्तर पर पहुंच गया। इसी अवधि में रुपया लगभग 96 रुपये प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ। सोने की कीमत भी 3,871 डॉलर प्रति औंस से बढ़कर 4,170 डॉलर पहुंच गई है। भारत सोने का बड़ा आयातक है और इसके भुगतान के लिए डॉलर की आवश्यकता होती है। इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर अलग
यदि शेयर बाजार की गिरावट को आर्थिक गतिविधियों के वास्तविक आंकड़ों के साथ रखकर देखा जाए तो तस्वीर काफी अलग दिखाई देती है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही। यह वैश्विक अनुमानित वृद्धि दर लगभग 3 प्रतिशत और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की लगभग 3.8 प्रतिशत दर से काफी ऊपर है।
अगस्त 2026 में औद्योगिक विकास दर 8 प्रतिशत रही, जबकि अगस्त 2025 में यह 4.7 प्रतिशत थी। अगस्त 2026 में वस्तुओं का निर्यात लगभग 4,380 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया, जबकि एक वर्ष पहले यह 3,480 करोड़ डॉलर था। 15 सितंबर 2026 को समाप्त पखवाड़े में बैंक ऋण वृद्धि 18.1 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 10.4 प्रतिशत थी। बैंक जमा की वृद्धि भी 9.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.3 प्रतिशत हुई। ऋण-जमा अनुपात लगभग 81 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचना अर्थव्यवस्था में बढ़ती ऋण मांग का संकेत देता है।
बैंकिंग क्षेत्र की मजबूती भी महत्वपूर्ण है। सकल गैर-निष्पादित आस्तियां जुलाई 2025 के 2.2 प्रतिशत से घटकर जुलाई 2026 में 1.68 प्रतिशत रह गईं। शुद्ध एनपीए 0.5 प्रतिशत से घटकर 0.4 प्रतिशत रहा। पूंजी पर्याप्तता अनुपात 17.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत हो गया। यह बताता है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली पहले की तुलना में अधिक मजबूत पूंजी आधार के साथ आर्थिक गतिविधियों को समर्थन दे रही है।
उद्योगों द्वारा उत्पादन क्षमता का 75 प्रतिशत से अधिक उपयोग किया जाना भी अर्थव्यवस्था में मांग की मजबूती दर्शाता है। जब क्षमता उपयोग इस स्तर तक पहुंचता है तो कंपनियों के सामने उत्पादन क्षमता विस्तार की आवश्यकता उभरती है। जीएसटी संग्रह इसका एक और संकेतक है। सितंबर 2026 में 14.5 प्रतिशत वृद्धि के साथ जीएसटी संग्रह 2.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा और लगातार तीसरे महीने यह आंकड़ा दो लाख करोड़ रुपये से ऊपर रहा।
डिजिटल अर्थव्यवस्था की गति भी उल्लेखनीय है। सितंबर 2026 में यूपीआई के माध्यम से प्रतिदिन औसतन 80 करोड़ से अधिक लेन-देन दर्ज हुए। अगस्त में यह संख्या लगभग 79 करोड़ और सितंबर 2025 में 65 करोड़ से अधिक थी। यह भारत में औपचारिक अर्थव्यवस्था और डिजिटल भुगतान के विस्तार का स्पष्ट संकेत है।
गिरावट को संकट का प्रमाण मानना उचित नहीं
भारतीय शेयर बाजार की मौजूदा गिरावट को पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था का आईना मानना उचित नहीं होगा। बाजार पर विदेशी पूंजी की निकासी, वैश्विक ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती, तेल की कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और कंपनियों के मूल्यांकन जैसे अनेक कारक एक साथ प्रभाव डाल रहे हैं। इसका अर्थ यह भी नहीं कि भारत के सामने चुनौतियां नहीं हैं। महंगा कच्चा तेल, रुपये पर दबाव और वैश्विक पूंजी के बदलते रुझान अर्थव्यवस्था के लिए वास्तविक जोखिम हैं। इनसे निपटने के लिए ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात प्रतिस्पर्धा, विनिर्माण विस्तार, घरेलू पूंजी निर्माण और वित्तीय अनुशासन पर निरंतर ध्यान आवश्यक है।
फिर भी शेयर बाजार में 10-11 प्रतिशत की गिरावट को आधार बनाकर भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने किसी बड़े संकट की तस्वीर खींचना तथ्यों से मेल नहीं खाता। आर्थिक विकास, औद्योगिक उत्पादन, बैंक ऋण, जीएसटी संग्रह, निर्यात, बैंकिंग स्वास्थ्य और डिजिटल लेन-देन जैसे संकेतक व्यापक आर्थिक गतिविधियों में मजबूती दर्शा रहे हैं।
इसलिए वर्तमान स्थिति को भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट के रूप में देखने के बजाय वैश्विक पूंजी के पुनर्संयोजन और बाजार मूल्यांकन के सुधार के रूप में देखना अधिक तर्कसंगत होगा। शेयर बाजार का उतार-चढ़ाव अर्थव्यवस्था की पूरी कहानी नहीं होता। असली कसौटी उत्पादन, रोजगार, निवेश, आय, उपभोग और उत्पादकता की दीर्घकालिक दिशा है। इन मोर्चों पर भारत की तस्वीर फिलहाल आशावाद का आधार प्रस्तुत करती है।
(लेखक, आर्थिक मामलों के विश्लेषक एवं स्तम्भकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

