प्रेमी जीवों को आत्मानंद प्रदान करने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं भगवान राम, श्रीकृष्ण
डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा
परमब्रह्म परमात्मा, सच्चिदानन्द स्वरूप, पुराण पुरुषोत्तम भगवान् राम एवं श्रीकृष्ण का इस धरा धाम पर अवतरण आध्यात्मिक जगत् की अद्भुततम, विस्मयकारी, अनिर्वचनीय, अकल्पनीय एवं महानतम घटना है। भगवान् श्री हरि विष्णु अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना हेतु युग-युग में श्रीराम एवं श्रीकृष्ण सहित विविध स्वरुपों में प्रकट होते हैं, किंतु इस धरा धाम पर भगवान् का अवतरण केवल आसुरी शक्तियों के विनाश और धर्म स्थापना के लिए ही नहीं होता है, अपितु उनके अवतार धारण करने का मुख्य हेतु अपने प्रेमी भक्तों को अपनी दिव्य लीलाओं के माध्यम से आत्मानंद प्रदान करना भी है। अर्थात अपने प्रेमी जीवों को आत्मानंद का दिव्यतम सुख प्रदान करने के निमित्त से भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं।
भगवान् का अवतरण, उनकी लीलाएं और उपादान सब कुछ दिव्यता लिए हुए होते हैं। कहने को ही भगवान् मनुष्य शरीर सहित विभिन्न शरीर धारण करते हैं, वस्तुत: भगवान् के वे सब अवतारी शरीर पंचभौतिक होते ही नहीं, अपितु उनके वह शरीर दिव्य, चिन्मय प्रकाश रूप होते हैं, जिसके दर्शन की लालसा में वीतरागी महात्मा जन अनंतानंत जन्मों तक साधना किया करते हैं।
मनुष्यों में निष्काम भाव की कमी और असत् वस्तु को सत्ता एवं महत्व देने से ही अधर्म बढ़ता है, जिससे मनुष्य दुष्ट स्वभाव वाले हो जाते हैं, इसलिए भगवान् अवतार लेकर आचरण के द्वारा निष्काम भाव प्रसरित करते हैं, और तब स्वत: रुप से धर्म की स्थापना हो जाती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण अर्जुन को ज्ञान प्रदान करते हुए कहते हैं कि
अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन्। पृकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं।।
अर्थात भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि यद्यपि मैं अजन्मा तथा अविनाशी हूं और समस्त जीवों का स्वामी हूं, तो भी प्रत्येक युग में मैं अपने आदि दिव्य रुप में प्रकट होता हूं। हैं भरतवंशी! जब-जब भी और जहां भी धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है, तब-तब मैं अवतार लेता हूं। भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश तथा धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए ज्ञान की सरल व्याख्या अनुसार जब भी धर्म का ह्रास और अधर्म की वृद्धि होने लगती है, तब भक्तजनों का उद्धार एवं दुष्टों का विनाश कर धर्म की स्थापना हेतु भगवान् युग-युग में प्रकट होते हैं। किंतु गीता में उद्धरित इन वचनों को महात्माओं द्वारा विशिष्ट एवं व्यापक परिप्रेक्ष्य में की गई व्याख्या को देखने पर स्पष्ट होता है कि केवल दुष्टों का विनाश ही भगवान् के अवतार का एक मात्र हेतु नहीं हो सकता।
श्रीमद्भगवद्गीता की टीका साधक संजीवनी में महात्मा रामसुखदासजी महाराज लिखते हैं कि सर्वसमर्थ भगवान् अवतार लिए बिना भी संतजनों की रक्षा, दुष्टों का विनाश और धर्म की स्थापना कर सकते हैं, किंतु वे अपने प्रेमी भक्तों को प्रभु के सान्निध्य प्राप्त करने की उनकी अंतर्निहित भावनाओं को पूर्ण करने के निमित्त से अवतार लेते हैं। इस तरह भगवान् जीवों पर विशेष कृपा करने हेतु स्वयं को मनुष्य रूप में प्रकट कर ऐसी लीलाएं करते हैं, जिससे अवतार काल में भगवान् के दर्शन, स्पर्श वार्तालाप आदि से और भविष्य में उनकी दिव्य लीलाओं के श्रवण, चिंतन, ध्यान और उपदेशों के आचरण से लोगों का सहज रूप से उद्धार हो जाता है, और इसी प्रकार लोगों का सदा उद्धार होता रहे, इसी उद्देश्य से भगवान् अवतार धारण करते हैं। जगत् का प्रत्येक जीव आनंद की चाहत रखता है और वह दिव्यतम आनंद सांसारिक सुखों में है ही नहीं, अपितु प्रभु शरणागति और प्रभु प्रेम में ही निहित है, इसलिए भगवान् अपने शरणागत प्रेमी जीवों पर कृपा कर सगुण रूप धारण कर अवतरित होते हैं। श्री भगवान् का अवतरण और उनकी लीलाएं दिव्यतम, मधुर और जगत् को आनंद प्रदान करने वाली होती है, ओर प्रभु के प्रियजन प्रभु की उन दिव्यतम लीलाओं के आस्वादन हेतु सदैव लालायित रहा करते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता ओर श्रीरामचरितमानस में उल्लेख अनुसार भगवान् कृष्ण और राम, धर्म स्थापना हेतु युग युग में अवतार ग्रहण करते हैं ओर अधर्मियों, आसुरी शक्तियों का संहार कर धर्म राज्य की स्थापना करते हैं, किंतु यह भगवान् का एकमेव लक्ष्य नहीं हो सकता। प्रभु के अवतरण का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य अपने प्रियजनों को आत्मानंद प्रदान करना भी है, क्योंकि यदि केवल दैत्यों, दानवों या राक्षसों का विनाश कर धर्म स्थापना ही भगवान् के अवतरण का एक मात्र निमित्त होता, तो उस निमित्त के लिए निर्गुण भगवान् को सगुण रूप धारण करने की आखिर क्या जरूरत हो सकती है? भगवान् यदि केवल संकल्प भर कर लें तो क्षणांश में संपूर्ण जगत् की समस्त आसुरी शक्तियां स्वयंमेव समाप्त हो सकती है और तत्क्षण धर्म राज्य की स्थापना हो सकती है।
श्रीरामचरितमानस में महात्मा तुलसीदास इन्द्र पुत्र जयंत की कथा का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि इन्द्र के पुत्र जयंत के द्वारा जब देवी सीता के चरणों में आघात पहुंचाए जाने पर भगवान राम ने एक तिनका उठाकर उसकी और फैंक दिया था, श्री राम के द्वारा फैंका गया वही तिनका उसके लिए विकराल तीर बन गया, और उस तिनके रुपी तीर से त्रिलोकी में कोई भी दैवीय शक्ति उसकी रक्षा नहीं कर पाई, ओर अंततः भगवान् सीताराम के चरणों में समर्पण के बाद वह निर्भय हो सका। नि:संदेह ईश्वर के लिए धर्म स्थापना बच्चों के खेल से अधिक कुछ नहीं हो सकता। वस्तुत: वे अपने प्रेमी जनों को आत्मानंद का सुख प्रदान करने के हेतु से ही सगुण साकार रूप धारण कर इस धरा धाम पर पधारते हैं, और प्रेम की प्यासी जीवात्माओं को प्रेमानंद से परिपूर्ण कर संपूर्ण जगत् में प्रेम राज्य की स्थापना करते हैं।
भगवान् का अवतरण और उनके नाम, रुप, लीला एवं धाम सब दिव्य हैं, जिनका संपूर्ण रुप से वर्णन करने में ब्रह्मा भी स्वयं को अक्षम पाते हैं, ओर वेद नैति नैति कहते हुए मौन हो जाते हैं। उन भगवान् श्री हरि विष्णु का श्रीराम अथवा श्री कृष्ण के रूप में प्राकट्य और उनकी दिव्य लीलाओं का स्मरण हमारी चेतना को उर्ध्वगामी बनाता है और जब हमारी चेतना ऊपर के केंद्रों में स्थित हो जाती है, तब शरीर,आत्मा और इन सबसे अलग परमात्मा के बीच अन्तर भासित होंने लगता है। यही समझ इस भौतिक जगत् से परमात्मतत्व की तरफ यात्रा का महत्वपूर्ण बिंदु है। वैदिक ज्ञान का चरम लक्ष्य भी यही है कि हम भौतिक जगत् के बंधनों से स्वयं को मुक्त कर परमात्म-तत्व के अनुसंधान की दिशा में अग्रसर होवें, किंतु ऐसा तभी संभव हो सकता है, जब हम भगवान् के परम, दिव्य स्वरूप को समझते हुए समस्त कारणों के परम कारण उन प्रभु की शरण ग्रहण कर संपूर्ण निष्ठा और समर्पित भाव से अनवरत रूप से उनका स्मरण करते हुए भगवान् के दिव्यतम प्रेम की प्राप्ति के अधिकारी बन जाएं। यहां हमें यह बात पूरी शिद्दत से समझनी होगी कि लोक के या पारलौकिक सारे सौंदर्य जनक, ऐश्वर्यपूर्ण एवं उत्कृष्टतम पदार्थ और घटनाएं वस्तुत: भगवान् के दिव्यतम ऐश्वर्य एवं शक्तियों की अत्यंत लघु या आंशिक अभिव्यक्ति भर है, पानी की एक बूंद है, किंतु प्रभु प्रियता है, प्रलयकाल का अंतहीन महासागर।
महत्वपूर्ण प्रश्न है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह में रत हम लोग प्रभु प्रियता आखिर कैसे प्राप्त करें? इस प्रश्न का समाधान करते हुए महात्मा जन कहते हैं कि हम भगवान् से अपना कोई भी संबंध बना लें और उनसे प्रेम करते हुए उनके पावन नामों का स्मरण करते रहें। बात जब नाम स्मरण की आती है, तो हमारे मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न पैदा हो जाता है कि भगवान् के नाम स्मरण की स्थिति को कैसे पाया जा सकता है?
उक्त प्रश्न का समाधान करते हुए परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन स्वामी कृपालुजी महाराज द्वारा बताया गया कि वैसे तो भक्ति के नौ पाद हैं, किंतु उनमें प्रमुख हैं, श्रवण, कीर्तन और स्मरण। उनके द्वारा इसे व्याख्यायित करते हुए कहा गया कि सर्वप्रथम प्रभु के नाम या उनकी कथा का श्रवण, फिर कीर्तन के रूप में जो नाम सुना गया है, उसका बारंबार आवर्तन। इस तरह भगवान् के नाम का संकीर्तन, जप जब मन से होना शुरू हो जाता है, तब वह स्मरण हो जाता है, जो कि भक्ति का सारभूत तत्व है।
कलिसंतरणोपनिषद के साथ ही जहां हमारे पुराणों में नाम महिमा का वर्णन मिलता है, वहीं नामावतार भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु और सिद्ध महायोगी श्रीसीतारामदास ओंकारनाथ महाराज पागल बाबा कहते हैं कि सर्वकाल में जपनीय और स्मरणीय नाम महामंत्र है-
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
वे कहते हैं कि भगवान् के दिव्य नामों का यह महामंत्र मोक्षदायक और सांसारिक कामनाओं को पूर्ण करने वाला साधन अद्वितीय साधन है।
भगवान् श्रीकृष्ण प्रेम स्वरूप हैं और अपने प्रेमी भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय हैं। चूंकि प्रेम आपस में एक दूसरे को मिलाता है, इसलिए भगवान् उन लोगों पर भी कृपावंत हो जाते हैं जो इस जगत् को मैत्री भाव का संदेश देते हैं। इसके विपरीत प्रभु ऐसे लोगों को अपनी कृपा प्रसादी नहीं प्रदान करते हैं जो मनुष्यों को एक दूसरे से अलग कर देते हैं।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)-------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा

