भारत ने अंतरिक्ष के द्वार निजी क्षेत्र के लिए क्यों खोले ?
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दशकों तक भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम सरकारी संस्थाओं की सीमाओं में चलता रहा। इसरो ने सीमित संसाधनों में चंद्रयान और मंगलयान जैसी उपलब्धियां हासिल कीं पर देश की युवा प्रतिभाओं के लिए अवसर गिने-चुने थे। मोदी सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलकर इसी ठहराव को तोड़ने का साहसिक निर्णय लिया। वाराणसी में नमो बुक फेस्ट के दौरान छात्रों से संवाद में रखे गए तथ्य और तर्क बताते हैं कि यह निर्णय कितना दूरदर्शी सिद्ध हुआ है।
वस्तुत: इस निर्णय का सबसे बड़ा लाभ मानव संसाधन के मोर्चे पर दिखता है। पहले घरेलू अंतरिक्ष इकोसिस्टम में अवसर सीमित थे इसलिए अनेक युवा पेशेवर विदेश की ओर देखते थे। क्षेत्र खुलने के बाद अधिक प्रतिभाएं देश में रहकर भारत के बढ़ते अंतरिक्ष तंत्र में योगदान दे पा रही हैं। यह तो हमें ही समझना होगा कि एक इंजीनियर को प्रशिक्षित करने में देश का सार्वजनिक धन और संस्थागत श्रम लगता है। वही इंजीनियर जब विदेशी कंपनियों के लिए काम करता है तो उसका लाभ दूसरे देश को मिलता है। निजी क्षेत्र के खुलने से यह प्रवाह थमा और स्काईरूट जैसे अंतरिक्ष स्टार्टअप युवा इंजीनियरों को अपने ही देश में चुनौतीपूर्ण काम और नवाचार का मंच दे रहे हैं।
इसके अतिरिक्त हमें समझना यह भी है कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था अब लगभग नौ बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुकी है। यदि मौजूदा गति बनी रही, तो अगले 8-10 वर्षों में यह 45-46 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है यानी लगभग पांच गुना विस्तार। इस वृद्धि का श्रेय क्षेत्र को खोलने और हितधारकों की व्यापक श्रृंखला को जोड़ने को दिया जा रहा है। यह तर्कसंगत भी है क्योंकि एक संस्था पर सारा भार होने की स्थिति में विकास की गति उसकी क्षमता से बंध जाती है। निजी कंपनियां पूंजी, प्रतिस्पर्धा और नई तकनीकी सोच लेकर आती हैं। इससे लॉन्च, उपग्रह निर्माण और डेटा सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नए उद्यम उभरते हैं, रोजगार बढ़ता है और भारत वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में बड़ा खिलाड़ी बनने की स्थिति में आता है।
दूसरी ओर इस निर्णय का विरोध करने वालों की आशंकाएं स्वाभाविक हैं पर उनका उत्तर तथ्यों और व्यवस्था के स्वरूप में मौजूद है। पहली आशंका जो दिखती है, वह है कि क्या इसरो की भूमिका कमजोर होगी? जबकि ऐसा नहीं है। निजी भागीदारी सरकारी संस्थान का विकल्प कैसे हो सकती है, हां, उसका पूरक अवश्य बन सकती है। इसरो रणनीतिक और अनुसंधान मिशनों का नेतृत्व जारी रखेगा ही, जबकि वाणिज्यिक और सेवा आधारित कामों का बोझ निजी क्षेत्र उठा सकता है। इससे इसरो के संसाधन और वैज्ञानिक प्रतिभा गहरे अनुसंधान और बड़े मिशनों पर केंद्रित हो पाएंगे।
एक आशंका, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी नियंत्रण पर पड़ने वाले असर से जुड़ी है, जिसमें कहा जा रहा है कि निजी क्षेत्र का मतलब नीतिगत नियंत्रण का अभाव है, जबकि सरकार नीति, नियमन और बुनियादी ढांचे की भूमिका में बनी रहती है। वास्तव में यह सोच सही इसलिए नहीं है क्योंकि सबकुछ अंतत: सरकार के नियंत्रण में ही रहता है। इसी प्रकार यह कहना कि निजी कंपनियां केवल मुनाफे पर ध्यान देंगी, राष्ट्रीय हित पर नहीं- इसका उत्तर भारत का अपना अनुभव है। चंद्रयान-3 ने दिखाया कि देश उल्लेखनीय लागत दक्षता के साथ परिष्कृत मिशन चला सकता है। यही दक्षता निजी उद्यमों के साथ जुड़कर भारत को किफायती और विश्वसनीय वैश्विक साझेदार बनाती है।
जैव प्रौद्योगिकी में कोविड-19 के विरुद्ध दुनिया के पहले डीएनए टीके का विकास यह भी दिखाता है कि नीतिगत समर्थन मिलने पर भारतीय संस्थान और उद्योग राष्ट्रीय उपलब्धि में बदल सकते हैं। इसी तरह से बात जब लाभ की होती है और कहा जाता है कि कुछ बड़े समूहों तक ही यह सीमित रहेगा? यहां स्टार्टअप की भूमिका निर्णायक है। स्काईरूट जैसे नवोदित उद्यमों का उदय बताता है कि अवसर बड़े औद्योगिक घरानों तक सीमित नहीं हैं। छोटे शहरों और संस्थानों से निकले युवा इंजीनियरों के लिए भी अब अपना उद्यम खड़ा करने का मार्ग खुला है।
अंततः फिर भी जो सवाल उठाते हैं, उनसे पूछा जाए कि फिर आपके पास विकल्प क्या है, समाधान बताएं, प्रश्न ही न करें। वस्तुत: यही वास्तविकता है कि यदि क्षेत्र बंद रहता तो प्रतिभा विदेश जाती रहती, अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की संभावनाएं एक संस्था की क्षमता में सिमटी रहतीं और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत पिछड़ने का जोखिम उठाता रहता। ऐसे में कहना यही है कि सरकार की दृष्टि स्पष्ट है, सरकारी संस्थानों, निजी उद्योग, स्टार्टअप, शिक्षाविदों और शोध संस्थानों को साझा लक्ष्य के लिए मिलकर काम करना होगा।
अक्सर अलग-अलग दीवारों में बंद रहकर काम करने से संसाधनों का दोहराव होता है और ज्ञान का प्रवाह रुकता है। जब सरकार नीति और बुनियादी ढांचा देती है, उद्योग गति और नवाचार लाता है और शिक्षा जगत अनुसंधान तथा कुशल मानव संसाधन उपलब्ध कराता है तब ऐसी क्षमताएं बनती हैं जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। पिछले 12-13 वर्षों को भारत में विज्ञान का युग कहा जा रहा है। देश के पास दशकों से वैज्ञानिक प्रतिभा थी, पर उसे राष्ट्रीय क्षमता में बदलने वाला सक्षम नीतिगत वातावरण हाल के वर्षों में मजबूत हुआ है। अंतरिक्ष क्षेत्र का उद्घाटन इसी व्यापक सोच का हिस्सा है, जिसमें डीप ओशन मिशन, क्वांटम मिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन जैसी पहलें भी शामिल हैं।
इसका प्रमाण अनुसंधान पर बढ़ते निवेश में भी दिखता है। देश का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय (जीईआरडी) 2013-14 के लगभग 46,000-47,000 करोड़ रुपये से बढ़कर अब लगभग 2-2.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इसी क्रम में परमाणु क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोला गया है और 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा गया है, जो एआई और डेटा केंद्रों जैसी भविष्य की जरूरतों के लिए स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत बनेगा।
भारत की वैज्ञानिक प्रगति ने देश में नया आत्मविश्वास पैदा किया है, जो उसकी बढ़ती वैश्विक स्थिति और युवाओं को उपलब्ध अवसरों में दिखता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संदेश हम यह कर सकते हैं आज इसी भाव का प्रतीक है। भारत अब दुनिया का अनुसरण करने वाले चरण से आगे बढ़कर दुनिया के साथ कदम मिला रहा है और कई क्षेत्रों में आगे भी है। यह सफर तकनीक के विवेकपूर्ण उपयोग के साथ ही सार्थक है। प्रौद्योगिकी को मानव क्षमता का स्थान नहीं लेना चाहिए, उसे मजबूत करना चाहिए। यही दृष्टि अंतरिक्ष क्षेत्र पर भी लागू होती है, जहां निजी भागीदारी का उद्देश्य जिज्ञासा और वैज्ञानिक खोज की भावना को और बल देना है।
हम उम्मीद करें कि आगे की सफलता निरंतर सहयोग, युवाओं के लिए अधिक अवसरों और वैज्ञानिक क्षमता को नवाचार तथा आर्थिक अवसर में बदलने पर निर्भर करेगी। विकसित भारत का लक्ष्य सामूहिक भागीदारी से ही प्राप्त होगा यह सुनिश्चित है इसलिए अंतरिक्ष के द्वार खोलना इसी दिशा में उठाया गया मोदी सरकार का ठोस कदम है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

