बेटियों की सुरक्षा का प्रश्न और समाज की सामूहिक चेतना
कैलाश चन्द्र
मध्य प्रदेश से आई ताजा रिपोर्ट एक ऐसे सामाजिक संकट की ओर संकेत करती है जिसे अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदेश में लगातार बढ़ रही बच्चियों और युवतियों के गुम होने की घटनाएँ, प्रेम जाल और छल के माध्यम से की जा रही आपराधिक गतिविधियाँ और कई बार संगठित रूप से चलाए जा रहे धर्मांतरण केन्द्रित नेटवर्क, यह सब मिलकर एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने रखते हैं कि क्या हम अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर सचमुच जागरूक हैं? या हम उस खतरे को सामान्य मानकर चलते जा रहे हैं, जिसका असर परिवार, समाज और पूरी पीढ़ी पर गहरा पड़ सकता है।
संकट का बढ़ता दायरा
मध्यप्रदेश के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से 2026 के बीच महिलाओं और बच्चियों के लापता होने के मामलों में चिंताजनक वृद्धि दर्ज हुई है। 2020 में 31,405 मामलों से शुरू होकर यह संख्या 2023 में 46,191 और 2024 में बढ़कर 56,780 तक पहुंच गई। यह वृद्धि केवल जनसंख्या या रिपोर्टिंग के बढ़ने से नहीं समझी जा सकती। इसके पीछे उन गहरे सामाजिक और मानसिक बिंदुओं को देखना होगा जो हमारी बेटियों की सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं।
2025 में यह आंकड़ा लगभग 60,000 के पार चला गया, और 2026 के शुरुआती महीनों में ही 4,197 मामले दर्ज हो चुके थे। यह न सिर्फ प्रशासनिक चुनौती है, बल्कि पारिवारिक और सामुदायिक स्तर पर भी एक गंभीर चेतावनी है। यह भी सामने आया कि इनमें बड़ी संख्या उन मामलों की है जहां लड़कियों को प्रेम के नाम पर भ्रमित किया गया, फेक पहचान बनाकर सोशल मीडिया से संपर्क किया गया, आर्थिक प्रलोभन दिया गया, या परिवार से अलग कर किसी अन्य जिले और राज्य तक ले जाया गया। यह एक सुनियोजित पैटर्न की ओर संकेत करता है।
प्रेम जाल, धमकी और डिजिटल अपराध एक नया परिदृश्य
डिजिटल युग में अपराध का स्वरूप बदल गया है। 18 से 21 वर्ष आयु वर्ग की बच्चियाँ सोशल मीडिया का सबसे सक्रिय उपयोग करती हैं। यही सक्रियता कभी-कभी उन्हें जोखिम के करीब ले आती है। नकली नामों से बनाए गए खाते, प्रोफाइल की आड़ में किए गए संबंध, तस्वीरों का मॉर्फिंग और भावनात्मक दबाव बनाकर लड़कियों को नियंत्रित कर लेना ये गतिविधियाँ आज अपराध की नई भाषा बन चुकी हैं।कई मामलों में यह दिखा कि प्रारंभिक मित्रता और रोमांटिक बातचीत के बाद अचानक ब्लैकमेलिंग शुरू हो जाती है।
शादी के झूठे वादे, धर्मांतरण का दबाव, वीडियो बनाकर धमकाना और आर्थिक शोषण इस प्रक्रिया का आम हिस्सा है। कुछ मामलों में ऐसा भी हुआ कि लड़की को उसके परिवार से काटकर दूसरे शहर या राज्य में ले जाया गया। कई लड़कियाँ मानसिक दबाव और भय के कारण परिवार या पुलिस से संपर्क करने तक में असमर्थ हो जाती हैं। यह सब मिलकर बताता है कि अपराधी अब केवल सड़क पर नहीं, स्क्रीन के पीछे भी बैठे हैं। सुरक्षा के पारंपरिक उपाय अब पर्याप्त नहीं, बल्कि डिजिटल सतर्कता और भावनात्मक समझ की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।
कानून, व्यवस्था और समाज के बीच संतुलन
समाधान कठोर कानूनों में नहीं दिख रहा है, बल्कि उनकी संवेदनशील, त्वरित और मानवीय कार्यवाही में निहित है। रिपोर्ट में यह उल्लेख है कि उत्तरप्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू होने के बाद ऐसे मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज हुई। पुलिस की तत्परता, पीड़िता को सुरक्षित वातावरण, और दोषियों पर कठोर कार्रवाई ने एक सकारात्मक प्रभाव छोड़ा। मध्यप्रदेश में भी 45,000 महिला हेल्पलाइन शुरू करने की योजना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन हर संवैधानिक व्यवस्था तभी प्रभावी होती है जब समाज स्वयं अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करे। कानून अपराध को रोक सकता है, परंतु जागरूक समाज अपराध को पैदा होने से रोक सकता है।
यदि परिवार संवाद बढ़ाए, यदि मोहल्ले में विश्वसनीय सामाजिक नेटवर्क बने, यदि स्कूल कॉलेज में मनोवैज्ञानिक परामर्श और आत्मरक्षा प्रशिक्षण नियमित हों, तो लड़कियाँ न सिर्फ सुरक्षित रहेंगी वह अपने भीतर आत्मविश्वास और साहस की अनुभूति भी करेंगी।
परिवार सुरक्षा की पहली दीवार
समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कई बार परिवारों में संवाद की कमी बच्चियों को बाहर भावनात्मक सहारे की तलाश के लिए प्रेरित करती है। यदि घर में विश्वास का वातावरण न हो, संवाद खुला न हो और बच्चियाँ अपने अनुभव, दोस्ती या संबंधों के बारे में बोलने से डरें तब अपराधियों के लिए रास्ता और आसान हो जाता है। माता-पिता और अभिभावकों को बेटियों के मनोभाव समझने होंगे। उनका साथ, उनका विश्वास, और उनका मार्गदर्शन बेटियों को किसी भी भ्रम, छल या दबाव के विरुद्ध मजबूत बनाता है। अनुभव यही कहता है कि जिस घर में बेटी से संवाद सहज हो, वहाँ किसी अपराधी की चाल विफल हो जाती है।
समाज और समुदाय सहयोग की अनिवार्य शक्ति
समाज की सामूहिक चेतना इस समस्या का सबसे महत्वपूर्ण समाधान है। यदि हम हर बेटी को अपनी बेटी की तरह देखें, तो मोहल्ले और कॉलोनियों में ऐसा वातावरण बनेगा जिसमें बच्चियाँ भयमुक्त होकर जी सकें। अपार्टमेंट परिसर, कॉलोनी और कैंपसों में सामुदायिक सुरक्षा समूह, महिलाओं के लिए सेल्फ डिफेंस कार्यक्रम और नियमित जागरूकता संवाद इस दिशा में उपयोगी कदम हैं। ऐसा समाज जहाँ हर नागरिक संवेदनशील हो, वहाँ संगठित अपराध और प्रेम जाल जैसी प्रवृत्तियाँ टिक नहीं सकतीं। अपराधी वहीं सफल होते हैं जहाँ सामूहिक जिम्मेदारी कमजोर पड़ जाती है। समाज यदि सतर्क हो, संवेदनशील हो और सहयोगी हो, तो हर बच्ची अपने भीतर यह विश्वास लेकर जीती है कि उसके पीछे पूरा समुदाय खड़ा है।
डिजिटल सुरक्षा आज का अनिवार्य कौशल
आज की बच्चियों के लिए चलना-फिरना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी डिजिटल सुरक्षा भी है। यह शिक्षा परिवार से लेकर स्कूल और समाज के प्रत्येक मंच पर आवश्यक हो चुकी है। यह समझना कि किससे बात करनी है, किस जानकारी को साझा करना खतरनाक है, कौन सा प्रोफाइल नकली हो सकता है, लोकेशन शेयरिंग क्या जोखिम पैदा करती है ये बातें अब जीवन शैली का हिस्सा बननी चाहिए। डिजिटल माध्यम अपराध का नया मोर्चा है और इससे लड़ने के लिए समाज को नई तरह की समझ और प्रशिक्षण की जरूरत है।
एक संवेदनशील और जागरूक समाज का संकल्प
यह विषय किसी कानून, अपराध या प्रशासन का नहीं, मानवता, परिवार और सामाजिक चेतना का है। यह उन परिवारों की पीड़ा है जिनकी बेटियाँ गुम हुईं या शोषण का शिकार बनीं; यह हर उस परिवार के लिए चेतावनी है जो अपनी बेटियों को सुरक्षित भविष्य देना चाहता है। इसलिए यह सभी को समझना होगा कि सुरक्षित, जागरूक और संवेदनशील समाज ही हमारी बेटियों की ढाल है। यही भविष्य का आधार है और यही वह संकल्प है जो हमें आज, अभी और इसी क्षण लेना होगा।
(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्तम्भकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

