सोशल मीडिया और विश्वसनीयता
योगेश के. सोनी
मेटा के स्वामित्व वाले फेसबुक से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक वीडियो हटाए जाने की घटना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता, तकनीकी सुरक्षा और कंटेंट मॉडरेशन को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मेटा ने बाद में स्पष्ट किया कि वीडियो किसी जानबूझकर की गई कार्रवाई के कारण नहीं, बल्कि तकनीकी त्रुटि के चलते हट गया था। इसके बावजूद यह घटना कई गंभीर सवाल छोड़ गई है। सवाल यह है कि यदि देश के प्रधानमंत्री के आधिकारिक अकाउंट से जुड़ी सामग्री भी तकनीकी गड़बड़ी की शिकार हो सकती है, तो आम उपयोगकर्ताओं के अकाउंट और उनकी सामग्री कितनी सुरक्षित है?
आज सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है। करोड़ों लोग समाचार, सरकारी सूचनाओं, विचारों और घटनाओं की जानकारी के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर हैं। देश-दुनिया में कहीं भी कोई महत्वपूर्ण घटना होती है तो उसकी जानकारी कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। इसका सकारात्मक प्रभाव भी है और नकारात्मक प्रभाव भी। ऐसे माहौल में किसी महत्वपूर्ण वीडियो या पोस्ट का अचानक हट जाना, गलत तरीके से सीमित होना या उसके प्रसार में असामान्य बदलाव आना लोगों के बीच भ्रम पैदा कर सकता है। खासतौर पर जब सामग्री किसी संवेदनशील सामाजिक या राजनीतिक विषय से जुड़ी हो, तब पारदर्शिता और जवाबदेही और भी जरूरी हो जाती है।
प्रधानमंत्री मोदी सोशल मीडिया पर दुनिया के सबसे सक्रिय नेताओं में शामिल हैं। उनके संदेश और वीडियो को देश-विदेश में करोड़ों लोग देखते हैं। जिस वीडियो के हटने को लेकर हाल में चर्चा हुई वह छात्रों और पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे से संबंधित बताया गया। ऐसे में उसके अचानक गायब होने से सवाल उठना स्वाभाविक है। मेटा की तकनीकी त्रुटि की सफाई आने के बाद मामला स्पष्ट जरूर हुआ, लेकिन इसने डिजिटल प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता पर बहस को जरूर जन्म दे दिया। सोशल मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती आज कंटेंट की बाढ़ है। हर दिन करोड़ों पोस्ट, वीडियो, तस्वीरें और संदेश अपलोड होते हैं।
इनमें तथ्यात्मक जानकारी के साथ-साथ फर्जी खबरें, भ्रामक वीडियो, आपत्तिजनक सामग्री और उकसाने वाले संदेश भी शामिल होते हैं। कई बार कोई वीडियो बिना पूरी जानकारी या सत्यापन के तेजी से वायरल हो जाता है। लोग उसे सच मानकर आगे साझा करते रहते हैं और देखते ही देखते वह संदेश बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच जाता है। ऐसे मामलों में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। हाल के कुछ प्रदर्शनों और सार्वजनिक घटनाओं से जुड़े वायरल वीडियो को लेकर भी यही सवाल उठे हैं कि आपत्तिजनक या भड़काऊ सामग्री तेजी से कैसे फैल जाती है, जबकि तथ्यात्मक और संतुलित सामग्री उतनी तेजी से लोगों तक क्यों नहीं पहुंचती। यदि किसी सामग्री में किसी व्यक्ति, समुदाय या देश के खिलाफ आपत्तिजनक अथवा उकसाने वाली भाषा है तो उसके संबंध में प्लेटफॉर्म की मॉडरेशन नीति कितनी प्रभावी है इसकी समीक्षा आवश्यक है।
यहां यह भी समझना होगा कि किसी वीडियो का वायरल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि प्लेटफॉर्म ने जानबूझकर उसे बढ़ावा दिया है। सोशल मीडिया की पहुंच पर एल्गोरिदम, यूजर इंटरैक्शन, शेयरिंग और ट्रेंडिंग जैसे कई कारक प्रभाव डालते हैं। इसलिए किसी भी प्लेटफॉर्म की भूमिका पर निष्कर्ष निकालने से पहले पारदर्शी जांच और ठोस आंकड़ों की जरूरत है। सोशल मीडिया से जुड़ी समस्या केवल कंटेंट तक सीमित नहीं है। फर्जी प्रोफाइल, अकाउंट हैकिंग, ऑनलाइन ठगी, पहचान की चोरी और फर्जी तस्वीरों के इस्तेमाल जैसी घटनाएं भी चिंता का विषय हैं।
अपराधी कई बार किसी व्यक्ति के नाम और तस्वीर का इस्तेमाल कर फर्जी अकाउंट बनाते हैं और उसके परिचितों से पैसे मांगते हैं। कुछ मामलों में फोटो के साथ छेड़छाड़ कर किसी व्यक्ति को बदनाम करने का प्रयास किया जाता है। ऐसी घटनाएं पीड़ित की सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक स्थिति और निजी जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती हैं।इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी केवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें अकाउंट सुरक्षा, फर्जी प्रोफाइल की पहचान, रिपोर्टिंग सिस्टम और शिकायतों के त्वरित निस्तारण पर भी लगातार काम करना होगा। सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल के बीच बच्चों और किशोरों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। कम उम्र के उपयोगकर्ताओं तक किस तरह की सामग्री पहुंच रही है, इसका उनके व्यवहार और मानसिक विकास पर क्या असर पड़ रहा है और प्लेटफॉर्म उन्हें किस तरह सुरक्षित रखते हैं।
इन सवालों पर दुनिया भर में बहस हो रही है। एल्गोरिदम की पारदर्शिता भी एक बड़ा विषय है। उपयोगकर्ता को यह स्पष्ट रूप से पता नहीं होता कि उसके सामने कोई सामग्री क्यों दिखाई जा रही है और दूसरी सामग्री क्यों नहीं। यदि किसी प्लेटफॉर्म का एल्गोरिदम लगातार विवादास्पद या सनसनीखेज सामग्री को अधिक लोगों तक पहुंचाता है, तो इससे समाज में ध्रुवीकरण और गलत सूचना का प्रसार बढ़ सकता है। सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की आजादी को अभूतपूर्व विस्तार दिया है।
आज आम व्यक्ति भी अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। देशहित, समाज, बच्चों के भविष्य और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर तथ्यात्मक जानकारी सामने आनी चाहिए। साथ ही हिंसा, नफरत, धमकी, फर्जी सूचना और किसी व्यक्ति या समुदाय को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है। समस्या तब पैदा होती है जब उपयोगकर्ता को यह महसूस होने लगे कि कंटेंट मॉडरेशन के नियम समान रूप से लागू नहीं हो रहे हैं।
किसी भी प्लेटफॉर्म के लिए यह धारणा उसकी विश्वसनीयता के लिए नुकसानदायक हो सकती है। इसलिए मेटा सहित सभी सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके नियम स्पष्ट हों और उनका पालन पारदर्शी तथा समान तरीके से हो। तकनीकी गड़बड़ी पूरी तरह समाप्त नहीं की जा सकती। बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कभी-कभी तकनीकी समस्याएं आ सकती हैं। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि ऐसी समस्या होने पर कंपनी कितनी जल्दी उसे पहचानती है, कितनी पारदर्शिता से इसकी जानकारी देती है और प्रभावित उपयोगकर्ता को कितनी जल्दी समाधान उपलब्ध कराती है।
मेटा को अपनी कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था, अकाउंट सुरक्षा, फर्जी प्रोफाइल की पहचान, बच्चों की सुरक्षा, एल्गोरिदम की पारदर्शिता और शिकायत निवारण व्यवस्था को लगातार मजबूत करना होगा। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो चुकी है। इसलिए उनकी जवाबदेही भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए। सोशल मीडिया आज समाज की खुली किताब बन चुका है। इसमें समाज की सोच, राजनीति, संस्कृति, घटनाएं और लोगों की प्रतिक्रियाएं दिखाई देती हैं। इसलिए इस किताब में गलत सूचना, नफरत और फर्जीवाड़े को जगह मिलने से समाज पर सीधा असर पड़ सकता है।
मेटा या किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को प्रतिबंधित करने जैसी कठोर मांगों से पहले उसकी नीतियों, तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन की स्वतंत्र तथा पारदर्शी समीक्षा जरूरी है। यदि कमियां सामने आती हैं तो उन्हें दूर करने के लिए स्पष्ट जवाबदेही तय होनी चाहिए। आखिरकार सवाल केवल एक वीडियो के हटने का नहीं है। सवाल उस विश्वास का है, जिसके आधार पर करोड़ों लोग सोशल मीडिया को सूचना का माध्यम मानते हैं। यदि यह भरोसा कमजोर हुआ तो सोशल मीडिया की ताकत ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

