पेयजल का बढ़ता कारोबार : संकट, लापरवाही और भविष्य की चेतावनी
- डॉ. लक्ष्मीनारायण वैष्णव
“एक दिन पानी भी बिकेगा”—कभी यह वाक्य सुनकर लोग मुस्कुरा देते थे, लेकिन आज यह हमारे समय की सबसे कड़वी सच्चाई बन चुका है। जिस जल को प्रकृति ने मानव जीवन के लिए सहज और निःशुल्क उपलब्ध कराया था, वही आज बाजार की वस्तु बन गया है। घरों के बजट में अब पानी भी एक आवश्यक खर्च बन चुका है। यह केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक, पर्यावरणीय और नीतिगत संकट का स्पष्ट संकेत है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और नीतिगत विफलता
यदि हम स्वतंत्रता के बाद के भारत पर दृष्टि डालें, तो जल उपलब्धता में आई गिरावट चिंता का विषय है। वर्ष 1947 में प्रति व्यक्ति लगभग 6042 क्यूबिक मीटर जल उपलब्ध था, जो समय के साथ घटकर 2001 में 1816, 2011 में 1545 और 2016 तक लगभग 1495 क्यूबिक मीटर रह गया। यह गिरावट केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत लापरवाही और संसाधनों के अनुचित प्रबंधन का दुष्परिणाम है।
भारतीय संविधान नागरिकों को जीवन का अधिकार देता है, जिसमें स्वच्छ पेयजल भी एक अनिवार्य तत्व है। किंतु आज की वास्तविकता यह है कि नागरिकों को पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है। जिन पूर्वजों ने कुएं, बावड़ियां, तालाब और प्याऊ बनाकर समाज को जल समृद्ध बनाया, उनके वंशज आज बोतलबंद पानी पर निर्भर हो गए हैं, यह एक विडंबनापूर्ण स्थिति है।
वर्तमान जल संकट : कारण और परिणाम
आज भारत जल संकट की ओर तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगीकरण और भूजल का अंधाधुंध दोहन इस संकट को और गहरा कर रहे हैं। नदियां सिकुड़ रही हैं, भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और पारंपरिक जल स्रोत उपेक्षा के कारण समाप्त होते जा रहे हैं।
देश में होने वाली वर्षा का लगभग 65 प्रतिशत जल बिना संग्रहण के समुद्र में चला जाता है। यदि इस जल का समुचित संचयन किया जाए, तो जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। किंतु इस दिशा में ठोस और दीर्घकालिक प्रयासों का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
जलवायु परिवर्तन और असंतुलन
जल संकट अब केवल संसाधन प्रबंधन का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन से भी गहराई से जुड़ चुका है। कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ जैसी चरम स्थितियां देखने को मिल रही हैं। वर्षा का असंतुलन कृषि, पेयजल और ऊर्जा उत्पादन तीनों को प्रभावित कर रहा है। यह स्थिति आने वाले समय के लिए गंभीर संकेत देती है।
पानी का व्यवसाय : मजबूरी से मुनाफा
पेयजल संकट ने एक विशाल बाजार को जन्म दिया है। बोतलबंद पानी, आरओ सिस्टम और टैंकर सप्लाई का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। यह विडंबना ही है कि जो जल जीवन का आधार है, वही आज लाभ कमाने का साधन बन गया है। एक ओर व्यवसायी इस संकट से लाभ कमा रहे हैं, वहीं आम नागरिक के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बनता जा रहा है।
इसके साथ ही दूषित जल के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं, जिससे चिकित्सा खर्च भी बढ़ रहा है। इस प्रकार जल संकट अब सामाजिक असमानता और आर्थिक विषमता को भी बढ़ावा दे रहा है।
सरकारी पहल और चुनौतियां
जल संकट से निपटने के लिए जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत जल जीवन मिशन तथा अटल भूजल योजना जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं। इनका उद्देश्य प्रत्येक घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना और भूजल स्तर को सुधारना है।हालांकि इन योजनाओं की सफलता उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति और जनसहभागिता का समुचित समन्वय नहीं होगा, तब तक अपेक्षित परिणाम प्राप्त करना कठिन रहेगा।
समाधान की दिशा : परंपरा और तकनीक का समन्वय
भारत की पारंपरिक जल संरचनाएं—कुएं, तालाब, बावड़ियां—आज भी हमें जल संरक्षण का मार्ग दिखाती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम इन पारंपरिक उपायों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ें। वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना, भूजल दोहन पर नियंत्रण, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन और जल संरक्षण के प्रति जनजागरूकता, ये सभी कदम अत्यंत आवश्यक हैं। इसके साथ ही कृषि और शहरी क्षेत्रों में जल के वैज्ञानिक प्रबंधन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इससे जुड़े तथ्य आज यही कहते हैं कि यदि वर्तमान स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो वर्ष 2050 तक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1000 क्यूबिक मीटर से नीचे जा सकती है, जो गंभीर जल संकट की स्थिति होगी।अतः यह समय चेतने का है। पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। इसका संरक्षण केवल सरकार की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि आज हमने जल संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा।
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हिन्दुस्थान समाचार / हंसा वैष्णव

