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राजमाता जीजाबाई : जीवन, व्यक्तित्व और राष्ट्र निर्माण में योगदान

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राजमाता जीजाबाई : जीवन, व्यक्तित्व और राष्ट्र निर्माण में योगदान


राजमाता जीजाबाई साहेब की 352 वीं पुण्यतिथि (17 जून) पर विशेष

-गिरीश जोशी

लखूजी जाधवराव तत्कालीन दक्कन के प्रमुख मराठा सरदारों में गिने जाते थे उनके यहाँ जीजाबाई का जन्म लगभग 1598 ई. में सिंदखेड़ में हुआ था। । 17वीं शताब्दी का दक्कन राजनीतिक अस्थिरता से भरा हुआ था। मुगल साम्राज्य दक्षिण की ओर विस्तार कर रहा था। लखुजी, निजामशाह के विश्वसनीय सरदार थे। जीजाबाई का विवाह शाहजी राजे के साथ हुआ । सन 1629 में निजामशाह ने राजद्रोह के संदेह में लखुजी जाधवराव के साथ उनके तीन पुत्र अचलोजी, रघुजी और यशवंत राव चारों की हत्या कर दी। इस घटना से पूरा हिंदुस्तान दहल उठा। इस घटना से शाहजी राजे भी अत्यंत उद्वेलित हुए और निजामशाह की सेवा छोड़कर विद्रोही हो गए।

जीजाबाई ने अपने जीवन में सत्ता संघर्ष, विश्वासघात, युद्ध और पारिवारिक त्रासदियों को निकट से देखा। उनके पिता लखूजी जाधव की हत्या ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। इसी अनुभव ने उनमें स्वतंत्र राज्य की आवश्यकता का भाव अधिक प्रबल किया। उस परिस्थिति में जब स्वराज स्थापित करने का विचार भी किसी के मन में नहीं उठता था तब शाहजी राजे और जिजामाता ने स्वराज का स्वप्न देखा। इस स्वराज के निर्माण के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा कर प्रयत्न भी किया। मालोजीराजे के समय से ही पुणे की जागीर उनके पास थी।

शाहजी राजे की बड़ी-बड़ी हवेलिया पुणे में थी। शाहजी राजे ने पुणे और उसके आसपास का परिसर तेजी से अपने आधिपत्य में लेकर इस क्षेत्र को स्वतंत्र कर लिया। लेकिन शाहजी राजे का ये विद्रोह अधिक समय तक टिक न सका। आदिलशाह ने शाहजी राजे की बड़ी हवेलियाँ जलाकर राख कर दी और उनके अनेक लोगों का वध कर पुणे को वीरान कर दिया। शाहजी राजे का स्वराज के निर्माण हेतु किया गया प्रथम प्रयास असफल रहा।

जब लखुजी जाधवराव की हत्या हुई थी, तब गर्भवती जीजाबाई, शाहजी राजे के साथ थी। इस अनिश्चितता के काल में जीजाबाई को इस अवस्था सुरक्षित रखना शाहजी राजे के सामने बड़ी चुनौती थी। शाहजी राजे ने अनुकूलता देख कर जीजामाता को शिवनेरी के किले में रखा। यहाँ जीजाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया शिवाजी।

पुणे जागीर का पुनर्निर्माण

जब शाहाजी दक्षिण में व्यस्त थे, तब जीजाबाई ने पुणे क्षेत्र की जागीर का प्रबंधन संभाला। उन्होंने पुणे में लाल महल के निर्माण का मार्गदर्शन किया। इसी लाल महल में शिवाजी का बाल्यकाल बीता और स्वराज्य की प्रारंभिक योजनाएँ बनीं। उनके प्रशासनिक कौशल के कारण युद्धों से उजड़े क्षेत्र में पुनः कृषि, ग्राम व्यवस्था और राजस्व प्रणाली को सुदृढ़ किया गया।

शिवाजी महाराज के व्यक्तित्व निर्माण में भूमिका

इस माँ के दो पुत्र थे, एक को दुश्मन ने धोखे से मार दिया था और अब एक ही बेटा उसके पास था। जिस माँ ने अपने परिजनों का अलगाव सहन किया हो, अपने पिता, भाइयों और पुत्र की हत्या होते हुए देखी हो, वो माँ अपने बेटे की सुरक्षा के लिए कितनी चिंतित होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन उस माँ ने अपने एकमात्र बेटे को भी देश के लिए, धर्म के लिए, अपनी संस्कृति के लिए की रक्षा के लिए तैयार करने का प्रण लिया।

इतिहास में जीजाबाई का सबसे बड़ा योगदान छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र निर्माण में माना जाता है। उन्होंने बालक शिवाजी को बचपन से संस्कारित करने के लिए रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनाईं। धर्म, न्याय और प्रजा-कल्याण के आदर्श सिखाए। विदेशी और अत्याचारी शासन के प्रति प्रतिरोध की भावना जगाई। स्त्रियों के सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता का संस्कार दिया और स्वराज्य के स्वप्न से प्रेरित किया। यह मान्यता है कि शिवाजी के भीतर का स्वराज्य पहले जीजाऊ के मन में जन्मा था।

हिंदवी स्वराज्य की प्रेरणा

इतिहासकारों के अनुसार हिंदवी स्वराज्य की अवधारणा के पीछे जीजाबाई की प्रेरणा अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उन्होंने शिवाजीराजे को केवल सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि प्रजा की रक्षा, धर्म और संस्कृति के संरक्षण, न्यायपूर्ण शासन तथा स्वाभिमानी राज्य निर्माण के लिए प्रेरित किया। इसलिए कई इतिहासकार उन्हें हिंदवी स्वराज्य की आध्यात्मिक जननी भी कहते हैं। हर माँ को अपनी संतान की चिंता होना स्वाभाविक है लेकिन उस चिंता के चलते भी देश को पहले रखने का काम जब कोई पन्नाधाय और जीजा माता जैसी माता करती है तब उस देश का इतिहास गढ़ता है।

राजमाता जीजाबाई भारतीय इतिहास की उन महान महिलाओं में से हैं जिन्होंने केवल एक पुत्र का पालन-पोषण नहीं किया बल्कि एक युगपुरुष का निर्माण किया। मराठा इतिहास में उनका स्थान केवल शिवाजी महाराज की माता के रूप में नहीं बल्कि हिंदवी स्वराज्य की प्रथम प्रेरक, राष्ट्रचेतना की संवाहिका तथा आदर्श प्रशासिका के रूप में है। उन्होंने शिवाजी राजे को धर्मपालन, नैतिक शासन, न्याय और लोक कल्याण के भाव को केंद्र में रख कर योजना और नीतियाँ बनाने का शिक्षण और संस्कार दिये।

महाराज का राज्याभिषेक और अंतिम समय

6 जून 1674 को छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक संपन्न हुआ। यह वह क्षण था जिसका स्वप्न जीजाबाई ने दशकों तक देखा था। राज्याभिषेक के कुछ ही दिनों बाद 17 जून 1674 को उनका निधन हो गया। ऐसा माना जाता है कि स्वराज्य को विधिवत स्थापित होते देखने के बाद उनका जीवन ध्येय पूर्ण हो चुका था। जीजाबाई का महत्व तीन स्तरों पर समझा जा सकता है-

1. राष्ट्रनिर्माता माता- उन्होंने एक ऐसे नेतृत्व का निर्माण किया जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।

2. कुशल मार्गदर्शक- वे केवल माता नहीं स्वराज्य आंदोलन की वैचारिक प्रेरक भी थीं।

3. आदर्श प्रशासिका- पुणे जागीर के संचालन में उनकी प्रशासनिक दक्षता स्पष्ट दिखाई देती है।

राजमाता जीजाबाई का जीवन भारतीय इतिहास में मातृत्व, राष्ट्रचेतना, नेतृत्व और सांस्कृतिक आत्मसम्मान का अद्वितीय उदाहरण है। यदि शिवाजी महाराज हिंदवी स्वराज्य के निर्माता थे, तो जीजाबाई उस स्वराज्य की प्रथम प्रेरणा, वैचारिक आधारशिला और नैतिक शक्ति थीं। मराठा इतिहास में उनका स्थान केवल शिवाजी की माता तक सीमित नहीं है वे स्वयं एक युगनिर्माता व्यक्तित्व हैं।

जीजामाता के सबक

जो माता अपने बच्चों को हमेशा एक सुरक्षा की खोल में रखती है, उसे परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार नहीं करती। उस माँ के बच्चे अपने जीवन में किसी मुकाम को हासिल नहीं कर पाते, जरा से संकट या थोड़ी-सी विपरीत परिस्थिति आने के बाद वे विचलित हो जाते हैं ओर गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं।

माँ को यह चाहिए होता है कि वह अपने बच्चों के जीवन की चिंता जरूर करें लेकिन उसके साथ उसे अच्छे संस्कार देकर अपने जीवन में किसी बड़े उद्देश्य के लिए जीना सिखाए, बड़ा लक्ष्य उसके सामने रखें और रास्ता हमेशा नैतिकता का हो ये बेहद जरूरी होता है। हर बच्चे के भीतर एक उज्जवल संभावना का बीज छिपा होता है। माँ की यह भूमिका होती है कि वो उस बीज को पहचाने और फिर अपने बच्चों को ऐसा वातावरण दे जिससे वह अच्छी तरह अंकुरित हो सके, पुष्पित पल्लवित होकर वट वृक्ष जैसा विशाल आकर लेकर अपने घर-परिवार के साथ समाज, देश और दुनिया के लिए अच्छा काम कर सके।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी