आत्मनिर्भर भारत के संकल्प से विश्वगुरु बनेगा भारत
कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
कोई भी राष्ट्र शक्तिशाली तब बनता है जब वह अपने ‘स्व’ के अधिष्ठान से संचालित होता है। राष्ट्र का जन-जन और उसकी समूची व्यवस्थाएं जब ‘स्व’ के आधार पर सुचारू रूप से चलती हैं, और हर व्यक्ति के मन में राष्ट्र के वैभव का संकल्प होता है, तब उसकी निष्पत्ति आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में होती है। यह आत्मनिर्भरता किसी भी राष्ट्र की वह शक्ति है जो उसकी उन्नति का कारक तो होती ही है, साथ ही संपूर्ण विश्व में उसकी यश कीर्ति का व्यापक और दूरगामी प्रभाव छोड़ती है।
इक्कीसवीं सदी भारत की सदी है और भारत युगों की गौरवशाली चेतना के साथ नए स्वरूप में पुनः खड़ा हुआ है। शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, तकनीकी, विज्ञान, रक्षा, अधोसंरचना, नवाचार, कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, डिजिटल संप्रभुता, साइबर सुरक्षा, कृषि आदि समस्त क्षेत्रों में नई गति और प्रगति देखने को मिल रही है।
यह इसलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि राष्ट्र में स्वदेशी और नवाचारों को व्यापक प्रसार मिल रहा है। केंद्रीय और राज्यों के बजट में भारत को सशक्त करने की दिशा में राशि का आवंटन हो रहा है। नई संभावनाओं के क्षेत्र तलाशे जा रहे हैं। रक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में सेनाओं को आधुनिक तकनीकों और आयुध सामग्रियों से सुसज्जित किया जा रहा है। इसरो और डीआरडीओ जैसे संस्थान निरंतर नई खोज, नए मिशन और रक्षा सामग्री उत्पादन के क्षेत्र में अग्रगण्य भूमिका निभा रहे हैं।
भारत अब आवश्यक रक्षा सामग्री के आयात के साथ साथ निर्यात के क्षेत्र में भी आगे बढ़ चुका है। वित्त वर्ष 2024 25 में भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। आज भारत के हथियारों और तकनीक की विश्व स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ी है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय उच्च तकनीकी और हथियारों का विश्व ने लोहा माना। मिशन सुदर्शन चक्र जैसी नीतियां रक्षा क्षेत्र में भारत को और सशक्त बना रही हैं।
नवीकरणीय और वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में भी सकारात्मक परिवर्तन हो रहे हैं। आत्मनिर्भर भारत अभियान और स्टार्टअप इंडिया सहित उद्यमों तथा एमएसएमई क्षेत्र की प्रगति ने भारत को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2016 में स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत के समय लगभग 500 स्टार्टअप थे, जबकि आज मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या दो लाख से अधिक हो चुकी है, जिनमें 125 से अधिक यूनिकॉर्न के रूप में स्थापित हो चुके हैं।
अंतरिक्ष क्षेत्र में गगनयान और चंद्रयान जैसे मिशन, उपग्रह प्रौद्योगिकी, नए सैटेलाइट प्रक्षेपण, खेलों में भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय भागीदारी, वैश्विक व्यापार और बाजार में बढ़ती साख, साइबर सुरक्षा, डिजिटल बैंकिंग, यूपीआई और भारतीय मुद्रा रुपये में अंतरराष्ट्रीय लेनदेन की पहलें, ये सब भारत के उभरते वैश्विक स्वरूप के प्रमाण हैं। प्रवासी भारतीयों का बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नेतृत्व भी विकसित भारत की दिशा में अनुकूल वातावरण निर्मित कर रहा है। इन सबके केंद्र में है भारत का भारत होना, अर्थात ‘स्व’ के बोध के साथ नीतियों का क्रियान्वयन और जनसमूह की सक्रिय भागीदारी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भरता पर स्पष्ट कहा है कि दूसरों पर निर्भरता किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। निर्भरता जब आदत बन जाती है तो वह खतरनाक हो जाती है। आत्मनिर्भरता केवल आयात निर्यात या मुद्रा का प्रश्न नहीं है, बल्कि अपनी क्षमताओं और अपने पैरों पर खड़े होने की शक्ति का विषय है।
स्वदेशी के संदर्भ में उन्होंने आह्वान किया कि जिस प्रकार स्वदेशी के मंत्र ने स्वतंत्रता संग्राम को शक्ति दी, उसी प्रकार यह राष्ट्र की समृद्धि की यात्रा को भी ऊर्जा देगा। हमें वही वस्तुएं खरीदनी चाहिए जो मेड इन इंडिया हों, जिनमें हमारे युवाओं का श्रम और परिश्रम जुड़ा हो। हर घर स्वदेशी का प्रतीक बने और हर दुकान स्वदेशी वस्तुओं से सजी हो। स्पष्ट है कि आत्मनिर्भरता और स्वदेशी केवल नारे नहीं, बल्कि राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की आधारशिला हैं। कोई भी बड़ा परिवर्तन केवल सरकारों के भरोसे नहीं होता। जब समाज की शक्ति जागृत होती है और ‘स्व’ का जयघोष करती है, तब नीतियां प्रभावी और सर्वस्पर्शी बनती हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने भी कहा है कि यदि भारत को आत्मनिर्भर बनना है तो उसे अपने स्वत्व को समझना होगा। जहाँ स्वत्व है वहीं बल, शक्ति और समृद्धि का निवास है। भारत की प्राचीन परंपरा और ऐतिहासिक गौरव इस सत्य के साक्षी हैं कि जब हम अपने स्वत्व पर दृढ़ रहे, तब विश्व में अग्रणी रहे।
भारत का अतीत सोने की चिड़िया के रूप में विख्यात था क्योंकि ज्ञान विज्ञान, व्यापार, नीति और सांस्कृतिक उत्कर्ष में हम अग्रणी थे। विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन ने इस प्रगति को बाधित किया, किंतु अब भारत पुनः अपने आत्मबोध के साथ आगे बढ़ रहा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी स्वदेशी के महत्व पर बल देते हुए चेताया था कि पाश्चात्य अनुकरण की अंधी दौड़ हमें अपनी जड़ों से दूर कर सकती है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी शिक्षा, अर्थनीति और सांस्कृतिक दृष्टि को भारतीय मूल्यों से जोड़ें।
भारत का उभार विश्व को अपने तरीके से नियंत्रित करने के लिए नहीं, बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को साकार करने के लिए है। हमारा आदर्श है परहित और समन्वय। हम विश्व को अपना जीवनमूल्य आधारित उदाहरण देना चाहते हैं, न कि किसी पर आधिपत्य स्थापित करना। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए रक्षा, शिक्षा, अनुसंधान, विज्ञान तकनीकी, एआई, इंटरनेट, स्वदेशी हथियार, नवाचार, स्टार्टअप, वैश्विक व्यापार मॉडल और सांस्कृतिक समन्वय में तीव्र गति से कार्य करना होगा। साथ ही भारत को अपने सूचना और संचार तंत्र विकसित करने, वैकल्पिक सोशल मीडिया मंचों के निर्माण, साइबर सुरक्षा और बौद्धिक संपदा संरक्षण पर भी गंभीरता से आगे बढ़ना होगा।
इन सभी कार्यों में युवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक युवा स्वयं को भारत का वैश्विक प्रतिनिधि माने और ऐसे प्रामाणिक कार्य करे जो राष्ट्र के जनजीवन को सरल बनाए और विश्व के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करे। जब आत्मनिर्भरता का संकल्प जन-जन तक पहुंचेगा और हम अपनी भूमिकाओं को समझते हुए कार्य करेंगे, तब विकसित भारत 2047 का लक्ष्य अवश्य साकार होगा। नया भारत अपनी नई कहानी के साथ विश्व के श्रेष्ठ नेतृत्वकर्ता के रूप में पुनः प्रतिष्ठित होगा।
(लेखक, हित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

