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समुद्री मार्गों की शक्ति : विश्व के प्रमुख जलडमरूमध्यों पर संघर्ष और प्रतिस्पर्धा

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समुद्री मार्गों की शक्ति : विश्व के प्रमुख जलडमरूमध्यों पर संघर्ष और प्रतिस्पर्धा


समुद्री मार्गों की शक्ति : विश्व के प्रमुख जलडमरूमध्यों पर संघर्ष और प्रतिस्पर्धा


समुद्री मार्गों की शक्ति : विश्व के प्रमुख जलडमरूमध्यों पर संघर्ष और प्रतिस्पर्धा


अमरेश द्विवेदी

जलडमरूमध्य समुद्र या महासागर का वह संकीर्ण प्राकृतिक मार्ग है, जो दो बड़े जल निकायों को जोड़ता है और सामान्यतः दो भू-भागों के बीच स्थित होता है। आकार में छोटे होने के बावजूद जलडमरूमध्य का भूराजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और सामरिक महत्व अत्यधिक होता है। विश्व के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों का एक बड़ा हिस्सा कुछ महत्वपूर्ण जलडमरूमध्यों से होकर गुजरता है। तेल, प्राकृतिक गैस, खाद्यान्न, औद्योगिक कच्चा माल और निर्मित वस्तुओं के परिवहन में इनका विशेष योगदान है।

इसी कारण जलडमरूमध्य केवल भौगोलिक संरचनाएँ नहीं हैं बल्कि वे वैश्विक शक्ति-संतुलन के केंद्र भी बन गए हैं। इनके आसपास होने वाला युद्ध, राजनीतिक तनाव, समुद्री सीमा विवाद, नाकेबंदी या जहाजों पर हमले पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।

1. होर्मुज़ जलडमरूमध्य: ऊर्जा सुरक्षा का केंद्रहोर्मुज़ जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। इसके आसपास ईरान और ओमान स्थित हैं तथा संयुक्त अरब अमीरात भी निकटवर्ती क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। होर्मुज़ का सबसे बड़ा महत्व वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ा है। फारस की खाड़ी के तेल और गैस उत्पादक देशों से निकलने वाले बड़े पैमाने के ऊर्जा निर्यात के लिए यह प्रमुख समुद्री मार्ग है। ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव, ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा क्षेत्रीय संघर्षों के कारण होर्मुज़ बार-बार अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बना है। ईरान द्वारा कभी-कभी इस मार्ग को बाधित करने की चेतावनी देना भी वैश्विक तेल बाजारों में अस्थिरता पैदा करता है। इसलिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं है; इसका सीधा संबंध भारत, चीन, जापान और यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा से भी है।

2. बाब-अल-मंदेब : लाल सागर का संकटबाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। इसके एक ओर यमन तथा दूसरी ओर अफ्रीका का जिबूती और इरिट्रिया क्षेत्र स्थित है। यह मार्ग यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से जहाज लाल सागर और स्वेज नहर की दिशा में जाते हैं। यमन के गृहयुद्ध और हूती आंदोलन के कारण इस क्षेत्र की सुरक्षा लंबे समय से चिंता का विषय रही है। जहाजों पर हमलों और सुरक्षा जोखिमों के कारण कई वाणिज्यिक जहाजों को वैकल्पिक लंबे मार्गों का उपयोग करना पड़ा है। इसका परिणाम यह हुआ कि यूरोप-एशिया व्यापार की लागत और यात्रा समय बढ़ सकता है। इसलिए बाब-अल-मंदेब यह दिखाता है कि किसी छोटे से समुद्री चोकपॉइंट में अस्थिरता वैश्विक सप्लाई श्रृंखला को कैसे प्रभावित कर सकती है।

3. ताइवान जलडमरूमध्य : चीन और ताइवान का तनावताइवान जलडमरूमध्य चीन के मुख्य भूभाग और ताइवान के बीच स्थित है। यह वर्तमान विश्व राजनीति के सबसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में से एक है। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान अपनी अलग राजनीतिक व्यवस्था के साथ स्वयं शासित है। अमेरिका ताइवान के साथ अनौपचारिक संबंध और सुरक्षा सहयोग बनाए रखता है। इस क्षेत्र में चीनी सैन्य अभ्यास, ताइवान की सुरक्षा और अमेरिकी नौसैनिक गतिविधियाँ तनाव को बढ़ाती हैं। यदि यहां गंभीर सैन्य संघर्ष होता है, तो इसका प्रभाव केवल पूर्वी एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। ताइवान वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए ताइवान जलडमरूमध्य में संघर्ष से तकनीकी उद्योग, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

4. मलक्का जलडमरूमध्य : व्यापार और सुरक्षामलक्का जलडमरूमध्य मलय प्रायद्वीप और इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के बीच स्थित है। यह हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र को जोड़ने वाले सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। बड़ी मात्रा में ऊर्जा और व्यापारिक वस्तुएँ इस मार्ग से होकर गुजरती हैं। मलक्का में वर्तमान में होर्मुज़ या बाब-अल-मंदेब जैसी प्रत्यक्ष युद्ध स्थिति नहीं है, लेकिन यहां समुद्री डकैती, आतंकवाद, दुर्घटनाएँ और संभावित सैन्य प्रतिस्पर्धा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ पैदा करती हैं। चीन की “मलक्का का धर्मसंकट” की अवधारणा इसी चिंता से जुड़ी है कि संकट की स्थिति में उसकी ऊर्जा आपूर्ति इस चोकपॉइंट पर निर्भर रह सकती है। इसी कारण चीन वैकल्पिक समुद्री और स्थल मार्ग विकसित करने की कोशिश करता रहा है।

5. जिब्राल्टर जलडमरूमध्य : यूरोप और अफ्रीका के बीचजिब्राल्टर जलडमरूमध्य अटलांटिक महासागर और भूमध्य सागर को जोड़ता है। इसके उत्तर में स्पेन और दक्षिण में मोरक्को स्थित हैं। इसके निकट ब्रिटेन का जिब्राल्टर क्षेत्र भी स्थित है। जिब्राल्टर को लेकर ब्रिटेन और स्पेन के बीच लंबे समय से राजनीतिक विवाद रहा है। ब्रिटेन का नियंत्रण इस क्षेत्र को यूरोप की सुरक्षा और समुद्री रणनीति में महत्वपूर्ण बनाता है। यह जलडमरूमध्य यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के बीच समुद्री संपर्क का महत्वपूर्ण मार्ग है। साथ ही नाटाे और अन्य शक्तियों के लिए भी इसका सैन्य महत्व है।

6. बॉस्फोरस और डार्डानेल्स: रूस-यूक्रेन संदर्भतुर्की के बॉस्फोरस और डार्डानेल्स जलडमरूमध्य काला सागर को भूमध्य क्षेत्र से जोड़ते हैं। इनके बीच मारमारा सागर स्थित है। इन जलमार्गों का महत्व रूस, यूक्रेन, तुर्की और अन्य काला सागर देशों के लिए बहुत अधिक है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के संदर्भ में इनका रणनीतिक महत्व और बढ़ गया है। तुर्की इन जलडमरूमध्यों पर नियंत्रण रखता है और मोंट्रो कन्वेंशन के तहत युद्धपोतों की आवाजाही के संबंध में विशेष अधिकार रखता है। इस कारण तुर्की की नीति काला सागरकी सामरिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है। इन जलडमरूमध्यों से अनाज, ऊर्जा और अन्य वस्तुओं का व्यापार भी जुड़ा है। इसलिए इनका महत्व सैन्य के साथ-साथ आर्थिक भी है।

7. केर्च जलडमरूमध्य: रूस-यूक्रेन विवादकेर्च जलडमरूमध्य, काला सागर और अज़ोव सागर को जोड़ता है। यह रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष के संदर्भ में महत्वपूर्ण बन गया है। क्रीमिया के रूस द्वारा 2014 में अधिग्रहण के बाद इस क्षेत्र की राजनीतिक और सैन्य संवेदनशीलता बढ़ गई। रूस ने केर्च ब्रिज का निर्माण करके क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत की। इस जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का संबंध समुद्री यातायात, सैन्य गतिविधियों और यूक्रेन के बंदरगाहों तक पहुंच से जुड़ा है। इसलिए यह क्षेत्र रूस-यूक्रेन संघर्ष में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बिंदु रहा है।

8. पाल्क जलडमरूमध्य : भारत और श्रीलंकापाल्क जलडमरूमध्य भारत और श्रीलंका के बीच स्थित है। यह क्षेत्र अपेक्षाकृत उथला है और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों का क्षेत्र रहा है। यहां प्रमुख समस्या सैन्य संघर्ष के बजाय मछली पकड़ने, समुद्री सीमा और मछुआरों की गिरफ्तारी से जुड़ी है। भारतीय और श्रीलंकाई मछुआरों के बीच सीमा पार करने तथा समुद्री संसाधनों के उपयोग को लेकर समय-समय पर विवाद उत्पन्न होते हैं। भारत और श्रीलंका के लिए चुनौती यह है कि स्थानीय लोगों की आजीविका और समुद्री पर्यावरण की रक्षा करते हुए सीमा संबंधी विवादों का शांतिपूर्ण समाधान किया जाए।

9. लुज़ोन जलडमरूमध्य : इंडो-पैसिफिक प्रतिस्पर्धालुज़ोन जलडमरूमध्य ताइवान और फिलीपींस के बीच स्थित है। यह दक्षिण चीन सागर और पश्चिमी प्रशांत के बीच रणनीतिक संपर्क प्रदान करता है। चीन, ताइवान, फिलीपींस और अमेरिका की इंडो-पैसिफिकरणनीतियों के कारण यह क्षेत्र तेजी से महत्वपूर्ण हुआ है। फिलीपींस की अमेरिका के साथ सुरक्षा साझेदारी और दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती गतिविधियां इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को बढ़ाती हैं। भविष्य में ताइवान संकट की स्थिति में लुज़ोन जलडमरूमध्य सैन्य आवाजाही और समुद्री रणनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

10. बेरिंग जलडमरूमध्य : अमेरिका और रूस बेरिंग जलडमरूमध्य अमेरिका के अलास्का और रूस के सुदूर पूर्व के बीच स्थित है। यह प्रशांत और आर्कटिक क्षेत्रों को जोड़ता है। आर्कटिक में बर्फ पिघलने और नए समुद्री मार्गों की संभावनाओं के कारण बेरिंग जलडमरूमध्य का महत्व बढ़ रहा है। अमेरिका और रूस के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में यह क्षेत्र भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

जलडमरूमध्यों में संघर्ष का सबसे बड़ा प्रभाव वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ता है। यदि किसी महत्वपूर्ण संकरे मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है तो जहाजों को लंबा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ सकता है। इससे परिवहन लागत बढ़ती है। तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। बीमा लागत बढ़ सकती है। खाद्य और औद्योगिक वस्तुओं की कीमत प्रभावित हो सकती है। वैश्विक सप्लाई श्रृंखला में देरी हो सकती है। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।

भारत जैसे देशों के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार और ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर है।

जलडमरूमध्य से जुड़े विवादों का समाधान केवल सैन्य शक्ति से नहीं किया जा सकता। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय कानून, कूटनीति, समुद्री सुरक्षा सहयोग और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (यूएनसीएलओएस) समुद्री क्षेत्रों और नौवहन से जुड़े अनेक अधिकारों और दायित्वों का कानूनी ढांचा प्रदान करता है। देशों को समुद्री सीमा विवादों का समाधान बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कानून के माध्यम से करना चाहिए। साथ ही, महत्वपूर्ण संकरे मार्ग के लिए वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग, रणनीतिक भंडार और मजबूत समुद्री सुरक्षा व्यवस्था विकसित करना आवश्यक है।

दुनिया के जलडमरूमध्य आकार में छोटे हो सकते हैं लेकिन उनका महत्व वैश्विक स्तर पर बहुत बड़ा है। होर्मुज़ ऊर्जा सुरक्षा, बाब-अल-मंदेब वैश्विक व्यापार, ताइवान जलडमरूमध्य महाशक्ति प्रतिस्पर्धा, मलक्का व्यापारिक आपूर्ति, जिब्राल्टर यूरोप-अफ्रीका संपर्क और बॉस्फोरस-डार्डानेल्स, काला सागर भू-राजनीति के महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

21वीं सदी में समुद्री शक्ति और आर्थिक शक्ति का संबंध और गहरा होता जा रहा है। इसलिए जलडमरूमध्यों पर नियंत्रण, स्वतंत्र नौवहन और समुद्री सुरक्षा आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख मुद्दे बने रहेंगे। अतः विश्व शांति और आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक है कि इन रणनीतिक समुद्री मार्गों को संघर्ष के क्षेत्र के बजाय सहयोग के गलियारे के रूप में विकसित किया जाए।(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी