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सावन विशेष : भोलेनाथ के हर स्वरूप में छिपा है मानवता, समरसता और लोक कल्याण का संदेश

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सावन विशेष : भोलेनाथ के हर स्वरूप में छिपा है मानवता, समरसता और लोक कल्याण का संदेश


सावन विशेष : भोलेनाथ के हर स्वरूप में छिपा है मानवता, समरसता और लोक कल्याण का संदेश


सावन विशेष : भोलेनाथ के हर स्वरूप में छिपा है मानवता, समरसता और लोक कल्याण का संदेश


-उदय कुमार सिंह

सावन का महीना आते ही संपूर्ण वातावरण शिवमय हो उठता है। मंदिरों में घंटों की ध्वनि, हर-हर महादेव के जयघोष, शिवभक्तों की लंबी कतारें, कांवड़ियों की पदयात्रा और जलाभिषेक का उत्साह केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति की उस गहरी चेतना का उत्सव है, जिसमें भगवान शिव जन-जन के आराध्य बनकर विराजमान हैं। गांवों से लेकर महानगरों तक, हिमालय की चोटियों से लेकर समुद्र तटों तक, हर शिवालय में श्रद्धा का सागर उमड़ पड़ता है।

भगवान शिव भारतीय संस्कृति के ऐसे अद्वितीय देव हैं, जिनके व्यक्तित्व में जितना रहस्य है, उतनी ही सरलता भी है; जितनी विराटता है, उतनी ही आत्मीयता भी। वे एक ओर कैलाश के योगी हैं तो दूसरी ओर लोकजीवन के भोलेनाथ। वे संन्यासी भी हैं और आदर्श गृहस्थ भी। वे संहारक भी हैं और सृष्टि के महान रक्षक भी। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में शिव केवल पूजनीय देवता नहीं बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दर्शन, सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक ऊर्जा और मानवीय मूल्यों के सर्वोच्च प्रतीक माने जाते हैं।

भगवान शिव का बाहरी स्वरूप जितना विचित्र प्रतीत होता है, उसके पीछे छिपा संदेश उतना ही गहन और व्यावहारिक है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र, जटाओं में प्रवाहित गंगा, तीसरा नेत्र, नीलकंठ, गले में सर्प, शरीर पर भस्म, हाथ में त्रिशूल और डमरू- इनमें से कोई भी प्रतीक केवल अलंकरण नहीं है। प्रत्येक मानव जीवन के किसी न किसी सत्य, मूल्य और आदर्श की व्याख्या करता है।

शिव का पूरा व्यक्तित्व हमें यह सिखाता है कि बाहरी सौंदर्य से अधिक महत्वपूर्ण आंतरिक चरित्र होता है। वास्तविक महानता वैभव, संपत्ति और शक्ति से नहीं, बल्कि त्याग, करुणा, संतुलन और लोकमंगल की भावना से मापी जाती है।

वास्तव में भगवान शिव का स्वरूप जितना अद्भुत, अलौकिक और रहस्यमय दिखाई देता है, उतना ही गूढ़, दार्शनिक और जीवनोपयोगी भी है। उनके शरीर पर धारण किया गया प्रत्येक प्रतीक, प्रत्येक आभूषण और प्रत्येक आयुध दिव्यता के परिचायक के साथ मानव जीवन के लिए गहन संदेश भी समेटे हुए है। शिव जीवन-दर्शन के ऐसे महान आचार्य हैं, जिनका संपूर्ण व्यक्तित्व करुणा, समता, त्याग, संतुलन, निर्भयता और लोककल्याण की सर्वोच्च व्याख्या करता है।

भगवान शिव केवल देवताओं के देव महादेव और समाज के उन सभी उपेक्षित, तिरस्कृत और भय का कारण माने जाने वाले तत्वों को भी अपने स्नेह और संरक्षण में स्थान देने वाले देवता हैं, जिन्हें सामान्य मनुष्य अपने जीवन से दूर रखना चाहता है। जिस सांप और बिच्छू को देखकर अधिकांश लोग भयभीत हो जाते हैं और उसे मार देना चाहते हैं, उसी सर्प को भगवान शिव अपने गले का आभूषण बना लेते हैं। समुद्र मंथन के समय निकले कालकूट (हलाहल) विष को, जिसे देवता और दानव दोनों स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा सके, भगवान शिव बिना किसी संकोच के अपने कंठ में धारण कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा करते हैं। उनका नीलकंठ स्वरूप यह संदेश देता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो लोककल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहने को तैयार हो।

भगवान शिव का यह स्वरूप पौराणिक आख्यान के साथ सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदना का भी अद्भुत दर्शन है। समाज गाय से दूध प्राप्त करता है और युवा बैल से खेती-किसानी का कार्य करवाता है, किंतु जब वही बैल वृद्ध हो जाता है तो उसकी उपेक्षा करने लगता है। भगवान शिव उसी उपेक्षित वृषभ को अपना वाहन बनाकर यह संदेश देते हैं कि किसी भी प्राणी का सम्मान उसकी उपयोगिता से नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व से होना चाहिए। नंदी केवल शिव के वाहन के साथ धर्म, निष्ठा, धैर्य और समर्पण के जीवंत प्रतीक हैं।

जिस श्मशान में जाने से सामान्य मनुष्य भयभीत रहता है, भगवान शिव उसी श्मशान की भस्म को अपने शरीर का श्रृंगार बनाते हैं। वे बताते हैं कि मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है और जो इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, वह भय, मोह और अहंकार से मुक्त हो जाता है। उनके लिए कोई स्थान अपवित्र नहीं, कोई जीव तिरस्कृत नहीं और कोई परिस्थिति अशुभ नहीं। यही कारण है कि शिव को समभाव और समदृष्टि का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।

भगवान शिव की बारात भी उनके व्यक्तित्व की व्यापकता को दर्शाती है। जहां सामान्य व्यक्ति विवाह जैसे मंगल अवसर पर सजे-धजे, प्रतिष्ठित और सम्मानित लोगों को साथ लेकर चलना चाहता है, वहीं शिव की बारात में भूत, प्रेत, पिशाच, गण, योगी, औघड़ और समाज के उपेक्षित पात्र सम्मिलित होते हैं। यह दृश्य केवल पौराणिक कल्पना नहीं बल्कि इस सत्य का उद्घोष है कि भगवान शिव के द्वार पर किसी के रूप, वेश, कुल, जाति, धन या सामाजिक प्रतिष्ठा का कोई महत्व नहीं है। उनके लिए प्रत्येक जीव समान है। वे भेदभाव नहीं बल्कि समावेश के देवता हैं।

भगवान शिव को 'आशुतोष' कहा जाता है, अर्थात् वे जो अत्यंत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। वे बिना किसी भेदभाव के अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं। वास्तव में वही सबसे बड़ा दानी हो सकता है, जिसे स्वयं किसी वस्तु की इच्छा न हो। भगवान शिव इसी त्याग, वैराग्य और उदारता के प्रतीक हैं। यही कारण है कि उन्हें देवाधिदेव, औघड़दानी और भोलेनाथ जैसे सम्मानसूचक नामों से पुकारा जाता है।

उनकी करुणा का विस्तार इतना व्यापक है कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जैसे आदर्श पुरुषों के साथ रावण जैसे महान विद्वान किंतु अहंकारी भक्त के तप से भी प्रसन्न होकर उसे वरदान प्रदान करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिव के लिए किसी व्यक्ति का कुल, जाति, धन, पद या प्रतिष्ठा नहीं बल्कि उसकी श्रद्धा, तप और समर्पण ही सर्वोपरि है।

शिव संभवतः ऐसे एकमात्र देव हैं जिन्हें प्रसन्न करने के लिए स्वर्ण, रत्न, बहुमूल्य वस्त्र अथवा भव्य पूजन सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। एक लोटा जल, कुछ बेलपत्र, धतूरा, आक के पुष्प और मिट्टी से निर्मित पार्थिव शिवलिंग पर अर्पित निष्कपट श्रद्धा ही उन्हें प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। यही सहजता उन्हें लोकजीवन का सबसे निकट और सर्वसुलभ देव बनाती है।

समाज में अनेक लोग अपने दुर्व्यसनों को भगवान शिव से जोड़कर उचित ठहराने का प्रयास करते हैं, जबकि शिव-दर्शन का वास्तविक संदेश इससे बिल्कुल भिन्न है। भगवान शिव का विषपान लोककल्याण के लिए था, आत्मविनाश के लिए नहीं। वे तप, संयम, आत्मनियंत्रण और त्याग के प्रतीक हैं। उनका जीवन यह सिखाता है कि संसार का विष स्वयं सहकर भी दूसरों को अमृत बांटना वास्तविक शिवत्व है।

भगवान शिव उन सभी वंचित, शोषित और उपेक्षित लोगों के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं, जिन्हें समाज ने कुल, गोत्र, जाति, धन अथवा बाहरी पहचान के आधार पर कभी कमतर आंका। शिव के दरबार में इन सबका महत्व नहीं रह जाता। वहां केवल भक्ति, समर्पण और निष्कपट भाव का मूल्य है। इसीलिए शिव लोकदेवता भी हैं और महादेव भी।

अर्धनारीश्वर के रूप में भगवान शिव स्त्री-पुरुष की समानता, परस्पर सम्मान और सहधर्मिता के सर्वोच्च प्रतीक हैं। वे यह संदेश देते हैं कि शक्ति के बिना शिव भी 'शव' के समान हैं। स्त्री और पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान और उसकी अनिवार्य भूमिका का इससे श्रेष्ठ दार्शनिक प्रतिपादन दुर्लभ है।

दक्ष प्रजापति के यज्ञ में माता सती के अपमान और आत्मदाह के बाद भगवान शिव का तांडव उनके क्रोध के साथ अन्याय, अहंकार और अधर्म के विरुद्ध प्रतिरोध का उद्घोष था। शिव यहां उस संवेदनशील पति के रूप में सामने आते हैं, जो अपनी अर्धांगिनी के सम्मान के लिए समस्त व्यवस्था को चुनौती देने का साहस रखता है। उनका यह स्वरूप सिखाता है कि करुणा जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक अन्याय के विरुद्ध अडिग होकर खड़ा होना भी है।

यदि देवताओं के वैभव की तुलना की जाए तो भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषशय्या पर विराजमान, रत्नाभूषणों से विभूषित और समस्त ऐश्वर्य से संपन्न दिखाई देते हैं। दूसरी ओर भगवान शिव दिगंबर हैं, शरीर पर भस्म धारण किए हुए हैं, गले में सर्प हैं, हाथ में त्रिशूल और डमरू है तथा उनका निवास कैलाश और श्मशान दोनों हैं। फिर भी भारतीय संस्कृति में असंख्य महिलाएं सोमवार का व्रत रखकर शिव जैसा जीवनसाथी पाने की कामना करती हैं। इसका कारण उनका बाहरी वैभव नहीं बल्कि उनका व्यक्तित्व है। वे अपनी अर्धांगिनी को चरणों में नहीं बल्कि अपने आधे शरीर में स्थान देते हैं। वे संवाद करते हैं, सम्मान देते हैं, समानता का भाव रखते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उसके सम्मान की रक्षा के लिए संपूर्ण संसार से संघर्ष करने का साहस भी रखते हैं।

भगवान शिव लोक और शास्त्र, दोनों के समान प्रिय देवता हैं। वेदों के रुद्र से लेकर लोकजीवन के भोलेनाथ तक उनकी यात्रा भारतीय संस्कृति की सबसे अद्भुत आध्यात्मिक यात्राओं में से एक है। उन पर वेद, उपनिषद, पुराण, महाकाव्य, आगम, तंत्र, स्तोत्र और असंख्य लोककथाएं उपलब्ध हैं। उनका व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही सहज और सरल भी है।

इसी कारण भारतीय पंचांग का संपूर्ण सावन मास शिवभक्ति का महापर्व बन जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों से लेकर गांव-गांव के छोटे-छोटे शिवालयों तक श्रद्धा का सागर उमड़ पड़ता है। घर-घर में पार्थिव शिवलिंग की स्थापना होती है, जलाभिषेक किया जाता है और हर-हर महादेव का उद्घोष वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।

भगवान शिव केवल मंदिरों में प्रतिष्ठित देवता नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। वे योग हैं, भोग से वैराग्य हैं; वे संहार हैं, किंतु उसी संहार के माध्यम से नवसृजन भी हैं। वे करुणा हैं, न्याय हैं, समता हैं, साहस हैं और अनंत चेतना के प्रतीक हैं। सावन का वास्तविक महत्त्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं बल्कि शिव के इन दिव्य गुणों को अपने जीवन में उतारने में है। जब मनुष्य अपने भीतर करुणा, समभाव, त्याग, सत्य, संयम, साहस, प्रकृति-प्रेम और लोककल्याण की भावना को जागृत कर लेता है, तभी उसकी शिवभक्ति पूर्ण होती है। यही भगवान भोलेनाथ के विराट व्यक्तित्व का शाश्वत संदेश है और यही सावन का वास्तविक आध्यात्मिक सार है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह