(व्यंग्य) लोकतंत्र का इजराइली संस्करण और वोट चोरी का ग्लोबल विलाप
विनय के पाठक
दुनिया के राजनीति विज्ञानियों का मानना था कि 'वोट चोरी' और 'ईवीएम-बैलेट का विलाप' जैसी दिव्य कलाएं सिर्फ भारत या तीसरी दुनिया के विकासशील देशों के विपक्ष के पास ही सुरक्षित हैं। लेकिन धन्य है इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू उर्फ बीबी की महान लिकुड पार्टी, जिसने इस कला का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया है! भारत में तो विपक्ष चुनाव हारने के बाद दो-चार दिन रो-धोकर छुट्टी मनाने वियतनाम निकल जाता है, लेकिन इजराइल के बीबी (नेतन्याहू) ने साबित कर दिया कि वे हार के बाद वियतनाम नहीं, सीधे 'वोट चोरी' के ब्रह्मांडीय सिद्धांत की शरण में जाते हैं।
इजराइल के ताजा चुनाव नतीजों ने वहां के राष्ट्रवादियों की छाती पर ऐसा मूंग दला है कि अब उन्हें हर मतपेटी में कतर का रियाल और तुर्किये का सिक्का खनकता हुआ सुनाई दे रहा है। कुल 120 सीटों वाली संसद यानी नेसेट में नेतन्याहू साहब 53 सीटों पर ही अटक गए, यानी बहुमत से पूरे आठ कदम दूर! अब जो राजा बनने का सपना देख रहे थे, उनकी हालत यह है कि वे महल के बाहर खड़े होकर चिल्ला रहे हैं—चोर-चोर, हमारी मेहनत की कमाई (वोट) कोई चुरा ले गया!
इस पूरे प्रहसन में सबसे मजेदार किरदार बनकर उभरी हैं वहां की अरब नेतृत्व वाली पार्टियां—राअम, ताअल, बलद और उनके साथ सुर में सुर मिलाने वाली यहूदी कम्युनिस्ट पार्टी हदाश। जो पार्टियां अब तक इजराइल की राजनीति के कोने में बैठकर 'यहूदी राष्ट्रवाद' को कोसती थीं और फिलिस्तीनियों के हक में कसीदे पढ़ती थीं, वे आज अचानक 19 सीटें झटक कर इजराइल की भाग्यविधाता यानी किंगमेकर बन बैठी हैं! यह देखकर नेतन्याहू गुट की बौखलाहट ऐसी है, मानो किसी कट्टर शाकाहारी की थाली में गलती से कबाब परोस दिया गया हो।
अब लिकुड पार्टी ने बिना किसी ठोस सबूत के एक ऐसा भड़काऊ और भावुक बयान जारी किया है, जिसे सुनकर पूरी दुनिया के व्यंग्यकार अपनी कलम तोड़ लें। उसने कहा है कि इजराइल में चुनाव चुरा लिए गए हैं! संसद पर विदेशी कब्जा कराने और इजराइल का इस्लामीकरण करने के लिए यह सब किया गया है। वाह! क्या टाइमिंग है। जब तक आप जीत रहे थे, तब तक इजराइल का लोकतंत्र मोसाद की तरह अचूक और पवित्र था। जैसे ही जनता ने उंगली का रुख बदला, लोकतंत्र का 'इस्लामीकरण' हो गया। आरोप लगाया जा रहा है कि अरब मतदाताओं को घरों से निकालने के लिए जो फंडिंग आई, वह कतर और तुर्किये से आई थी। मतलब, इजराइल का प्रबुद्ध वोटर इतना भोला है कि वह कतर के इशारे पर वोट डाल आया!
नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट ने इस पर बड़ा सटीक तंज कसा है। उन्होंने कहा कि मैं स्वागत करता हूं कि नेतन्याहू आखिरकार कतर की दखलंदाजी की निंदा कर रहे हैं। जनता को सब याद है कि कैसे कभी नेतन्याहू जी खुद कतर के पैसों के मामले में घिरे थे, लेकिन सत्ता की कुर्सी जब खिसकती है, तो याददाश्त का कमजोर होना और दूसरों पर उंगली उठाना एक शाश्वत सत्य बन जाता है।
इजराइली पुलिस भी इस लोकतंत्र के जश्न में पीछे नहीं रही। उसने चुनाव की निष्पक्षता की जांच का ऐसा पवित्र वादा किया है, मानो दक्षिणी इजराइल में मतदाताओं को रिश्वत देने के शक में पकड़े गए वे तीन-चार लोग पूरी नेसेट की तकदीर बदल रहे थे। राष्ट्रपति इसाक हर्जोग भी चुनाव के इस 'संवेदनशील मोड़' पर परेशान हैं और पूरे अरब समुदाय को बदनाम न करने की दुहाई दे रहे हैं, लेकिन जब 'कुर्सी खतरे में हो', तो समुदाय क्या और लोकतंत्र क्या!
इस पूरे मामले की पराकाष्ठा देखिए, जो नेतन्याहू फिलिस्तीन और हमास के खिलाफ सख्त रवैये के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर थे, आज उन्हीं के देश में ऐसा 'खेला' होने की आशंका है कि अगर अरब पार्टियों के समर्थन से विपक्षी गठबंधन की सरकार बन गई, तो इजराइल को अपनी पूरी विदेश नीति का व्याकरण बदलना पड़ सकता है।
अंततः, नेतन्याहू साहब वोट चोरी का यह विलाप इसलिए कर रहे हैं ताकि विपक्ष और अरब पार्टियों के बीच किसी भी तरह के ऐतिहासिक यहूदी-अरब गठबंधन को 'देशद्रोह' घोषित करके रोका जा सके। क्योंकि वे जानते हैं कि अगर इस बार वे सत्ता से बाहर हुए, तो सालों पुराने भ्रष्टाचार के मामले और 7 अक्टूबर के हमलों की सुरक्षा खामियां भूत बनकर उन्हें डराएंगी। कुल मिलाकर, इजराइल का यह चुनाव सिखाता है कि चाहे देश बुलेटप्रूफ जैकेट पहनता हो, या आयरन डोम से सुरक्षित हो, चुनाव हारने के बाद जो 'रोना' रोया जाता है, उसका सुर पूरी दुनिया में एक जैसा ही होता है!
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक

