रिजीम चेंज का वैश्विक खतरा और सरसंघचालक की चेतावनी
डॉ. आनंद सिंह राणा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में विजयादशमी उत्सव के अवसर पर अपने संबोधन में विविध समसामयिक विषयों पर गहरे और गंभीर विचार व्यक्त करते हुए रिजीम चेंज (सत्ता परिवर्तन ) के वैश्विक खतरे से न केवल भारत वरन सम्पूर्ण विश्व को आगाह किया है।सरसंघचालक के रिजीम चेंज के निहितार्थ का व्यापक फलक हैं, जिसके आलोक में अपकारी शक्तियों के उद्देश्य का भयावह स्वरुप स्पष्ट होता है,जहां किसी देश में इन विध्वंसकारी शक्तियों द्वारा विविध प्रकार से अराजकता और आतंक का वातावरण स्थापित कर उस देश की सत्ता परिवर्तन ही नहीं वरन उस देश की सभ्यता,संस्कृति और अस्तित्व का विनाश करना है। अराजकता के व्याकरण पर उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के कथन का संदर्भ देते हुए कहा कि हिंसक और अनियंत्रित विद्रोह समाज में केवल अराजकता फैलाते हैं, कोई सार्थक बदलाव नहीं लाते।
मोहन भागवत ने भारत सहित सम्पूर्ण विश्व आगाह किया कि 'रिजीम चेंज' (सत्ता या सरकार परिवर्तन) करने से कभी भी परिस्थितियां नहीं बदलती हैं। इतिहास साक्षी है कि इससे कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ है। यह वैश्विक षड्यंत्र का हिस्सा है। उन्होंने दुनिया भर में हो रही उथल-पुथल का उल्लेख करते हुए कहा कि फ्रांस,अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में जो कुछ भी हुआ, वह सब एक सोचे-समझे षड्यंत्र का हिस्सा है। पश्चिम से एक ऐसी आंधी (आसुरी शक्तियां ) चली है जो हर प्रकार की व्यवस्था, भद्रता और संस्कारों से नफरत करती है और उसे नष्ट करना चाहती है।
भारत मुख्य निशाना है, इसलिए संघ प्रमुख ने चेतावनी दी कि अपने स्वार्थ का पोषण करने वाली कुछ वैश्विक ताकतें भारत की प्रगति से परेशान हैं और उन्होंने भारत को अपने निशाने पर ले लिया है। वे नहीं चाहतीं कि भारत इतना शक्तिशाली बने कि उनके वर्चस्व को चुनौती दे, इसलिए भारत, हिंदू समाज और संघ को कमजोर व विभाजित करने के लिए ऐसी कोशिशें (सत्ता परिवर्तन के प्रयास) भारत में भी की जा रही है। इसलिए बांग्लादेश की तरह भारत में भी 'रिजीम चेंज' कराने और इसे तोड़ने के प्रयास चल रहे हैं, लेकिन भारत में ऐसा होना संभव नहीं है।
उक्त सन्दर्भ में उन्होंने आंदोलनों के राजनीतिकरण पर कहा कि समाज में समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन होने चाहिए, लेकिन आज के दौर में विरोध-प्रदर्शनों को राजनीतिक हितों को साधने और समाज में विभाजन पैदा करने का जरिया (हथियार) बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पिछले दशकों में भारत जिस दृढ़ नीति और पक्के नेतृत्व के साथ आगे बढ़ा है, उसकी वजह से ऐसी हरकतों पर रोक लगी है। शक्तिशाली नेतृत्व के कारण बाहरी शक्तियों की खेल बंद हो गए हैं, इसलिए भारत में सत्ता परिवर्तन कभी नहीं होगा।
सरसंघचालक मोहन भागवत के रिजीम चेंज की चेतावनी को भारत सहित संपूर्ण विश्व को बहुत गंभीरता लेने का समय आ गया है। गौरतलब है कि रिजीम परिवर्तन (शासन परिवर्तन) को वैश्विक स्थिरता और शांति के लिए एक बड़ा खतरा माना जाता है, विशेष रूप से तब जब यह बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप, सैन्य कार्रवाई या हिंसक भीड़तंत्र के माध्यम से किया जाए। यद्यपि , लोकतांत्रिक देशों में शांतिपूर्ण और संवैधानिक रूप से चुनाव के जरिए सत्ता बदलना नागरिकों का अधिकार है,परन्तु जबरन थोपा गया रिजीम चेंज अकसर देशों को तबाह कर देता है। जब किसी देश की स्थापित सरकार को अचानक या हिंसक तरीके से हटाया जाता है, तो वहां एक सत्ता का खालीपन पैदा हो जाता है। इतिहास गवाह है कि इराक, लीबिया और अफगानिस्तान जैसे देशों में बाहरी हस्तक्षेप से हुए रिजीम चेंज के बाद वहां लोकतंत्र आने के बजाय दशकों लंबा गृहयुद्ध शुरू हो गया और आतंकवाद को बढ़ावा मिला।
हाल के वर्षों में कई देशों में हिंसक प्रदर्शनों के जरिए तख्तापलट या रिजीम चेंज की कोशिशें देखी गई हैं। जब भीड़ संसद या सरकारी कार्यालयों पर कब्जा कर लेती है, तो वह लोकतंत्र नहीं बल्कि अराजकता और भीड़तंत्र का रूप ले लेती है, जिससे आम नागरिकों का जीवन और देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर जाती है। वैश्विक विचारकों और नीति विशेषज्ञों (जैसे Yale Law School की रिपोर्ट्स) का मानना है कि किसी भी देश में परिवर्तन आंतरिक, क्रमिक और संवैधानिक तरीकों से ही होना चाहिए। जबरन या अराजक तरीके से किया गया 'रिजीम चेंज' अधिकांश मामलों में सुधार लाने के बजाय स्थिति को और अधिक विनाशकारी बना देता है।
विश्व राजनीति में 'रिजीम चेंज' (सत्ता परिवर्तन) का भयावह खेल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आरंभ हुआ, जब विश्व दो ध्रुवों क्रमशः संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ समर्थक देशों में बट गया और दोनों खेमों के मध्य शीत युद्ध प्रारम्भ हुआ।शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों ने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में तख्तापलट और आंतरिक विद्रोहों को समर्थन दिया था।हाल के दशकों में भी इराक, लीबिया और अन्य देशों में 'लोकतंत्र की स्थापना' या 'मानवाधिकारों की रक्षा' के नाम पर हुए सैन्य हस्तक्षेपों को आलोचक 'रिजीम चेंज' की नीति का हिस्सा मानते हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में रिजीम चेंज के लिए डिजिटल प्रोपेगैंडा और नैरेटिव प्रमुख साधन बन रहे हैं। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया, फेक न्यूज और प्रोपेगैंडा के जरिए किसी भी देश के भीतर अस्थिरता पैदा करना आसान हो गया है। इसे 'हाइब्रिड वॉरफेयर' कहा जाता है, जहां हथियारों के बिना ही किसी देश की व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया जाता है। यह कहना कि पूरी विश्व में एक ही केंद्र से कोई साझा षड्यंत्र चल रहा है, एक बड़ी परिकल्पना हो सकती है। परन्तु ,फिर भी यह पूरी तरह सच है कि शक्तिशाली देश और वैश्विक समूह हमेशा अपने लाभ के लिए कमजोर देशों की सत्ता और नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते आ रहे हैं।
'रिजीम परिवर्तन' के विश्वव्यापी षड्यंत्र को लेकर वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण और दावे सामने आते रहे हैं। परन्तु सच तो ये है कि वैश्विक स्तर पर 'डीप स्टेट' और शक्तिशाली देश इसमें संलिप्त हैं। ऐतिहासिक और समकालीन राजनीतिक परिचर्चाओं में संयुक्त राज्य अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. पर दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी पसंद की सरकारें लाने या विरोधी सरकारों को अस्थिर करने के आरोप लगते रहे हैं। शीतयुद्ध के दौर से लेकर हाल के वर्षों में मध्य-पूर्व जैसे इराक, लीबिया, ईरान और लातिनी अमेरिकी देशों में शासन परिवर्तन के प्रयासों के लिए अक्सर वाशिंगटन के 'डीप स्टेट' को जिम्मेदार माना जाता है।
यह भी कड़वा सच है कि 'न्यू वर्ल्ड ऑर्डर' जैसी वैश्विक षड्यंत्र थ्योरीज का मानना है कि दुनिया के कुछ शक्तिशाली अरबपति (जैसे जॉर्ज सोरोस), बड़े कॉर्पोरेट और वैश्विक थिंक-टैंक मिलकर एक एकल विश्व सरकार स्थापित करने के लिए विभिन्न देशों में 'रिजीम चेंज' की साजिश रचते हैं।इसलिए भारत में हो रहे आंदोलनों का वास्तविक उद्देश्य रिजीम चेंज ही है, जिसका रिमोट कंट्रोल इनके पास ही है।
भारत में पश्चिमी ताकतें, विदेशी टूलकिट और कुछ अंतरराष्ट्रीय एनजीओ भारत की बढ़ती वैश्विक शक्ति और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। इसके तहत भारत की संवैधानिक संस्थाओं, न्यायपालिका और बड़े औद्योगिक समूहों पर डिजिटल नैरेटिव और मनगढ़ंत रिपोर्टों (जैसे हिंडनबर्ग या ओसीसीआरपी की रिपोर्ट) के जरिए हमला करके जनता में अविश्वास पैदा करने की कोशिश की जाती है। परंतु भारत में सबसे दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि विपक्ष और भारत विरोधी तत्व इनके समर्थन में खड़े नजर आते हैं।
इसलिए सरसंघचालक ने अपकारी शक्तियों के विनाश के लिए नागपुर में संघ के 100 वर्षों के यात्रा और भविष्य की दिशा पर चर्चा करते हुए राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता पर जोर दिया। उन्होंने समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि जब हम जाति को याद करते हैं तो विभाजन बढ़ता है। उन्होंने संतों की भूमिका को याद करते हुए कहा कि संतों ने समाज में आत्मबोध जगाने का काम किया है। उन्होंने स्वदेशी, पंच परिवर्तन, नई पीढ़ी में सही-गलत की समझ विकसित करने,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीक के नैतिक उपयोग और पर्यावरण के अनुकूल विकास की आवश्यकता पर बात की। इस बात पर बल दिया कि केवल व्यवस्था बदलने से कुछ नहीं होगा, बल्कि व्यक्ति की आदत और आचरण में बदलाव से ही समाज और व्यवस्था में वास्तविक परिवर्तन आ सकता है।
सरसंघचालक मोहन भागवत ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर जोर देते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शनों का उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए और इसके लिए हर हाल में संवैधानिक सीमाओं और नागरिक शिष्टाचार का पालन किया जाना चाहिए। अंत में उन्होंने विश्वास जताया कि भारत का सामाजिक ताना-बाना मजबूत है और भारत में इस तरह के 'रिजीम चेंज' के प्रयास कभी सफल नहीं होंगे।
( लेखक, इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत उपाध्यक्ष हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

