हिंदू होने का मर्म है विविधता में एकता और आत्मभूतेषु भाव
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत एक देश होने के साथ ही एक चेतना है, एक संस्कार है, एक जीवन दृष्टि है। यह वह भूमि है जहां हजारों वर्षों से मानवता को जीने की कला सिखाई गई, जहां विविधता को शक्ति के रूप में देखा गया और जहां अंत:चेतना को ही एकता के लिए समाज की आधारशिला बनाया गया। इसी भारत के स्व को स्वर देते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आज जो कहा है, वह हम सभी के लिए गहन रूप से विचारणीय है। वस्तुत: ये भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाला वैचारिक उद्घोष है। जिसमें कि उनके शब्द हर हिंदू, हर सनातनी और हर भारतवासी के भीतर यह भाव जगाते हैं कि इस राष्ट्र का चरित्र हमारे आचरण से बनता है और इसकी जिम्मेदारी हमारे कंधों पर है।
डॉ. भागवत का यह कथन है कि भारत एक भौगोलिक इकाई से ऊपर एक चरित्र है, जोकि भारतीय सभ्यता के मूल स्वभाव को रेखांकित करता है। भारत की पहचान उसकी सीमाओं से अधिक उसके संस्कारों से है। यदि भारत में कुछ अच्छा होता है तो उसका श्रेय भी हिंदू समाज को जाता है और यदि कुछ गलत होता है तो उत्तरदायित्व भी उसी पर आता है। कहना होगा कि भागवत जी का ये कथन किसी श्रेष्ठता का दावा नहीं है, वस्तुत: एक गहन दायित्वबोध है। यह हमें स्मरण कराता है कि बहुसंख्यक होना अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है।
हिंदू समाज की परंपरा मूलतः समावेशी रही है। यहां कभी एकरूपता थोपने का प्रयास नहीं हुआ। यहां विचार, पूजा पद्धति, जीवन शैली, भाषा और खानपान की असंख्य धाराएं साथ-साथ बहती रहीं और ये सतत है। किसी ने शंकर को पूजा, किसी ने राम को, किसी ने शक्ति को, किसी ने निराकार को, फिर भी समाज बिखरा नहीं। यही कारण है कि भारत में शैव, वैष्णव, शाक्त, बौद्ध, जैन और सिख परंपराएं टकराव नहीं, सह-अस्तित्व का उदाहरण बनीं। डॉ. भागवत जब कहते हैं कि हिंदू समाज ने विविधता को कभी संघर्ष का कारण नहीं बनने दिया, तो वे इतिहास के सत्य को दोहराते हैं। सदियों के आक्रमण, शोषण और सांस्कृतिक आघातों के बावजूद भारत की मूल चेतना सुरक्षित रही क्योंकि उसका आधार समावेश है।
भारत की विविधता में एकता सिर्फ आदर्श वाक्य नहीं है, यह भारत का चरित्र और सामाजिक यथार्थ है। 2011 की जनगणना बताती है कि देश में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं और हजारों बोलियां जीवित हैं। समाजशास्त्रीय अध्ययनों के अनुसार चार हजार से अधिक जाति और उपजातीय समूह भारत में मौजूद हैं, फिर भी एक सांस्कृतिक सूत्र पूरे समाज को बांधे रखता है। दीपावली, होली, रामनवमी, मकर संक्रांति जैसे पर्व किसी एक वर्ग के नहीं, पूरे समाज के उत्सव बन जाते हैं। यही वह भारत है, जहां भिन्नता के बावजूद एकत्व का अनुभव होता है। वर्ष 2021 के प्यू रिसर्च अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि भले ही सामाजिक संरचनाओं में अभी चुनौतियां हैं, लेकिन समरसता और समानता की दिशा में प्रयास निरंतर बढ़ रहे हैं।
कहना होगा कि इस समावेशिता की जड़ें भारतीय दर्शन में हैं। उपनिषदों का आत्मभूतेषु भाव, अर्थात सभी प्राणियों में एक ही आत्मा का दर्शन, हिंदू चिंतन की रीढ़ है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म और अहं ब्रह्मास्मि जैसे महावाक्य व्यक्ति को धार्मिक के साथ ही उसे सामाजिक रूप से भी उदात्त बनाते हैं। जब मनुष्य सभी में स्वयं को देखने लगता है, तब भेदभाव स्वतः समाप्त होने लगता है। डॉ. भागवत का जाति, भाषा और व्यवसाय से ऊपर उठकर मित्रता करने का आह्वान इसी दर्शन का सामाजिक रूपांतरण है। यह वास्वत में व्यवहारिक सामाजिक सुधार का मार्ग है।
यहां यह भी बताना होगा कि हिंदूत्व का यह दर्शन अध्यात्म तक सीमित नहीं है। यह शासन, समाज और अर्थव्यवस्था तक बहुत विस्तृत है। इसी क्रम में डॉ. भागवत का आत्मनिर्भरता पर जोर अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय उत्पादों के उपयोग का आग्रह आर्थिकता के साथ ही सांस्कृतिक स्वाभिमान से जुड़ा विषय है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत मार्च 2025 तक 1.76 लाख करोड़ रुपये का निवेश, 16.5 लाख करोड़ रुपये का उत्पादन और बिक्री तथा लगभग 12 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की ठोस प्रक्रिया है।
उन्होंने वैश्वीकरण को वैश्विक बाजार के बजाय वैश्विक परिवार के रूप में देखने की बात कही है। यह वही दृष्टि है, जिसने भारत को वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश दिया। भारत सदियों से अपने नागरिकों को सशक्त बनाकर विश्व के साथ संतुलित संबंध बनाने वाला राष्ट्र रहता आया है। आत्मनिर्भरता का अर्थ आत्मबल के साथ विश्व से जुड़ना है।
हिंदू समाज में एकता के संदर्भ में डॉ. भागवत का संदेश स्पष्ट और दृढ़ है। यह समाज के प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। संघ पहल करेगा, मार्गदर्शन देगा, किंतु नेतृत्व समाज को स्वयं करना होगा।भगवान राम का उदाहरण यह सिखाता है कि संवाद, धैर्य और मर्यादा भारतीय परंपरा का मूल है, किंतु जब अन्याय सीमा लांघ जाए, तब दृढ़ता भी आवश्यक है। यह संतुलन ही भारतीय चरित्र की पहचान है।
आज जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दैनिक शाखा, साप्ताहिक मिलन और मासिक मंडली को मिलाकर संख्या देढ़ लाख से अधिक हो चुकी है और सामाजिक समरसता के प्रयास व्यापक रूप ले रहे हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि समाज जाग रहा है। जातिगत भेद, आंतरिक विभाजन और हीनभावना को त्यागकर संगठित होना ही भारत की शक्ति का मूल है। संगठित समाज ही सांस्कृतिक निरंतरता, सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा की गारंटी बनता है।
अंततः भारत के लिए हिंदू होने का अर्थ किसी संकीर्ण पहचान में सीमित होना नहीं है। यह एक जीवन दृष्टि है, जो विविधता को सम्मान देती है, आत्मभूतेषु भाव से सभी में एकात्मता देखती है और आत्मनिर्भरता के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त बनाती है। वस्तुत: आज डॉ. मोहन भागवत के कथन इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमें स्मरण कराते हैं कि भारत का भविष्य किसी और के हाथ में नहीं, हमारे अपने आचरण में निहित है। यदि हिंदू समाज अच्छे, दृढ़ और ईमानदार बनने का संकल्प लेता है तो भारत का चरित्र स्वतः उज्ज्वल होगा। यही हिंदूत्व का मर्म है, यही सनातन का संदेश है और यही भारत का गौरव भी है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

