home page

ज्ञान, कौशल, चरित्र का स्वदेशी मॉडल और 2047 का भारत

 | 
ज्ञान, कौशल, चरित्र का स्वदेशी मॉडल और 2047 का भारत


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भगवन्! मनुष्य के लिए कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है? बालक नचिकेता ने यमराज से प्रश्न किया। उत्तर मिला— श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः...

कठोपनिषद का यह संदेश बताता है कि मनुष्य के सामने सदैव दो मार्ग रहते हैं; श्रेय और प्रेय। श्रेय दीर्घकालिक कल्याण का मार्ग है, जबकि प्रेय तात्कालिक सुख-सुविधा का आकर्षण। विवेकशील व्यक्ति श्रेय का चयन करता है। आज इक्कीसवीं सदी का भारत भी इसी निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। प्रश्न यह नहीं कि भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि उस विकास की चेतना क्या होगी? क्या विकास का आधार आर्थिक उपलब्धियाँ होंगी, अथवा ज्ञान, नैतिकता, संस्कृति, विज्ञान और मानवीय मूल्यों का संतुलित समन्वय?

इसी संदर्भ में अभी हाल ही में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई), मुंबई में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास एवं मुंबई विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में “विकसित भारत हेतु शिक्षा” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है, ज्ञान, कौशल और चरित्र तीनों का समन्वय ही शिक्षा है। विकसित भारत की कल्पना में हमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, सभी के विकास के लिए विद्यार्थी तैयार करना है। यह भारतीय शिक्षा-दर्शन को वर्तमान समय के अनुरूप पुनर्स्थापित करने का आह्वान है।

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ज्ञान-परंपरा

विश्व के अनेक देशों ने औद्योगिक क्रांति, तकनीकी नवाचार या प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर विकास किया। भारत की विशिष्टता उसकी ज्ञान-परंपरा रही है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालय शिक्षा के केंद्र होने के साथ सभ्यता निर्माण के भी केंद्र थे। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति और समाज, दोनों का निर्माण रहा है। तैत्तिरीय उपनिषद का सत्यं वद, धर्मं चर तथा स्वामी विवेकानंद का चरित्र निर्माण करने वाली शिक्षा का विचार इसी परंपरा का विस्तार है। दत्तात्रेय होसबाले भी शिक्षा को राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला मानते हैं।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कम्प्यूटिंग, जैव-प्रौद्योगिकी और स्वचालन का युग है। ऐसे समय में कौशल अनिवार्य है। फिर भी कौशल तभी सार्थक है जब उसे ज्ञान दिशा दे और चरित्र उद्देश्य प्रदान करे। इतिहास बताता है कि विज्ञान ने परमाणु ऊर्जा जैसी उपयोगी शक्ति भी दी और परमाणु बम जैसा विनाशकारी अस्त्र भी। अंतर उद्देश्य और चरित्र का था। विकसित भारत का अर्थ ऐसे नागरिक तैयार करना है जो दक्ष होने के साथ उत्तरदायी और संवेदनशील भी हों।

चार पुरुषार्थ और भारतीय शिक्षा-दृष्टि

दत्तात्रेय होसबाले ने शिक्षा को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से जोड़कर भारतीय चिंतन की समग्रता को सामने रखा है। धर्म का अर्थ कर्तव्य और नैतिकता है, अर्थ आर्थिक समृद्धि का आधार, काम सृजनात्मक आकांक्षाओं का प्रतीक तथा मोक्ष आत्मबोध और आंतरिक स्वतंत्रता का स्वरूप। यदि शिक्षा आर्थिक सफलता तक सीमित रह जाए और नैतिक चेतना कमजोर हो जाए तो सामाजिक संतुलन भी प्रभावित होता है। भारतीय शिक्षा-दर्शन जीवन के प्रत्येक आयाम में संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

राधाकृष्णन आयोग का उल्लेख करते हुए दत्तात्रेय होसबाले कहते हैं, हम एक फैक्ट्री नहीं बना रहे हैं, हम एक सभ्यता बना रहे हैं। यही शिक्षा का वास्तविक स्वरूप है। फैक्ट्री वस्तुओं का उत्पादन करती है, शिक्षा व्यक्तित्व का निर्माण करती है। आज शिक्षा की सफलता का मूल्यांकन प्रायः नौकरी, वेतन और परीक्षा परिणामों से किया जाता है। इनका महत्व है, फिर भी शिक्षा का व्यापक लक्ष्य दूरदर्शी, जिम्मेदार और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक तैयार करना है। किसी भी विकसित राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके ऐसे ही नागरिक होते हैं।

संवाद और जिज्ञासा की संस्कृति

होसबाले ने समाज में बढ़ती संवादहीनता पर भी चिंता व्यक्त की है। सूचना के इस युग में उत्तर सहज उपलब्ध हैं, प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ती दिखाई देती है। भारतीय ज्ञान-परंपरा का आधार संवाद रहा है। गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ, उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद तथा नचिकेता और यमराज का प्रश्नोत्तर इस बात के प्रमाण हैं कि भारत ने शिक्षा को जिज्ञासा, तर्क और विचार-विमर्श का माध्यम माना। भविष्य की शिक्षा व्यवस्था में इसी संवाद संस्कृति का पुनर्जागरण आवश्यक है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की दिशा

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिक विज्ञान के समन्वय की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल है। बहुविषयक शिक्षा, मातृभाषा में अध्ययन, अनुसंधान, नवाचार, कौशल विकास और मूल्य-आधारित शिक्षण उसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा हैं। भारत यदि वैश्विक ज्ञान-अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करना चाहता है तो उसे तकनीक का उपयोग करने वाले समाज से आगे बढ़कर ज्ञान का सृजन करने वाला राष्ट्र बनना होगा। प्रयोगशालाओं के साथ जीवन-मूल्यों का विकास भी उतना ही आवश्यक है।

दत्तात्रेय होसबाले का यह कथन कि विकसित भारत-2047 एक पड़ाव है, यात्रा का अंत नहीं, भारतीय चिंतन की मूल भावना को व्यक्त करता है। महर्षि अरविन्द ने भारत के भविष्य को मानव चेतना के उच्चतर विकास से जोड़ा था, जबकि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने राष्ट्र की महानता का आधार उसके नागरिकों के चरित्र को माना। इसी दृष्टि से विकसित भारत का अर्थ पाँच या दस ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था भर नहीं है। वास्तविक विकास उस समाज की पहचान बनेगा जहाँ विज्ञान और संस्कृति साथ चलें, समृद्धि के साथ संवेदना बनी रहे तथा प्रगति का प्रत्येक आयाम नैतिक मूल्यों से जुड़ा हो।

भारत को श्रेष्ठ इंजीनियर, चिकित्सक, वैज्ञानिक और उद्यमियों के साथ चरित्रवान नागरिकों की भी आवश्यकता है। शिक्षा तभी अपने उद्देश्य को प्राप्त करेगी जब वह मस्तिष्क को ज्ञान, हाथों को कौशल और अंतःकरण को चरित्र प्रदान करेगी। कठोपनिषद का 'श्रेय', स्वामी विवेकानंद की 'मैन-मेकिंग एजुकेशन', राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की समग्र दृष्टि और दत्तात्रेय होसबाले का ज्ञान, कौशल और चरित्र एक ही राष्ट्रीय धारा के विविध आयाम हैं। 2047 के विकसित भारत का वास्तविक सूत्र भी यही है।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी