राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बंगाल चुनाव
-इंदुशेखर तत्पुरुष
कल कार्ल मार्क्स का जन्मदिवस था और इधर भारत में उनसे प्रेरित राजनैतिक दल का बोरिया–बिस्तर एकमात्र बचे हुए प्रांत से भी उठ गया। दूसरी ओर भारत के सभी राजनैतिक दल (भाजपा को छोड़कर) जिस सामाजिक संगठन आरएसएस का विरोध करते रहे हैं, या कभी न कभी उसके विरुद्ध खड़े हुए, वह आज देशभर में अपना जन्म शताब्दी वर्ष मना रहा है। उसकी प्रेरणा से राजनीति में खड़े हुए दल भाजपा ने देश के कोने–कोने में अपनी पैठ बनाई है। बंगाल विजय तो कल का ही उदाहरण है। वस्तुत: इसकी वास्तविकता को जानने के लिए हमें एक सदी पूर्व के भारत में जाना होगा।
सन् 1925 में भारत में दो संगठनों की नींव रखी गई। एक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसका आरम्भ एक मेडिकल शिक्षा प्राप्त किये युवक ने नागपुर में 15–20 स्थानीय साथियों को लेकर किया। दूसरा संगठन संसारभर में विख्यात हो चुकी कम्युनिस्ट पार्टी का था, जिसका गठन कानपुर में देश के विभिन्न प्रांतों से एकत्र हुए सैकड़ों प्रबुद्ध लोगों ने किया। पार्टी के प्रेरणापुंज कार्ल मार्क्स की गणना विश्व के महानतम विचारकों में होती थी। सन् 1917 की रूस की क्रांति की कीर्ति के कारण कम्यूनिस्ट पार्टी आरंभ में ही देशभर में चर्चित हो गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तो रूस, चीन जैसी अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों का समर्थन भी उन्हें मिलने लगा था। देश के सभी प्रमुख संस्थानों पर साम्यवाद और समाजवाद की गहरी छाप थी। जबकि संघ को आरंभिक वर्षों में नागपुर से बाहर कोई नहीं जानता था। देश स्वाधीन होते ही उस पर न केवल प्रतिबंध लगा, सरकारों द्वारा संघ के कार्यकर्ताओं को निराधार लांछित और प्रताड़ित भी किया गया। आगे फिर प्रतिबंध लगाया गया। सबकी उपेक्षा, उपहास और तिरस्कार झेलते हुए भी संघ चुपचाप अपना कार्य करता रहा।
आज एक शताब्दी बाद हम देखते हैं कि सारी दुनिया को बदलने का दावा करने वाले, देश में क्रांति करके सत्ता प्राप्ति का स्वप्न देखने वाले कम्युनिस्ट एक कोने में सिमटकर रह गए। जबकि आज देश का ऐसा कोई कोना नहीं, जहां संघ का वर्चस्व नहीं, संघ की उपस्थिति नहीं। विचारणीय प्रश्न है कि यह जमीन–आसमान का अंतर कैसे संभव हुआ? संघ के निरंतर उत्कर्ष और उसके समान्तर कम्युनिज्म के निरंतर अपकर्ष के मूलभूत कारण क्या रहे? इस पर गहरा मंथन करना चाहिए।
वास्तव में किसी भी संगठन की ऐसी असाधारण उपलब्धि कार्यकर्ताओं की निस्वार्थ कर्मनिष्ठा, समर्पण और त्याग के बिना संभव नहीं। यह सभागारों और विश्वविद्यालयों में बैठकर सिद्धांत बघारने से नहीं समाज में प्रत्यक्ष काम करने से हासिल होती है। कोरी बौद्धिकता झाड़ने से वैचारिक हलचल तो हो सकती है, किन्तु व्यक्ति का मन नहीं जुड़ता। वह जुड़ता है उनके बीच जाकर प्रत्यक्ष कार्य करने से, प्रेमपूर्ण व्यवहार से। व्यक्तियों के संगठन आंदोलकारी नारों से नहीं, नियमित संपर्क और सेवा कार्यों से निर्मित होते हैं।
मत भूलिए कि संघ ही एकमात्र ऐसा संगठन है जहाँ हजारों उच्च शिक्षा प्राप्त नवयुवक अपने सुखमय जीवन को ठोकर मारकर संघ के प्रचारक बन गए। आजीवन अविवाहित रहने का भीष्म संकल्प उन्होंने इसलिए लिया कि उनके जीवन का एकमात्र ध्येय संघ कार्य करना था। लाखों गृहस्थ प्रतिदिन कुछ न कुछ समय संगठन के लिए निकालते हैं।
इसलिए संघ सैद्धांतिक तर्क–वितर्क एवं शास्त्रार्थ के पचड़े में नहीं पड़ा। बनावटी बौद्धिक वातावरण बनाने में शक्ति खर्च नहीं करता। दिखावटी प्रचार के फंदे में नहीं फँसता। उसका स्पष्ट ध्येय है व्यक्ति को संस्कारित करना, समाज में सज्जनों की संगठित शक्ति खड़ा करना और समाज के बीच में प्रत्यक्ष उपस्थित होकर क्षमता अनुसार कार्य करना। उसके असधारण कार्यविस्तार एवं व्यापक जनस्वीकृति का यही एकमात्र आधार था।
इतिहास साक्षी है कि जिन्होंने तथाकथित वैचारिक क्रांतिकारी पैदा किए वे आपस में ही मार–काट में लग गए। सत्ता प्रतिस्पर्धा में पड़ गए। स्वयं को प्रतिष्ठापित करने में ही उनकी शक्ति चुक गई। किन्तु संघ ने व्यक्ति निर्माण की पाठशालाएं चलाई। व्यक्तियों को गढ़ने और जोड़ने की वे छोटी–छोटी पाठशालाएं आज विश्व का व्यक्ति निर्माण का सबसे बड़ा विश्विद्यालय बन गया।
ध्यान रखिए संघ हिन्दू संगठन है किन्तु संघ का कार्य केवल हिंदुओं के लिए नहीं संपूर्ण समाज के अभ्युदय के लिए है। समाज का अभ्युदय राष्ट्र के अभ्युदय के लिए है। और राष्ट्र का अभ्युदय केवल भारतवर्ष के लिए नहीं संपूर्ण विश्व के अभ्युदय के लिए है। पर यह तभी दिखाई देगा जब आप अपना राजनैतिक चश्मा उतारकर देखेंगे। भाजपा के चश्मे से देखेंगे तो भी नहीं दिखेगा। अपने व्यक्तिगत अथवा समूहगत लाभ–लोभ से ऊपर उठकर देखेंगे तभी दिखेगा।
भाजपा की बंगाल विजय के प्रत्यक्ष पचास कारण गिनाए जा सकते हैं। निस्संदेह भारतीय जनता पार्टी ने प्राणांतक संघर्ष किया हैं, सैकड़ों राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने बलिदान किया है, लाखों लोगों का पसीना बहा है। किन्तु इस विराट परिवर्तन के पीछे संघ के स्वयंसेवकों की सतत साधना को मत भूलिए। आज स्वतंत्रता प्राप्ति के आठ दशक बाद पहली बार बंगाल में भगवा लहराया है, तो निश्चित मानिये कल केरल और तमिलनाडु की बारी है। क्योंकि संघकार्य राजनीति प्रेरित तात्कालिक कार्य नहीं राष्ट्रनीति प्रेरित अनवरत चलने वाला कार्य है, जिसका लक्ष्य सत्ता प्राप्ति नहीं व्यक्ति एवं राष्ट्र निर्माण है।
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं राष्ट्रीय पत्रिका 'साहित्य परिक्रमा' के संपादक हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

