(व्यंग्य) वोटर लिस्ट में 'फर्जी भूत' ढूंढने चले थे, 'एसआईआर' मिलते ही बिफर गए!
- विनय के पाठक
यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे भावुक कर देने वाला विरोधाभास है। एक समय था, जब राहुल गांधी देश के हर मंच से, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में छाती ठोककर कहते थे- वोटर लिस्ट में धांधली हो रही है! देश में लाखों फर्जी वोटर हैं! वोटर लिस्ट में सुधार होना चाहिए, फर्जी नामों को हटाया जाना चाहिए! उस वक्त ऐसा लगता था कि अगर राहुल जी को देश की वोटर लिस्ट साफ करने का जिम्मा मिल जाए, तो वे उसे सर्फ एक्सेल या एरियल या घड़ी डिटर्जेंट पाउडर से धोकर चमका देंगे।
लेकिन साहब, समय बदला, साल 2026 आया और चुनाव आयोग ने उनकी बरसों पुरानी मुराद सुन ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, तथास्तु! हम स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) ला रहे हैं और वोटर लिस्ट की गहरी सफाई करेंगे। आम जनता को लगा कि राहुल जी चुनाव आयोग को मिठाई का डिब्बा भेजेंगे। लेकिन यहीं तो ट्विस्ट आ गया! जैसे ही आयोग ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने और सुधारने की प्रक्रिया (एसआईआर) शुरू की, राहुल जी को उसमें 'वोट चोरी' का भूत नजर आने लगा।
जो नेता कल तक 'सुधार-सुधार' चिल्ला रहा था, वो आज अचानक दिल्ली की सड़कों पर 'लोकतंत्र बचाओ मार्च' की अगुवाई करते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर जा खड़ा हुआ। अब उनका नया नारा है- ये एसआईआर बंद करो! मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दो! विरोधी समझ नहीं पा रहे हैं कि भाई, जब गंदगी साफ करने की मांग आपने ही की थी, तो जब वैक्यूम क्लीनर चला तो आपको तकलीफ क्यों हो रही है?
राहुल जी की इस राजनीतिक लीला को समझाने के लिए देश के बड़े-बड़े दार्शनिक फेल हो चुके हैं। इस आंदोलन की रणनीति को जब पत्रकारों ने उनसे समझना चाहा तो उन्होंने इसे सीधे अध्यात्म से जोड़ दिया। उन्होंने कहा, यह कोई प्लानिंग नहीं है, यह तो भगवान शिव का तांडव है! यह शिवजी की बारात है, जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है। अब मुख्य चुनाव आयुक्त परेशान हैं कि वे चुनाव आचार संहिता का पालन करवाएं या राहुल जी की इस 'बारात' का स्वागत करने के लिए फूल-मालाएं तैयार रखें!
इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प और हास्यास्पद मोड़ तब आया, जब राहुल गांधी और विपक्षी दिग्गजों की एक भारी-भरकम '11 स्टार वकीलों' की फौज सुप्रीम कोर्ट पहुंची। देश बचाने की इस महा-याचिका पर महीनों की माथापच्ची हुई होगी लेकिन जैसे ही यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के पास पहुंची, वहां के बाबुओं ने इसमें एक-दो नहीं बल्कि पूरे 14 तकनीकी झोल निकाल दिए!
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, देश का भाग्य और लोकतंत्र बदलने चली इस ऐतिहासिक याचिका में 220 रुपये की कोर्ट फीस कम पड़ गई थी! इतना ही नहीं, याचिका में लगी कुछ तस्वीरें इतनी धुंधली थीं कि रजिस्ट्री वाले पहचान ही नहीं पाए कि यह न्याय की गुहार है या किसी कैमरे का तकनीकी फॉल्ट। अब जनता सोच रही है कि जो पूरी कांग्रेस और उनके बड़े-बड़े सिपहसालार सुप्रीम कोर्ट की याचिका का एक चार पन्ने का फॉर्म बिना गलती के नहीं भर पा रहे हैं, वे चुनाव आयोग की करोड़ों नामों वाली डिजिटल वोटर लिस्ट में कमियां कैसे ढूंढ रहे होंगे?
खैर, राहुल जी के इस नए आंदोलन ने एक बात तो साफ कर दी है कि राजनीति में 'सत्य' स्थायी नहीं होता, वह इस बात पर निर्भर करता है कि आप सत्ता में हैं या विपक्ष में। जब तक नाम नहीं कट रहे थे, तब तक फर्जी वोटर समस्या थे। और जब नाम कटने लगे तो वह 'लोकतंत्र पर हमला' हो गया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार भी सोच रहे होंगे कि काश उन्होंने राहुल जी की पुरानी मांग को अनसुना ही रहने दिया होता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक

