स्त्री विमर्श : “मनुस्मृति” पर अज्ञानता या राहुल का झूठ फैलाने का प्रयास
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
राहुल गांधी ने पुणे के एक कार्यक्रम में मनुस्मृति के एक चर्चित श्लोक, ‘न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति’ का उल्लेख करते हुए उसके आधार पर मनुस्मृति की स्त्री-विषयक दृष्टि पर सवाल उठाया। अब असल प्रश्न यह है कि क्या किसी भी प्राचीन ग्रंथ का मूल्यांकन उसके एक अंश को संदर्भ से अलग करके किया जा सकता है? उपलब्ध सामग्री के अध्ययन के आधार पर यही निष्कर्ष निकलता है कि राहुल गांधी की स्त्री विषयक टिप्पणियों में गंभीर वैचारिक दोष है, ऐसे में लगता यही है कि या तो अज्ञानी है या फिर जानबूझकर झूठ बोल कर भारत की नारी शक्ति को भ्रम में डालकर कल्चरल मार्क्सवाद की ओर ढकेल देना चाहते हैं, जिसमें वे मुक्ति के नाम पर अपना शोषण करवाने की टूल किट बन सकें।
वास्तव में मनुस्मृति को समझने के लिए उसके पूरे सामाजिक और विधिक संदर्भ को देखना आवश्यक है। मनुस्मृति में स्त्री के सम्मान, मातृत्व, स्त्रीधन, पारिवारिक उत्तरदायित्व और वैवाहिक निष्ठा को लेकर अनेक स्पष्ट विधान मिलते हैं, इसलिए ‘न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति’ को पूरे ग्रंथ का प्रतिनिधि वाक्य मान लेना एकांगी निष्कर्ष होगा।
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।’ अर्थात जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास माना गया है और जहाँ उनका सम्मान नहीं होता, वहाँ किए गए कर्म निष्फल हो जाते हैं। यह श्लोक स्त्री को परिवार और सामाजिक जीवन की गरिमा के केंद्र में रखता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझने की आवश्यकता है। स्त्री के सम्मान और उसकी सुरक्षा को सामाजिक दायित्व मानना अपने आप में स्त्री-विरोधी दृष्टिकोण नहीं कहा जा सकता।
मनुस्मृति में माता के गौरव को अत्यंत ऊँचा स्थान दिया गया है। दूसरे अध्याय के 145वें श्लोक में माता को पिता से भी अधिक सम्मान का अधिकारी बताया गया है, ‘सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते।’ अर्थात गौरव की दृष्टि से माता का स्थान एक हजार पिताओं से भी ऊपर बताया गया है।
यदि राहुल गांधी मनुस्मृति की स्त्री-दृष्टि पर प्रश्न उठाते हैं तो इस श्लोक सहित उन सभी प्रावधानों पर भी समान रूप से चर्चा होनी चाहिए जो स्त्री को परिवार की प्रतिष्ठा और नैतिक केंद्र मानते हैं। किसी एक कथन को लेकर पूरे ग्रंथ का चरित्र निर्धारित करना उसी प्रकार अधूरा होगा, जैसे किसी आधुनिक संविधान की एक धारा के आधार पर उसके पूरे दर्शन को परिभाषित कर देना।
मनुस्मृति में ‘स्त्रीधन’ की अवधारणा भी उल्लेखनीय है। उपलब्ध सामग्री में अध्याय 9 के श्लोक 194 का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि विवाह और पारिवारिक अवसरों पर स्त्री को प्राप्त धन और आभूषण उसके अधिकार से जुड़े माने गए हैं तथा पुरुष द्वारा उस संपत्ति के अनुचित उपयोग को स्वीकार नहीं किया गया।
यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्त्री की स्थिति पर चर्चा प्राय: ‘स्वतंत्रता’ शब्द की आधुनिक परिभाषा से नहीं की जा सकती। आर्थिक अधिकार, संपत्ति पर नियंत्रण, पारिवारिक सम्मान, सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा, वस्तुत: ये सभी स्त्री की स्थिति के अलग-अलग आयाम हैं। मनुस्मृति की समग्र चर्चा में इन सभी को साथ रखना होगा।
इसी प्रकार विवाह को लेकर मनुस्मृति में पति-पत्नी दोनों के पारस्परिक संतोष और निष्ठा पर बल दिया गया है। ‘सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च’ का भाव यह है कि जिस परिवार में पति पत्नी से और पत्नी पति से संतुष्ट रहती है, वहाँ कल्याण की संभावना रहती है। आज जब परिवार, विवाह और सामाजिक उत्तरदायित्व पर व्यापक बहस हो रही है, तब इस दृष्टि को भी विमर्श का हिस्सा बनाया जा सकता है।
दहेज के प्रश्न पर भी उपलब्ध सामग्री मनुस्मृति के अध्याय 3 के श्लोक 51 का उल्लेख करती है, जहाँ कन्या के विवाह के बदले शुल्क लेने की निंदा की गई है और लोभवश ऐसा करने वाले पिता की आलोचना की गई है। यह तथ्य आज के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन ग्रंथों की सामाजिक व्यवस्थाओं को समझते समय उनके भीतर मौजूद सुधारात्मक और नैतिक निर्देशों को भी देखा जाना चाहिए।
सबसे अधिक गंभीर प्रश्न मनुस्मृति में कथित ‘प्रक्षेपों’ को लेकर है। उपलब्ध सामग्री में यह दावा किया गया है कि वर्तमान में उपलब्ध पाठ में बाद के काल में कुछ अंश जोड़े गए और महर्षि दयानंद सरस्वती जैसे विद्वानों ने कुछ श्लोकों को मूल मनु की शिक्षाओं से असंगत माना। कई भाषा विज्ञ भी यह बता चुके हैं। यही बात राहुल गांधी की टिप्पणी पर भी लागू होती है। यदि वे मनुस्मृति के किसी श्लोक को आधार बनाकर उसकी आलोचना कर रहे हैं, तो उन्हें भी पूरे पाठ, उसके ऐतिहासिक संदर्भ, विभिन्न पाठ-परंपराओं और उसके भीतर मौजूद परस्पर भिन्न कथनों को सामने रखना चाहिए। आलोचना का अधिकार सबको है, लेकिन आलोचना का आधार भी उतना ही गंभीर होना चाहिए, जितना कि गंभीर आरोप उस पर सार्वजनिक रूप से लगाया जा रहा है।
तार्किक रूप से सोचें, जो ग्रंथ एक तरफ नारी को साक्षात लक्ष्मी, पूजनीय और देवताओं के निवास का आधार बताता है, वही ग्रंथ कुछ श्लोकों बाद अचानक स्त्री को प्रताड़ना या अधिकार-हीन कैसे कह सकता है? यह अंतर्विरोध (Contradiction) इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि बाद के समय में स्वार्थी तत्वों और विदेशी षड्यंत्रकारियों द्वारा इसमें मिलावट की गई थी।
अब केंद्र एवं राज्य सरकारों के स्तर पर भी विचार कर लें, क्या हम अपनी स्त्रियों, युवतियों, माताओं को संरक्षण नहीं दे रहे, यदि दे रहे हैं तो क्या यह राहुल गांधी की भाषा में कहें, उन्हें गुलाम बनाना है? फिर क्यों महिला आयोग बनाए हैं? पॉक्सो एक्ट लागू किया है? एक बेटी के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक अनेक योजनाएं, नियम, कानून हैं, जिनके माध्यम से आज भी हम अपने समाज की स्त्री को सम्मान दे रहे हैं, उसके हित एवं रक्षा के लिए यथासंभव प्रयास कर रहे हैं, तब तो हम सब भी राहुल की भाषा में नारी का शोषण कर रहे हैं?
ऐसे में कहना यही होगा कि असली समस्या मनुस्मृति से अधिक उस राजनीतिक शैली की है जिसमें जटिल परंपरागत ग्रंथों को कुछ चुने हुए उद्धरणों में समेटकर बिना पूर्ण अध्ययन किए ही राजनीतिक निष्कर्ष निकाल दिए जाते हैं। राहुल गांधी को यदि मनुस्मृति की आलोचना करनी है तो वे उसके प्रत्येक प्रासंगिक पक्ष पर बहस करें। संस्कृत मूल सामने रखें, संदर्भ समझाएँ, विभिन्न विद्वानों की व्याख्याओं को रखें और फिर निष्कर्ष दें। यही स्वस्थ बौद्धिक परंपरा होगी। अन्यथा एक श्लोक को पूरे ग्रंथ का पर्याय बना देना न तो इतिहास है, न शास्त्रार्थ और न गंभीर राजनीति।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

