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वन्दे मातरम् का अपमान करती कांग्रेस को संघ के कार्य से आपत्ति है

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वन्दे मातरम् का अपमान करती कांग्रेस को संघ के कार्य से आपत्ति है


वन्दे मातरम् का अपमान करती कांग्रेस को संघ के कार्य से आपत्ति है


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

राजनीति में जब अपने सवालों का उत्तर देना कठिन हो जाए, तब अक्सर प्रतिपक्ष कोई ऐसा कोना ढूंढ़ता है जिसे कमजोरी के रूप में अपने राजनीतिक विरोधियों के समक्ष इस्तेमाल किया जा सके। शायद, कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियांक खरगे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर लगातार उठाए जा रहे सवालों को इसी राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। आखिर जिस समय कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व स्वयं वन्दे मातरम् के पूरे गान को लेकर उठे गंभीर सवालों के घेरे में है, उसी समय अचानक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, संपत्तियों और वित्तीय पारदर्शिता पर सवालों की बौछार क्यों शुरू हो गई?

यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वन्दे मातरम् कोई सामान्य गीत नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना, राष्ट्रभाव और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा है। ऐसे में जब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े लोगों के आचरण को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं, तब अपेक्षा यह थी कि कांग्रेस अपने भीतर झांकती, आत्ममंथन करती और अपने नेताओं के आचरण पर स्वयं से प्रश्न करती और अपने आचरण में सुधार करती, किंतु उसके बजाय वह संघ को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।

इसमें भी इस पूरे प्रसंग का सबसे रोचक पक्ष यह है कि कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ताओं ने अपने शीर्ष नेतृत्व से बिल्कुल अलग तस्वीर प्रस्तुत की है। जब वन्दे मातरम् का गान हो रहा था, तब अनेक कार्यकर्ता सावधान मुद्रा में खड़े होकर पूरे गान का सम्मान करते दिखाई दिए। यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है। शायद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अपने ही कार्यकर्ताओं से सीखने की आवश्यकता है कि राष्ट्र आराधना किसी राजनीतिक योजना का विषय न होकर यह तो करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का प्रश्न है, जिसका सम्मान हर हाल में होना ही चाहिए।

अब आते हैं प्रियांक खरगे के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर उठाए गए सवालों पर। खरगे पूछ रहे हैं कि संघ किस कानून के तहत अस्तित्व में है? उसका पंजीकरण कहां है? उसकी संपत्तियों का स्वामित्व किसके पास है? बैंक खाते कैसे संचालित होते हैं? ‘गुरु दक्षिणा’ के रूप में मिलने वाले योगदान का कानूनी ढांचा क्या है? निश्चय ही किसी भी संगठन की कानूनी और वित्तीय व्यवस्था पर प्रश्न पूछना लोकतंत्र में अपराध नहीं है। मगर प्रश्न पूछने वाले की जिम्मेदारी यह भी है कि वह जिस कानून की दुहाई दे रहा है, पहले उसका अध्ययन करे।

वस्तुत: यहीं सबसे बड़ा आश्चर्य पैदा होता है। प्रियांक खरगे कर्नाटक के गृहमंत्री हैं। उनसे अपेक्षा सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता की कोई नहीं करता, इसलिए यह जानना उनका दायित्व है कि भारत में प्रत्येक सामाजिक या स्वयंसेवी समूह के लिए एक ही प्रकार का अनिवार्य पंजीकरण ढांचा नहीं है। संघ समर्थकों का स्पष्ट तर्क है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को एक स्वैच्छिक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में संचालित करता है और उसके लिए किसी एक विशेष केंद्रीय पंजीकरण प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता नहीं है। अत: अच्छा होता कि वे अपनी बात को ‘संघ पंजीकृत है या नहीं’ से आगे बढ़कर यह जानने का प्रयास करते कि आखिर इस विषय में कानून क्या कहता है।

दूसरी ओर सच यही है कि संघ को समझना हो तो उसके कागज से पहले उसके कार्य को देखें। वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जिस संगठन की स्थापना की थी, उसका मूल आधार व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन रहता आया है। शाखा संघ के कार्य का बाहरी रूप है, उसके पीछे अनुशासन, आत्मसंयम, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रभाव की अवधारणा है। स्वयंसेवक प्रतिदिन अपने व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए काम करने की मानसिकता विकसित करने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि संघ का वास्तविक प्रभाव उसके कार्यालयों या दस्तावेजों के आगे स्वयंसेवकों की सामाजिक उपस्थिति में दिखाई देता है।

जब ओडिशा में 1999 का विनाशकारी चक्रवात आया, जब 2001 में गुजरात भूकंप ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया या जब कोरोना महामारी ने पूरे देश को संकट में डाल दिया, तब स्वयंसेवक राहत कार्यों में दिखाई दिए। भोजन, दवाइयां, रक्त, राहत सामग्री और जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाने से लेकर अंतिम संस्कार तक अनेक सेवा कार्यों में स्वयंसेवकों ने काम किया और आज भी वे निरंतर देशभर में सेवा कार्य कर रहे हैं। तब किसी पीड़ित ने यह नहीं पूछा कि स्वयंसेवक के पास कौन-सा पंजीकरण प्रमाण-पत्र है। वस्तुत: संघ की राष्ट्रसेवा उसके व्यापक वैचारिक परिवार से जुड़े संगठन जोकि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और जनजातीय क्षेत्रों में लंबे समय से काम कर रहे हैं में देखी जा सकती है।

फिर प्रश्न उठता है, क्या किसी संगठन के सामाजिक योगदान का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर होना चाहिए कि उसके पास कौन-सा सरकारी प्रमाण-पत्र है? यदि संघ के वित्तीय ढांचे पर कोई ठोस कानूनी प्रश्न है तो उसे कानून के समक्ष रखा जाना चाहिए। यदि किसी संपत्ति पर विवाद है तो उसके दस्तावेज सामने आने चाहिए। किंतु सिर्फ इसलिए कि संघ एक विशाल सामाजिक प्रभाव वाला संगठन है, उसके अस्तित्व को संदेह के घेरे में खड़ा कर उसके प्रति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर किया जाए, यह कहीं से भी नैतिकता नहीं है, जिसकी दुहाई (नैतिकता) आजकल कांग्रेस अक्सर देती हुई दिखाई देती है।

संघ की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका हो या 1962 और 1965 के युद्धों के दौरान स्वयंसेवकों की भूमिका, 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में स्वयंसेवकों की भागीदारी जैसे प्रसंग संघ समर्थक आज भी सामने रखते हैं। जिसके बाद इतना तो स्पष्ट है ही कि संघ को भारत के सार्वजनिक जीवन से मिटा देने की कोशिश न तो ऐतिहासिक रूप से संभव है और न सामाजिक रूप से। लगभग एक शताब्दी में संघ ने स्वयंसेवकों का ऐसा नेटवर्क खड़ा किया है जो देश के गांवों, कस्बों और महानगरों तक फैला हुआ है। इस नेटवर्क की शक्ति किसी सरकारी पद से नहीं आती। यह स्वयं के माध्यम से दिनरात की जानेवाली सेवा से आती है।

ऐसे में प्रियांक खरगे के लिए शायद सबसे जरूरी प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि ‘संघ का पंजीकरण कहां है?’ बल्कि यह होना चाहिए कि क्यों करोड़ों भारतीयों के बीच एक गैर-सरकारी, स्वयंसेवी संगठन लगभग सौ वर्षों तक अपना सामाजिक प्रभाव बनाए रखने में सफल रहा? निश्चित ही इस प्रश्न का उत्तर किसी रजिस्ट्रार के कार्यालय से उन्हें नहीं मिलने वाला है। उत्तर शाखाओं में मिलेगा। स्वयंसेवकों के जीवन में मिलेगा। आपदा के समय किए गए सेवा कार्यों में मिलेगा। दूरदराज के गांवों में चल रहे विद्यालयों में मिलेगा और उन लोगों के अनुभवों में मिलेगा जिन्हें संकट की घड़ी में किसी स्वयंसेवक ने बिना किसी राजनीतिक पहचान पूछे सहायता पहुंचाई।

हां, संघ से सवाल पूछे जाने चाहिए, किंतु वही सवाल हर बड़े सामाजिक और राजनीतिक संगठन से भी पूछे जाने चाहिए। पारदर्शिता की कसौटी समान होनी चाहिए और कांग्रेस के लिए इससे बड़ा आत्ममंथन का अवसर शायद ही कभी आए! आखिर क्यों वह अब तक तुष्टीकरण की राजनीति के चलते वन्देमातरम् का अनादर करती आ रही है? क्यों नहीं उसने अब तक अपने कार्यालयों में संपूर्ण वन्दे मातरम् के गान को अनिवार्य किया है? क्या कांग्रेस अपने शीर्ष नेतृत्व को सजा देगी, जोकि सामने आए तमाम वीडियो में राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् का अपमान करती नजर आ रही है? अच्छा हो यदि वह कुछ सुधार करना चाहती है तो सबसे पहले स्वयं से सुधार की शुरूआत करे।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी