मध्य प्रदेश ने दिखाई राह, अब पूरे देश में लागू हो ऐसी पॉक्सो व्यवस्था
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत में बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध आज सामाजिक संवेदनशीलता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुके हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रत्येक वर्ष पॉक्सो अधिनियम के तहत 60 हजार से अधिक मामले दर्ज हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि औसतन प्रतिदिन लगभग 170 से अधिक बच्चे यौन अपराधों का शिकार बन रहे हैं। इन मामलों में मध्य प्रदेश भी लंबे समय से उन राज्यों में शामिल रहा है, जहां पॉक्सो के प्रकरणों की संख्या अधिक दर्ज होती रही है। यह स्थिति चिंता का विषय अवश्य है, किंतु इससे भी अधिक चिंता इस बात की रही है कि अपराध दर्ज होने के बाद पीड़ित बच्चे और उसका परिवार न्याय की पूरी प्रक्रिया में लगभग अकेले पड़ जाते हैं।
यही वह खाली स्थान है, जिसे भरने का प्रयास मध्य प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा आज किया गया है। आयोग की अध्यक्ष डॉ. निवेदिता शर्मा की पहल पर तैयार की गई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) और उस पर पुलिस मुख्यालय की त्वरित कार्रवाई सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय तक सीमित न होकर यह संदेश है कि अब न्याय का केंद्र पूरी तरह से पीड़ित बच्चा है, हालांकि वह पहले भी केंद्र में ही रहता आया है, पर इसके बाद भी उसे जो न्याय मिलने में देरी हो रही थी, यह नई व्यवस्था उसे उससे पूरी तरह से राहत दिखाती है और यही सोच इस पहल को राष्ट्रीय स्तर पर अनुकरणीय बनाती है।
वस्तुत: पॉक्सो मामलों की वास्तविक पीड़ा एफआईआर दर्ज होने के बाद शुरू होती है। अधिकांश परिवारों को यह जानकारी ही नहीं होती कि आगे क्या होगा? पुलिस जांच, मेडिकल परीक्षण, न्यायालय में बयान, बार-बार पूछताछ, सामाजिक बदनामी का भय, स्कूल छोड़ने की नौबत, रिश्तेदारों और पड़ोसियों का दबाव तथा कई मामलों में आरोपित पक्ष की धमकियां बच्चे और परिवार दोनों को मानसिक रूप से तोड़ देती हैं।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) और विभिन्न बाल अधिकार संगठनों की रिपोर्टें लगातार यह संकेत देती रही हैं कि बड़ी संख्या में पीड़ित बच्चों को पर्याप्त मनोसामाजिक परामर्श, कानूनी मार्गदर्शन और पुनर्वास सहायता समय पर नहीं मिल पाती। यही कारण है कि अनेक मामलों में परिवार मुकदमे की प्रक्रिया से ही टूटने लगता है।
इसका कारण भी यह है जो देश की अदालतों में भी पॉक्सो के हजारों मामले लंबित हैं। इसका अर्थ है कि अनेक बच्चों को वर्षों तक न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बने रहना पड़ता है। इतने लंबे समय तक यदि कोई संस्थागत सहयोग उपलब्ध न हो, तो मानसिक आघात और गहरा हो सकता है। कानून अपराधी को सजा दिला सकता है, लेकिन बच्चे के मन से भय तभी निकलता है, जब पूरी व्यवस्था उसके साथ खड़ी दिखाई दे। वास्तव में मध्य प्रदेश की नई एसओपी इसी दृष्टिकोण को व्यवहार में उतारती है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक पात्र मामले में 'सपोर्ट पर्सन' की नियुक्ति सुनिश्चित की जाएगी। यह व्यवस्था पॉक्सो अधिनियम और उसके नियमों में पहले से विद्यमान थी, किंतु उसका समान रूप से पालन नहीं हो पा रहा था। अब पुलिस मुख्यालय ने सभी पुलिस आयुक्तों, जिला पुलिस अधीक्षकों और विशेष किशोर पुलिस इकाइयों को निर्देश दिए हैं कि एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर बाल कल्याण समिति को सूचना भेजना अनिवार्य होगा, ताकि समय रहते सपोर्ट पर्सन नियुक्त किया जा सके।
यही वह बिंदु है, जो इस पहल को सामान्य प्रशासनिक आदेश से अलग बनाता है। अपराध के बाद शुरुआती 24 घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इसी समय बच्चे को मनोसामाजिक सहयोग, कानूनी सलाह और संस्थागत संरक्षण मिल जाए, तो वह स्वयं को अकेला महसूस नहीं करता। सपोर्ट पर्सन बच्चे और उसके परिवार को पूरी न्यायिक प्रक्रिया समझाता है, विभिन्न विभागों से समन्वय स्थापित करता है, पुनर्वास में सहायता करता है और यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे की गरिमा और सुरक्षा हर स्तर पर बनी रहे।
मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय का यह निर्णय इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि उसने आयोग की एसओपी को सिर्फ सलाह के रूप में नहीं छोड़ा, बल्कि उसे प्रशासनिक दायित्व में बदल दिया। केस डायरी में सूचना भेजने की प्रविष्टि, एसपी कार्यालय स्तर पर निगरानी और समयबद्ध अनुपालन की व्यवस्था पूरी प्रक्रिया को जवाबदेह बनाती है। यही वह संस्थागत अनुशासन है, जिसकी कमी अनेक राज्यों में अभी भी महसूस की जाती रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि देश के अन्य राज्य भी इस मॉडल का गंभीर अध्ययन करें। पॉक्सो अधिनियम पूरे देश में समान रूप से लागू है, इसलिए पीड़ित बच्चे को मिलने वाला संस्थागत सहयोग भी समान होना चाहिए। यह स्थिति उचित नहीं कही जा सकती कि किसी राज्य में बच्चे को तत्काल सहायता मिल जाए और दूसरे राज्य में वही बच्चा पूरी प्रक्रिया अकेले झेले।
यदि प्रत्येक राज्य बाल अधिकार आयोग ऐसी एसओपी तैयार करे, पुलिस मुख्यालय 24 घंटे की अनिवार्य सूचना व्यवस्था लागू करे, बाल कल्याण समितियों को सक्रिय भूमिका दी जाए और प्रत्येक पात्र मामले में सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए, तो देश में बाल संरक्षण व्यवस्था की गुणवत्ता में व्यापक परिवर्तन आ सकता है। इससे न्यायालयों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि साक्ष्य, गवाही और पुनर्वास की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित होगी।
यह भी समझना होगा कि पॉक्सो मामलों में सफलता का पैमाना सिर्फ दोषसिद्धि की दर नहीं हो सकती। वास्तविक सफलता तब होगी, जब पीड़ित बच्चा न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी सामान्य जीवन में आत्मविश्वास के साथ लौट सके। इसके लिए मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक पुनर्वास और संस्थागत सहयोग उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी कानूनी कार्रवाई।
मध्य प्रदेश ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है। यहां आज बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पहल और पुलिस मुख्यालय की त्वरित कार्रवाई यह दर्शाती है कि यदि विभिन्न संस्थाएं समन्वित रूप से कार्य करें तो बाल संरक्षण कानूनों का प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है। यह पहल बताती है कि संवेदनशील शासन सिर्फ कानून बनाने से नहीं बनता है, इसके लिए कानून को प्रभावी ढंग से लागू कर स्थापित होना होता है, इसलिए आज आवश्यकता यहां मध्य प्रदेश के इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने की है।
वस्तुत: हर वर्ष 60 हजार से अधिक पॉक्सो मामलों वाले देश में यह सुनिश्चित करना समय की मांग है कि कोई भी बच्चा एफआईआर दर्ज होने के बाद स्वयं को व्यवस्था के बीच असहाय न पाए। यदि मध्य प्रदेश की तरह हर राज्य पुलिस, बाल कल्याण समिति, बाल संरक्षण इकाई और विधिक सेवा प्राधिकरण को एक समन्वित तंत्र में जोड़ दे, तो यह भारतीय बाल संरक्षण व्यवस्था में सबसे बड़ा संरचनात्मक सुधार सिद्ध हो सकता है।
यहां यह भी सभी को गंभीरतापूर्वक समझना होगा कि पॉक्सो पीड़ित बच्चों को न्याय सिर्फ न्यायालय से नहीं मिलता है, इसके लिए संवेदनशील व्यवस्था का होना बेहद आवश्यक है। मध्य प्रदेश ने इसकी शुरुआत कर दी है। अब देश के शेष राज्यों की बारी है।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

