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मोदी मन की बात : सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम से ‘फास्ट ब्रीडर’ तक भारत की निर्णायक छलांग

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मोदी मन की बात : सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम से ‘फास्ट ब्रीडर’ तक भारत की निर्णायक छलांग


-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दुनिया इस समय अस्थिरता के ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां ऊर्जा वैश्विक शक्ति संतुलन का आधार बन चुकी है। ईरान में जारी युद्ध और उसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। महंगाई की मार हर देश झेल रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं, लेकिन इसी उथल-पुथल के बीच भारत ने एक ऐसा रास्ता चुना है, जो आने वाले दशकों में उसे ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और सशक्त राष्ट्र बना सकता है। यह रास्ता है सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम और विशेष रूप से फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तकनीक का।

रविवार को प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 133वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में भारत की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए विज्ञान और तकनीक की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित किया। उन्होंने कहा- “साथियो, भारत ने विज्ञान को हमेशा देश की प्रगति से जोड़कर देखा है। इसी सोच के साथ हमारे वैज्ञानिक सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके प्रयासों से यह कार्यक्रम राष्ट्र निर्माण में अहम् योगदान दे रहा है। इससे हमारी इंडस्ट्रियल ग्रोथ को, एनर्जी सेक्टर को, हेल्थकेयर सेक्टर को बहुत लाभ हुआ है। खेती किसानी से लेकर आधुनिक इनोवेटर्स को भी भारत के सिविल न्यूक्लियर प्रोग्राम ने बहुत मदद की है।”

प्रधानमंत्री का यह कथन वास्तव में उस व्यापक परिवर्तन की झलक है, जो भारत के वैज्ञानिक प्रयासों के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। परमाणु ऊर्जा अब बिजली उत्पादन से आगे कृषि में उत्पादकता बढ़ाने, चिकित्सा में कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज और उद्योगों में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादन के लिए भी अहम भूमिका निभा रही है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि का उल्लेख किया, जिसने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान दिलाया है।

उन्होंने कहा- “कुछ ही दिन पहले, हमारे न्यूक्लियर साइंटिस्ट ने एक और बड़ी उपलब्धि से भारत का गौरव बढ़ाया है। तमिलनाडु के कलपक्कम में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने क्रिटिकलिटी हासिल कर ली है। दरअसल, क्रिटिकलिटी वह स्टेज है, जिसमें रिएक्टर पहली बार सेल्फ-सस्टेनिंग न्यूक्लियर चेन रिएक्शन में सफलता हासिल करता है। इस स्टेज का मतलब है रिएक्टर का ऑपरेशन फेज में पहुंचना। भारत की न्यूक्लियर एनर्जी जर्नी में यह एक ऐतिहासिक माइलस्टोन है। और बड़ी बात ये भी कि परमाणु रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से निर्मित है। साथियो, इसे ब्रीडर रिएक्टर क्यों कहते हैं? इसके पीछे भी एक वजह है। यह एक ऐसा सिस्टम है, जो ऊर्जा के उत्पादन के साथ-साथ भविष्य के लिए नया ईंधन भी खुद ही तैयार करता है।”

कलपक्कम में स्थापित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) का ‘क्रिटिकलिटी’ स्तर तक पहुंचना किसी भी दृष्टि से साधारण उपलब्धि नहीं है। यह वह क्षण होता है, जब रिएक्टर के भीतर परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया स्थिर और नियंत्रित रूप से स्वयं चलने लगती है। यहीं से ऊर्जा उत्पादन की वास्तविक यात्रा शुरू होती है। इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि भारत आज जटिल तकनीकों को समझने और विकसित करने में इतना सक्षम हो चुका है कि उसे इस दिशा में किसी अन्य देश के सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। निश्चित ही फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तकनीक को समझना जितना जटिल है, उसका महत्व उतना ही व्यापक है।

दुनिया के कई विकसित देशों ने इस तकनीक को हासिल करने के लिए दशकों तक प्रयास किए। अमेरिका, जापान, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों ने इस दिशा में अरबों डॉलर खर्च किए, किंतु विभिन्न तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों के कारण वे इस तकनीक को व्यापक स्तर पर लागू नहीं कर सके। इसके विपरीत, भारत ने सीमित संसाधनों के बावजूद इस दिशा में सफलता प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दृष्टि और निरंतर प्रयास से किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

भारत की इस सफलता के पीछे सात दशक की वैज्ञानिक यात्रा और दूरदर्शी सोच छिपी है। महान वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने जिस तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की नींव रखी थी, वह आज अपनी सार्थकता सिद्ध कर रहा है। इस कार्यक्रम का पहला चरण प्राकृतिक यूरेनियम से ऊर्जा और प्लूटोनियम उत्पादन पर आधारित है। दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के माध्यम से अधिक ईंधन तैयार किया जाता है, जबकि तीसरे चरण में थोरियम आधारित रिएक्टरों के जरिए दीर्घकालिक ऊर्जा उत्पादन सुनिश्चित किया जाता है।

यहां जान लें कि भारत के संदर्भ में थोरियम का महत्व अत्यधिक है। देश में यूरेनियम के भंडार सीमित हैं, पर थोरियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। विश्व के कुल थोरियम भंडार का लगभग एक चौथाई हिस्सा भारत में पाया जाता है। फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तकनीक इस थोरियम को उपयोगी ईंधन में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इससे ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि तो होगी ही, साथ में भारत की विदेशी ईंधन पर निर्भरता भी कम होगी।

कलपक्कम में स्थापित 500 मेगावाट क्षमता वाला यह रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित किया गया है। इसका डिजाइन और अनुसंधान भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जबकि निर्माण और संचालन भी देश के ही संस्थानों द्वारा किया जा रहा है। यह उपलब्धि ‘आत्मनिर्भर भारत’ की अवधारणा को साकार करती है और यह दर्शाती है कि भारत अब तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस परियोजना से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए कहा भी कि “मार्च 2024 का वह समय भी याद है, जब मैं कलपक्कम में रिएक्टर की कोर लोडिंग का साक्षी बना था। मैं उन सभी को बधाई देता हूँ, जिन्होंने, भारत के परमाणु कार्यक्रम में अपना अमूल्य योगदान दिया है। देशवासियों का जीवन बेहतर और आसान बनाने के लिए उनका यह प्रयास बहुत ही सराहनीय है। इससे विकसित भारत के हमारे संकल्प को भी एक नई ऊर्जा मिलेगी।”

आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट जैसी दोहरी चुनौतियों से जूझ रही है, तब फास्ट ब्रीडर रिएक्टर जैसी तकनीकें एक स्थायी समाधान के रूप में उभर रही हैं। भारत के लिए यह उपलब्धि एक नई ऊर्जा अर्थव्यवस्था की शुरुआत भी है। यदि आने वाले वर्षों में इस तकनीक का विस्तार किया जाता है और देशभर में ऐसे रिएक्टर स्थापित किए जाते हैं तो भारत वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता दिखेगा।

कहना होगा कि ऊर्जा के क्षेत्र में यह बदलाव भारत की आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक विकास और सामाजिक प्रगति को नई दिशा देगा। आज यह वैज्ञानिक उपलब्धि एक ऐसे भविष्य की आधारशिला है, जहां भारत आत्मनिर्भर, सशक्त और वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में विश्व के सभी देशों के बीच आगे की पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है। इसके लिए देश के शीर्ष नेतृत्व और वैज्ञानिकों को जितना धन्यवाद दिया जाए, निश्चित ही वह उतना ही कम होगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी