प्रधानमंत्री मोदी की पांच देशों की यात्रा और उसके हासिल
सियाराम पांडेय 'शांत'
प्रधानमंत्री मोदी पांच देशों की यात्रा कर भारत वापस आ गए हैं। उनकी यह 6 दिवसीय यात्रा प्रारंभ से लेकर अंत तक चर्चा के केंद्र में रही। अपने ही देश में उन पर तरह-तरह के फिकरे कसे गए। कांग्रेस ने तो उन्हें गद्दार तक कह दिया। एक ओर जहां नार्वे, नीदरलैंड, स्वीडन, इटली और संयुक्त अरब अमीरात में उन्हें हाथोंहाथ लिया गया, भारत के साथ अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए, वहीं भारत में प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध विषवमन समझ से परे है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा और उसके हासिल पर चर्चा करें तो प्रधानमंत्री मोदी को विकल्पहीनता बिल्कुल पसंद नहीं। वे चुनौतियों का मुक्त हृदय से स्वागत करते हैं। संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की उनकी यात्रा को कमोबेश इसी आलोक में देखा-समझा जा सकता है। यह सच है कि उनकी यह यात्रा ऐसे दौर में हुई है, जब उन्होंने देशवासियों से डीजल-पेट्रोल बचाने की अपील की थी। मंत्रियों से विदेश यात्रा से बचने की अपील की थी। देश में उनकी अपील पर अमल शुरू भी हो गया है लेकिन उन्होंने और उनके पीछे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने विदेश के लिए उड़ान भरकर देश को तो विस्मित किया ही, विपक्ष को सरकार के विरोध का मौका दे दिया है।
एक सच यह भी है कि ईरान और अमेरिका के युद्ध और अमेरिका-चीन वार्ता की विफलता के बाद पीएम नरेंद्र मोदी को इस बात का अहसास हो गया है कि आने वाला समय भारत के लिए बहुत आसान नहीं है। जिस तरह डीजल-पेट्रोल और गैस की कीमतें बढ़ रही हैं और होर्मुज स्ट्रेट का संकट फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है, उसे देखते हुए एक दरवाजा बंद होने से पहले नए दरवाजों की उनकी तलाश वाजिब भी है। आइसलैंड, फिनलैंड और डेनमार्क के प्रधानमंत्रियों के साथ अलग-अलग बैठकें कर उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा, व्यापार, सतत विकास और डिजिटलीकरण के क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती के जो प्रयास किए हैं, उसके सकारात्मक परिणामों को नकारा नहीं जा सकता। तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन से ठीक पहले उन्होंने आइसलैंड की प्रधानमंत्री क्रिस्ट्रन फ्रॉस्टडॉटिर, फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ओर्पाे और डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के साथ बातचीत में तीनों नार्डिक देशों की विशेषताएं तो बताईं ही, भू-तापीय ऊर्जा तथा कार्बन कैप्चर और स्टोरेज जैसे मुद्दों पर भी गहन मंथन किया।
आपसी हितों से संबद्ध क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी विचार विमर्श किया। फिनलैंड के प्रधानमंत्री ओर्पाे के साथ बैठक में उन्होंने व्यापार और निवेश, डिजिटलीकरण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता , 5जी और 6जी, क्वांटम प्रौद्योगिकियों, नवीकरणीय ऊर्जा और चक्रीय अर्थव्यवस्था में सहयोग पर चर्चा की तो इस बीच दोनों देशों के बीच सितंबर 2026 में गुजरात के गांधीनगर में संयुक्त रूप से वर्ल्ड सर्कुलर इकोनॉमिक फोरम की मेजबानी करने पर सहमति भी बनी। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के साथ उन्होंने नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपाय, जल प्रबंधन, हरित परिवहन, डिजिटलीकरण और खाद्य प्रसंस्करण सहित सहयोग के क्षेत्रों पर चर्चा की। डेनमार्क के पेंशन फंड को भारत में अपने निवेश का विस्तार करने के लिए आमंत्रित किया। उन्हें यह विश्वास दिलाने की भी कोशिश की कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ होगा। भारत और डेनमार्क के बीच वाराणसी में स्मार्ट लेबोरेटरी आन क्लीन रिवर्स की स्थापना के लिए सहयोग का भी जिक्र करना वे नहीं भूले।
नॉर्डिक देशोंं में डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन शामिल हैं। पांचों नॉर्डिक देशों की संयुक्त जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 1.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है और वे नवीकरणीय ऊर्जा तथा सतत समुद्री शासन के वैश्विक मानकों में अग्रणी हैं। ओस्लो में आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में मोदी और नॉर्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड तथा स्वीडन के नेताओं ने भाग लिया। भारत और आइसलैंड के बीच घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध हैं और आइसलैंड के लोग योग, शास्त्रीय संगीत, नृत्य, फिल्मों और खान-पान सहित भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि रखते हैं। वर्तमान में लगभग 600 भारतीय नागरिक आइसलैंड में रह रहे हैं। मार्च 2024 में नयी दिल्ली में भारत और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (ईएफटीए) के बीच हुए व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (टीईपीए) पर हस्ताक्षर हो चुके थे। इससे द्विपक्षीय आर्थिक साझेदारी में बढ़ोतरी हुई है। स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टाइन और नॉर्वे के साथ आइसलैंड ईएफटीए के चार सदस्य देशों में से एक है।
हेलसिंकी स्थित भारतीय दूतावास की वेबसाइट की मानें तो भारत में फिनलैंड की 100 से अधिक कंपनियों का कारोबार है। नोकिया, कोने एलिवेटर्स, मेट्सो आउटोटेक, वार्सिला, यूपीएम, लिंडस्ट्रॉम, फोर्टम, अहल्स्ट्रॉम और एल्कोटेक जैसी बड़ी फिनिश कंपनियों के भारत में विनिर्माण संयंत्र हैं। फिनलैंड में भारतीय मूल के लगभग 33,445 लोग रहते है। लगभग 2,400 भारतीय छात्र फिनलैंड के विश्वविद्यालयों में अध्ययनरत हैं। डेनमार्क की कई प्रमुख कंपनियों ने मेक इन इंडिया योजना के तहत नए कल-कारखाने लगे हैं। डेनमार्क की प्रमुख निवेश कंपनियों में एपी मोलर-मेर्स्क ग्रुप शामिल है, जो भारत के कंटेनर व्यापार का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। डेनमार्क में 22 हजार भारतीय रहते हैं, इनमें आईटी पेशेवर, डॉक्टर, इंजीनियर, वित्त और बैंकिंग पेशेवर, शिक्षाविद और छात्र शामिल हैं।
दुनिया के छठवें बड़े तेल उत्पादक देश नार्वे के साथ हुए भारत के नौ समझौते दोनों देशों के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। नरेंद्र मोदी की इस यात्रा में एक तरह से उन्होंने देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए न केवल ने विकल्प तलाशे हैं बल्कि उन्हें भारत सापेक्ष बनाने की भी कोशिश की है।
नई 'ग्रीन स्ट्रेटजिक पार्टनरशिप' को उच्च स्तर पर ले जाने की पहल की है। समुद्री सहयोग, हरित प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, डिजिटल विकास और वैज्ञानिक अनुसंधान सहित कई क्षेत्रों में सहयोग को मजबूती देने के विचार से दोनों देशों के मध्य हुए नौ अनुबंध दोनों देशों के आर्थिक, व्यापारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों को मुकम्मल ऊंचाई देंगे, इसमें किसी को भी रंच मात्र का संदेह नहीं होना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिनों की यह नॉर्वे यात्रा इसलिए भी बेहद खास रही क्योंकि नार्वे ने इस अवसर पर भारत की हिन्द प्रशांत महासागर योजना में शामिल होने की घोषणा की। भारत की ओर से भी उसे आश्वस्त किया गया कि भारत अगले साल आयोजित होने वाले 'नॉर शिपिंग' कार्यक्रम में हिस्सा लेगा, वह भी भारतीय मंडप के साथ। यह दोनों देशों की ओर से की गई बड़ी घोषाएं हैं जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। दोनों देशों की सरकार के बीच जिन तीन प्रमुख समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं, उनमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और नार्वें की अंतरिक्ष एजेंसी के बीच बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग और अन्वेषण में सहयोग हेतु रूपरेखा समझौता, भारत और नॉर्वे के विदेश मंत्रालयों के बीच डिजिटल विकास साझेदारी पर समझौता ज्ञापन तथा स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग के लिए नॉर्वे और भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के मध्य समझौता शामिल है। व्यापार और संस्थागत सहयोग आधारित कई अहम समझौतों को अंतिम रूप दिया गया है।
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और नॉर्वेजियन जियोटेक्निकल संस्थान के बीच सुरंग निर्माण, ढलान स्थिरता और क्षमता निर्माण से संबंधित विशेष परामर्श सेवाओं के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए हैं। भारत के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग और नॉर्वे की अनुसंधान परिषद के बीच हुआ प्रौद्योगिकी सहयोग समझौता भी काफी अहम है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैज्ञानिक अनुसंधान और हरित प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़ाने के लिहाज से भारत की वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद और नॉर्वे की सिंटेफ संस्था ने वर्ष 2026 से 2029 तक की गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिए सहयोग समझौता किया है। उभय पक्षों ने समुद्री ऊर्जा, जिसमें अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजना पर भी दस्तखत किए हैं।
हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान और नॉर्वे की एमराल्ड जियोमॉडलिंग एएस के बीच वैज्ञानिक और व्यावसायिक सहयोग के लिए भी एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए हैं। ये घोषणाएं और अनुबंध दोनों देशों के बीच हरित विकास, समुद्री सहयोग, स्वच्छ ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और अनुसंधान आधारित साझेदारी को नई गति देने वाली हैं, इस सच को नकारा नहीं जा सकता।
भारत-नॉर्वे व्यापार और अनुसंधान शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों के हितधारकों को टीईपीए के तहत 100 अरब डॉलर के निवेश लक्ष्य तथा भारत में 10 लाख रोजगार सृजन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करने चाहिए। जहाज निर्माण एक ऐसा क्षेत्र है जो व्यापक और असीम संभावनाएं प्रदान करता है। शिखर सम्मेलन में नॉर्वे के क्राउन प्रिंस हाकोन के अलावा 50 से अधिक कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ-साथ दोनों देशों के व्यापार और अनुसंधान क्षेत्रों के 250 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हुए।
प्रधानमंत्री मोदी की यात्राएं सैर सपाटे के लिए नहीं होती, वहां वे अपने हर पल का भारत के समग्र हित में सहयोग करते हैं। वे अपनी विदेश यात्रा टाल भी सकते थे लेकिन जहां तक किसी सम्मेलन की बात है तो उसकी योजना वर्षों पूर्व से बनती है। इस पर भी विचार किए जाने की जरूरत है। विरोध के लिए विरोध करना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है।
प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर जाते हैं तो उनकी हर गतिविधि में विविधता होती है, वे मेजबान देशों के नेताओं को अगर उपहार भी देते है तो उसमें भी एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव के सूत्र तलाशते हैं, हर बार वे ऐसा करते रहे हैं, इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया है। इस तरह से वे भारतीय उत्पादों की विदेशों में ब्रांडिंग करते हैं जिससे भविष्य के लिए व्यापार संभावनाओं का एक नया आकाश खुल सके।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

