तर्पण, पितृस्मरण, आध्यात्मिक अनुभूति के अद्भुत संगम हैं नर्मदा तट
- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारतीय सनातन परंपरा में नदी जीवन है, संस्कृति है, मातृत्व है, तप है और लोकमंगल की निरंतर प्रवाहित चेतना है। इसी परंपरा में मां नर्मदा का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। नर्मदा तट पर किया गया तर्पण मनुष्य को अपने पितरों से जोड़ता है और जीवन की उस अखंड परंपरा के प्रति कृतज्ञ बनाता है, जिसके कारण वर्तमान पीढ़ी अस्तित्व में आई। अमरकंटक में मां नर्मदा के उद्गम का दर्शन, तट पर श्राद्ध और तर्पण, शिवस्वरूप नर्मदेश्वर का पूजन तथा नर्मदा परिक्रमा मिलकर ऐसा आध्यात्मिक संसार रचते हैं, जहां जल श्रद्धा बन जाता है, तिल स्मृति का प्रतीक बन जाता है और नदी स्वयं सनातन जीवनधारा का रूप धारण कर लेती है।
वस्तुत: ‘तर्पण’ शब्द का मूल भाव तृप्ति से जुड़ा है। सनातन संस्कार परंपरा में जल अर्पित करते हुए देवताओं, ऋषियों और पितरों का स्मरण किया जाता है। पितृ तर्पण मनुष्य को यह बोध कराता है कि उसका वर्तमान अकेला नहीं है। उसके पीछे माता-पिता, पूर्वजों, गुरुजनों, ऋषियों और असंख्य पीढ़ियों की स्मृतियां विद्यमान हैं। पितृपक्ष में तर्पण की परंपरा इसी भाव को विशेष गहराई देती है। जल, तिल और कुश के माध्यम से पितरों का स्मरण करते समय व्यक्ति अपने वंश की स्मृति को जीवित रखता है। यह संस्कार मनुष्य को अपनी जड़ों से जोड़ता है और जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करता है।
नर्मदा के तट पर यही तर्पण धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व ग्रहण कर लेता है। पद्म पुराण के नर्मदा-अमरकंटक प्रसंग में नर्मदा में देवताओं और पितरों के तर्पण का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। शास्त्रीय विधि से श्राद्ध तथा तिल और जल से पितरों एवं देवताओं का तर्पण करने की बात कही गई है। स्कंद पुराण के रेवाखंड में नर्मदा माहात्म्य का वर्णन अत्यंत प्रभावशाली ढंग से हुआ है। पहले नर्मदा को ग्राम और वन, हर स्थान पर पुण्यदायिनी बताया गया है। उसके बाद प्रसिद्ध श्लोक आता है :
“त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्।
सद्यः पुनाति गाङ्गेयं दर्शनादेव नार्मदम्॥”
अर्थात् सरस्वती का जल तीन दिनों में, यमुना का जल एक सप्ताह में और गंगा का जल तत्काल पवित्र करने वाला माना गया है; नर्मदा का दर्शन मात्र पवित्रकारी बताया गया है।(श्रीस्कन्दमहापुराण, अवन्तीखण्ड, रेवाखण्ड, अध्याय 21, श्लोक 6। परंपरागत रूप से महर्षि वेदव्यास प्रणीत पुराण)। यहां दर्शन का आध्यात्मिक अर्थ भी महत्वपूर्ण है। भारतीय परंपरा में दर्शन आंखों से किसी दृश्य को देखने तक सीमित न होकर व्यापक परिप्रेक्ष्य में आया है। दर्शन में श्रद्धा, भाव, समर्पण और आत्मानुभूति का समावेश है, इसलिए नर्मदा दर्शन को मन की शुद्धि और आत्मचिंतन से जोड़कर देखा गया है।
उसी रेवाखंड के अगले श्लोकों में अमरकंटक को पुण्य और सिद्धि से जुड़ा क्षेत्र बताया गया है। देवता, गंधर्व और तपस्वी ऋषियों के यहां तपस्या करने का वर्णन आता है। अमरकंटक को “सिद्धिक्षेत्र” कहा गया है और इसे देवताओं तथा ऋषियों से संबंधित पवित्र पर्वत के रूप में चित्रित किया गया है। पद्म पुराण के स्वर्गखण्ड में नर्मदा और अमरकंटक का वर्णन इससे आगे बढ़कर श्राद्ध और तर्पण से जोड़ता है। अध्याय 79 का संबंधित प्रसंग नर्मदा में देवताओं तथा पितरों के तर्पण से विशेष पुण्यफल का उल्लेख करता है। अमरकंटक में स्नान के बाद शास्त्रीय विधि से श्राद्ध तथा तिल और जल से पितरों एवं देवताओं के तर्पण की बात कही गई है। (श्रीमद् पद्मपुराण, स्वर्गखण्ड, अध्याय 79, “जम्बूमार्ग आदि तीर्थ, नर्मदा नदी, अमरकण्टक पर्वत तथा कावेरी-संगम की महिमा”, परंपरागत रूप से महर्षि वेदव्यास प्रणीत, गीताप्रेस-आधारित संक्षिप्त पद्मपुराण, पृष्ठ 353)
पितृऋण : अपने अस्तित्व की जड़ों को प्रणाम
सनातन धर्म में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण की अवधारणा मनुष्य को उसके व्यापक उत्तरदायित्व का बोध कराती है। पितृऋण का अर्थ है उन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता जिनसे जीवन, वंश, संस्कार और सामाजिक परंपरा आगे बढ़ी। श्राद्ध इस कृतज्ञता का संस्कार है और तर्पण उसका जलमय स्वरूप है । जब श्रद्धालु नर्मदा के तट पर जल की अंजलि बनाता है और पितरों का स्मरण करता है, तब वह अपने अतीत को वर्तमान से जोड़ता है। तर्पण का यह भाव मनुष्य को अपने परिवार और वंश की स्मृतियों के प्रति सजग करता है। यह संस्कार जीवन पीढ़ियों की सतत यात्रा को अभिव्यक्त करता है।
वस्तुत: नर्मदा के प्रवाह के सामने यह अनुभूति और भी गहरी हो जाती है। जैसे नदी का जल एक क्षण के लिए भी स्थिर नहीं रहता, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की ओर प्रवाहित होता रहता है। यही इसका नित्य चिंतन यहां है। धार्मिक मान्यताओं में नर्मदा को भगवान शिव की मानस पुत्री कहा गया है। मैकाल पर्वत से प्रकट होने के कारण वह मैकलसुता कहलाती हैं। प्रवाह में पत्थरों के स्पर्श से उत्पन्न कल-कल ध्वनि के कारण उनका नाम रेवा भी प्रसिद्ध हुआ।नर्मदा के नाम ही उसके व्यक्तित्व का परिचय देते हैं। मैकलसुता में पर्वत की स्मृति है, रेवा में निरंतर गति है और मां नर्मदा में मातृत्व की अनुभूति।
शिव और नर्मदा का संबंध भारतीय धार्मिक चेतना में अत्यंत गहरा है। इसी कारण नर्मदा के तट पर शिव आराधना, तपस्या और परिक्रमा की परंपरा सदियों से चलती आई है। नर्मदा की धार्मिक पहचान का एक अत्यंत लोकप्रिय भाव है और वह है “नर्मदा का कंकर-कंकर शंकर।” नर्मदा से प्राप्त प्राकृतिक शिलाखंडों को शैव परंपरा में नर्मदेश्वर शिवलिंग के रूप में पूजने की परंपरा है। प्राकृतिक रूप से निर्मित इन शिवस्वरूप शिलाओं की पूजा भारतीय धार्मिक जीवन में प्रकृति और परमात्मा के संबंध को व्यक्त करती है।
यह भाव सनातन दर्शन के उस सूत्र से जुड़ता है जिसमें परम तत्व की उपस्थिति प्रकृति के कण-कण में अनुभव की जाती है। नदी का पत्थर श्रद्धा से शिवस्वरूप बन जाता है और नदी का जल अभिषेक का पवित्र माध्यम। इस प्रकार नर्मदा का प्रत्येक तट शिवभक्ति और प्रकृति आराधना के बीच एक सेतु जैसा दिखाई देता है।
नर्मदा परिक्रमा : देह की यात्रा और आत्म-साक्षात्कार
नर्मदा परिक्रमा भारतीय तीर्थ परंपरा की अत्यंत विशिष्ट साधना है। परंपरागत रूप से साधक नर्मदा के एक तट से यात्रा आरंभ करता है, नदी के प्रवाह का अनुसरण करता है और दूसरे तट से लौटते हुए परिक्रमा पूर्ण करता है। साधु-संतों की परंपरा में इसकी अवधि तीन वर्ष, तीन महीने और तेरह दिन बताई जाती है। विभिन्न परंपराओं में परिक्रमा के नियमों और आचरण की अलग-अलग विधियां भी मिलती हैं। नर्मदा परिक्रमा में साधक पैरों से दूरी तय करता है, मन से अहंकार छोड़ता है और प्रकृति के साथ रहने का अभ्यास करता है। मार्ग में मिलने वाला प्रत्येक घाट, प्रत्येक आश्रम, प्रत्येक मंदिर और प्रत्येक ग्राम उसके लिए साधना का पड़ाव बन जाता है। यहां नर्मदा परिक्रमा का दर्शन यह सिखा रहा होता है कि तीर्थ मनुष्य को बाहर की यात्रा के साथ भीतर की यात्रा भी कराता है।
सनातन जीवनदृष्टि में वन, पर्वत और नदी साधना के स्वाभाविक क्षेत्र रहे हैं। ऋषि आश्रमों का नदी और वन से निकट संबंध इसी सांस्कृतिक स्मृति का प्रमाण है। अमरकंटक में नर्मदा का उद्गम और आसपास का वन क्षेत्र इसी प्राचीन भारतीय दृष्टि को जीवंत रूप देता है, जहां प्रकृति पूज्य है और उसका संरक्षण धर्मबोध से जुड़ा है। पितरों को जल अर्पित करते हुए मनुष्य अपने भीतर कृतज्ञता जगाता है। नर्मदा को प्रणाम करते हुए वह प्रकृति के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है। शिवस्वरूप नर्मदेश्वर का पूजन करते हुए वह सृष्टि में व्याप्त दिव्य चेतना का अनुभव करता है। नर्मदा परिक्रमा करते हुए वह स्वयं को अनुशासन, धैर्य और साधना के मार्ग पर ले जाता है। इस प्रकार नर्मदा भारतीय सनातन चेतना में एक साथ मां, नदी, तीर्थ, तपोभूमि, शिवधारा और पितृस्मरण की पवित्र भूमि बन जाती है।
स्कंद पुराण में कहा गया “दर्शनादेव नार्मदम्” नर्मदा के प्रति उस गहन श्रद्धा को व्यक्त करता है, जो हजारों वर्षों से भारतीय मानस में प्रवाहित है। पद्म पुराण में नर्मदा और अमरकंटक के संदर्भ में तर्पण, श्राद्ध, तिल और जल का विधान इस आध्यात्मिक परंपरा को और गहरा करता है। “नर्मदे हर” इसी समग्र भाव का उद्घोष है। यह मां नर्मदा को प्रणाम है, पितरों का स्मरण है, शिव को नमन है और उस सनातन जीवनधारा के प्रति कृतज्ञता है, जो पर्वत से निकलकर समुद्र तक जाती हुई पीढ़ियों को जोड़ती चली जाती है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से सबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

