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मोहन सरकार का संवेदना से सशक्तिकरण तक का निर्णय है दिव्यांग शिक्षा में मानदेय वृद्धि

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मोहन सरकार का संवेदना से सशक्तिकरण तक का निर्णय है दिव्यांग शिक्षा में मानदेय वृद्धि


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

समाज की वास्तविक प्रगति का मापदंड इस बात से तय होता है कि वह अपने सबसे कमजोर वर्गों के प्रति कितना संवेदनशील है। ‘दिव्यांगजन’ वे लोग हैं, जो जन्म से या जीवन की किसी दुर्घटना के कारण शारीरिक या मानसिक सीमाओं से जूझते हैं, परंतु उनके सपने, उनकी आकांक्षाएं और उनका आत्मसम्मान किसी भी सामान्य व्यक्ति से कम नहीं होता। ऐसे में जब डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार ने दिव्यांगता के क्षेत्र में कार्यरत अतिथि शिक्षकों के लिए 18 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय स्वीकृत किया, तब यह निश्चित तौर पर संवेदनशील शासन का जीवंत उदाहरण बन गया है। वस्तुत: यह निर्णय उन अनगिनत शिक्षकों और बच्चों के जीवन में आशा की नई किरण लेकर आया है, जोकि वर्षों से उपेक्षा और संघर्ष का सामना कर रहे थे।

देखाजाए तो ‘दिव्यांगता’ को अक्सर शारीरिक अक्षमता के रूप में देखा जाता है, जबकि यह उससे कहीं अधिक व्यापक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है। एक दिव्यांग व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में हर कदम पर बाधाओं का सामना करना पड़ता है; चाहे वह शिक्षा हो, रोजगार हो या सामाजिक स्वीकृति। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व की लगभग 15 प्रतिशत जनसंख्या किसी न किसी रूप में ‘दिव्यांगता’ से प्रभावित है। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि यह कोई सीमित वर्ग न होकर एक बड़ा वैश्विक समुदाय है, जिसकी उपेक्षा मानवता के साथ अन्याय के समान है।

भारत और मध्य प्रदेश की स्थिति

भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 2.21 प्रतिशत लोग दिव्यांग हैं, विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। मध्य प्रदेश में भी यह प्रतिशत लगभग दो के आसपास है, जो लाखों लोगों के जीवन की वास्तविकता को दर्शाता है। इन आंकड़ों के पीछे छिपी सच्चाई एक यह भी है कि इन लाखों लोगों में अनेकों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में समान अवसर प्राप्त नहीं हो पाते हैं। ऐसे में यदि सरकार इनकी शिक्षा पर विशेष ध्यान देती है, तब अवश्य ही सीधे उनके जीवन की दिशा बदलने जैसा बदलाव समय के साथ देखने को मिलता है।

यह हमें स्वीकारना ही होगा कि एक दिव्यांग बालक या बालिका को शिक्षित करना सामान्य प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए विशेष प्रशिक्षण, धैर्य, तकनीकी साधनों और व्यक्तिगत ध्यान की आवश्यकता होती है। एक शिक्षक को सिर्फ विषय पढ़ाने तक सीमित न रहते हुए बच्चे की मानसिक स्थिति, उसकी गति और उसकी विशेष आवश्यकताओं को समझकर शिक्षण करना पड़ता है। निश्चित ही यह कार्य अत्यधिक श्रमसाध्य और भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण है। इन परिस्थितियों में कहना होगा कि शिक्षकों का योगदान सेवा और समर्पण का अनुपम उदाहरण के रूप में सामने आता है।

शिक्षक बदलाव के वास्तविक नायक हैं

दिव्यांग शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शिक्षक समाज के अनदेखे नायक होते हैं। वे बच्चों को अक्षरज्ञान कराने के साथ ही उन्हें आत्मनिर्भर बनने का साहस और आत्मविश्वास भी प्रदान करते हैं। वे हर दिन उन सीमाओं को चुनौती देते हैं, जिन्हें समाज ने ‘असंभव’ मान लिया है। किंतु जब लंबे समय तक इन्हीं शिक्षकों को कम मानदेय और अस्थिरता का सामना करना पड़ता है तब स्वभाविक है कि उनके मनोबल और इस क्षेत्र की गुणवत्ता दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता ही है।

आज आप कह सकते हैं कि इस स्थिति में मध्य प्रदेश की डॉ. मोहन सरकार द्वारा 18 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय देने का निर्णय इस स्थिति को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह आर्थिक सहायता प्रदान करने के साथ ही शिक्षकों के कार्य को मान्यता और सम्मान भी देता है। यह तो सर्वमान्य बात है कि जब किसी शिक्षक को उसके कार्य के अनुरूप पारिश्रमिक मिलता है, तब वह अधिक समर्पण और ऊर्जा के साथ कार्य करता है। इससे शिक्षा की गुणवत्ता में भी स्वाभाविक रूप से सुधार होता है।

इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इससे दिव्यांग शिक्षा के क्षेत्र में योग्य और प्रशिक्षित लोगों को आकर्षित किया जा सकेगा। पहले कम वेतन के कारण इस क्षेत्र में आने से लोग हिचकिचाते थे, किंतु अब बेहतर मानदेय मिलने से यह क्षेत्र अधिक आकर्षक बन सकेगा। इससे इस क्षेत्र में शिक्षकों की संख्या बढ़ेगी और उनकी गुणवत्ता भी बेहतर होगी, जिसका सीधा लाभ बच्चों को मिलेगा।

समावेशी समाज की ओर मजबूत कदम

इसका एक पहलु ये भी है कि यह निर्णय सिर्फ शिक्षकों तक सीमित नहीं है, यह एक समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में उठाया गया कदम है। जब दिव्यांग बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी तो वे भी समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकेंगे। वे आत्मनिर्भर बनेंगे, रोजगार प्राप्त करेंगे और समाज में अपनी पहचान स्थापित करेंगे। यही किसी भी विकसित समाज की पहचान होती है।

मोहन सरकार की इस पहल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दिव्यांगता के प्रति समाज के दृष्टिकोण में बदलाव को दर्शाती है। अब दिव्यांगजन को दया या सहानुभूति के पात्र के रूप में न देखकर अधिकार और अवसर के हकदार नागरिक के रूप में देखा जा रहा है। यह सोच आधुनिक और प्रगतिशील शासन की पहचान है और यही वास्तविक सामाजिक न्याय की नींव है।

अत: दिव्यांग शिक्षा में मानदेय वृद्धि, कह सकते हैं कि मध्य प्रदेश सरकार वह निर्णय है जोकि एक सकारात्मक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है; वस्तुत: एक ऐसी विचारधारा, जिसमें हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान देने की प्रतिबद्धता है। यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत और समावेशी समाज की नींव रखेगा। फिलहाल मोहन सरकार के इस निर्णय से यही आशा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी