लीक पर चयनित सोच, केंद्र सरकार से इस्तीफा मांग रही कांग्रेस क्या अपनी सरकारें भंग करेगी ?
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
देश के करोड़ों युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएँ उनके सपनों, वर्षों की मेहनत और परिवार की उम्मीदों का आधार होती हैं। जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तब लाखों अभ्यर्थियों का विश्वास टूटता है। यही कारण है कि पेपर लीक का मुद्दा आज राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है। किंतु दुर्भाग्य यह है कि इस गंभीर विषय पर भी राजनीतिक दल अक्सर सिद्धांत से अधिक सुविधा का सहारा लेते दिखाई देते हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर पेपर लीक को लेकर हमलावर हैं। उनका कहना है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है और सरकार जवाबदेही से बच रही है। विपक्ष का यह अधिकार भी है कि वह सरकार से कठोर प्रश्न पूछे। किंतु लोकतंत्र में यही कसौटी विपक्ष पर भी समान रूप से लागू होती है। यदि पेपर लीक राष्ट्रीय शर्म का विषय है, तो क्या यह प्रश्न सिर्फ केंद्र सरकार से पूछा जाएगा या उन राज्यों से भी, जहाँ कांग्रेस अथवा उसके सहयोगी दलों की सरकारों के दौरान ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं?
इसी संदर्भ में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के बयान को साझा करते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कांग्रेस के चयनात्मक रवैये पर प्रश्न उठाया है। उन्होंने झारखंड में हिंदी और विज्ञान परीक्षा, तेलंगाना में इंटरमीडिएट भाषा परीक्षा, एसएससी भाषा परीक्षा, तमिलनाडु में बी.एड. परीक्षा, पश्चिम बंगाल में पुलिस कांस्टेबल भर्ती, पंजाब में ग्रुप-डी भर्ती, केरल की लोक सेवा आयोग परीक्षाओं तथा कर्नाटक की परीक्षा से जुड़े मामलों का उल्लेख किया है। वे बताते हैं कि गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा अनियमितताओं की लंबी सूची रही है। उनका प्रश्न था कि यदि हर पेपर लीक शर्मनाक है, तब फिर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी समान क्यों नहीं है?
वस्तुत:, उपलब्ध सार्वजनिक विवरण यह संकेत देते हैं कि पेपर लीक की समस्या किसी एक दल, एक सरकार या एक दशक तक सीमित नहीं रही। वर्ष 2004 से 2014 के बीच केंद्र तथा विभिन्न राज्यों में अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक अथवा गंभीर परीक्षा अनियमितताओं के मामले सामने आए। उपलब्ध सूची के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर यूपीएससी, एसएससी, एनडीए, संयुक्त प्रवेश परीक्षा, आरबीआई, आईबीपीएस, कैट, गेट, क्लैट, रेलवे भर्ती, डीआरडीओ और अन्य प्रतिष्ठित परीक्षाएँ भी विवादों से अछूती नहीं रहीं।
इसी प्रकार उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, हरियाणा, असम, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडु, झारखंड, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और अन्य राज्यों में भी विभिन्न भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद समय-समय पर सामने आए हैं। इसके बाद भी स्थिति पूरी तरह नहीं बदली। सरकार नए नियम बनाती है और अपराधी उसमें से निकलने का रास्ता तैयार करके रखता है!
उपलब्ध विवरण के अनुसार 2006 से 2024 के बीच एम्स, एआईईईई, रेलवे भर्ती, टीएनपीएससी, मुंबई विश्वविद्यालय, जम्मू-कश्मीर मेडिकल प्रवेश परीक्षा, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, राजस्थान रीट, झारखंड सीजीएल, बिहार भर्ती, राजस्थान पुलिस उपनिरीक्षक भर्ती तथा अन्य कई परीक्षाओं को लेकर विवाद सामने आए। इन मामलों के दौरान अलग-अलग समय में कांग्रेस, भाजपा और अनेक क्षेत्रीय दलों की सरकारें सत्ता में थीं। यह तथ्य इस ओर संकेत करता है कि समस्या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रही, यह पूरे परीक्षा तंत्र में गहराई तक फैली हुई है।
यहीं से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि कांग्रेस आज केंद्र सरकार से जवाब मांग रही है, तो क्या वह अपने शासनकाल या अपने सहयोगी दलों की सरकारों के दौरान सामने आए मामलों पर भी उतनी ही स्पष्टता से आत्ममंथन करेगी? क्या वह यह स्वीकार करेगी कि परीक्षा प्रणाली की कमियों ने लाखों युवाओं को प्रभावित किया? क्या वह उन राज्यों में भी समान राजनीतिक और नैतिक मानदंड लागू करने की मांग करेगी, जहाँ उसके नेतृत्व या समर्थन वाली सरकारों के दौरान ऐसी घटनाएँ हुईं?
आज जनता क्या चाहती है, जनता यह नहीं चाहती कि राजनीतिक दल एक-दूसरे के पुराने रिकॉर्ड पढ़ते रहें और उस आधार पर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते रहें! वह चाहती है कि पेपर लीक की समस्या का स्थायी समाधान निकले। यदि आज केंद्र में भाजपा सरकार है, तो उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें भविष्य में प्रश्नपत्र लीक होना लगभग असंभव हो जाए। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया घोषणा महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के युवाओं का हित सर्वोच्च प्राथमिकता है और पेपर लीक के सभी मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित किए जाएंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा तथा संबंधित विभागों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके हैं। इससे पहले भी प्रधानमंत्री ने कहा था कि पेपर लीक किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की समस्या है।
यदि यह घोषणा प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो यह वर्षों से लंबित उस मांग की पूर्ति होगी जिसमें कहा जाता रहा है कि पेपर लीक के मामलों की जांच और मुकदमे वर्षों तक नहीं चलने चाहिए। हमने इन मामलों में अक्सर देखा है कि कैसे परीक्षा रद्द होती है और दोबारा आयोजित होती है। अभ्यर्थियों का समय और धन दोनों नष्ट होते हैं, लेकिन दोषियों को सजा मिलने में लंबा समय लग जाता है। यही कारण है कि परीक्षा माफिया बार-बार सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में हम उम्मीद करें कि फास्ट ट्रैक कोर्ट इस दुष्चक्र को तोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकता है, लेकिन अकेला न्यायालय पर्याप्त नहीं होगा। प्रश्नपत्रों की एन्क्रिप्टेड डिजिटल सुरक्षा, सुरक्षित प्रिंटिंग, वितरण की आधुनिक प्रणाली, परीक्षा केंद्रों की तकनीकी निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण, भर्ती एजेंसियों की जवाबदेही और संगठित परीक्षा माफिया के आर्थिक नेटवर्क पर निर्णायक प्रहार भी बहुत आवश्यक है, इसलिए इन सभी मोर्चों पर समानांतर कार्रवाई करनी होगी। ध्यान रहे, जब तक पेपर लीक को लाभकारी अपराध माना जाता रहेगा, तब तक अपराधी नए रास्ते खोजते रहेंगे।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि कौन-सा दल किसका पुराना रिकॉर्ड पढ़कर राजनीतिक अंक हासिल करता है। आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल एक समान नैतिक मानदंड स्वीकार करें। यदि किसी भाजपा शासित राज्य में पेपर लीक होता है, तो वहाँ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कांग्रेस या किसी अन्य दल के शासन वाले राज्य में ऐसी घटना होती है, तो वहाँ भी उतनी ही सख्ती और उतनी ही राजनीतिक जवाबदेही दिखाई देनी चाहिए। युवाओं का भविष्य दलगत सीमाओं से कहीं बड़ा विषय है।
देश के करोड़ों अभ्यर्थी आज भाषण नहीं, परिणाम चाहते हैं। वे यह देखना चाहते हैं कि दोषियों को कितनी जल्दी सजा मिलती है, भर्ती प्रक्रियाएँ कितनी पारदर्शी बनती हैं और आने वाले वर्षों में क्या वास्तव में पेपर लीक की घटनाएँ रुकती हैं। आखिरकार, युवाओं के सपनों का प्रश्न किसी चुनावी रणनीति का विषय नहीं बनना चाहिए। जो भी दल सत्ता में हो, उससे जवाबदेही अपेक्षित है। जो भी विपक्ष में हो, उससे समान नैतिकता की अपेक्षा है। यदि राजनीति वास्तव में युवाओं के भविष्य की चिंता करती है, तो उसे आरोपों की प्रतिस्पर्धा छोड़कर विश्वास की पुनर्स्थापना की प्रतिस्पर्धा शुरू करनी होगी। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत होगी और यही भारत के युवाओं के साथ वास्तविक न्याय भी।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

