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विषाक्त ओटीटी का वैचारिक उद्योग: भारत और हिंदू समाज के विरुद्ध चल रहा सांस्कृतिक युद्ध

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विषाक्त ओटीटी का वैचारिक उद्योग: भारत और हिंदू समाज के विरुद्ध चल रहा सांस्कृतिक युद्ध


- कैलाश चन्द्र

भारत में मनोरंजन के नाम पर ओटीटी मंचों पर जो सामग्री परोसी जा रही है, उसे केवल रचनात्मक स्वतंत्रता का परिणाम कहकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह अब केवल वेब-श्रृंखलाओं, फिल्मों या नई पीढ़ी की पसंद का विषय नहीं रह गया है। अनेक मामलों में यह एक व्यापक सांस्कृतिक और वैचारिक प्रवृत्ति का हिस्सा दिखाई देता है, जिसके माध्यम से भारतीय समाज, उसकी परंपराओं, परिवार संस्था और विशेष रूप से हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों को एक निश्चित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जा रहा है।

ओटीटी की दुनिया में हिंसा, अश्लीलता, गाली-गलौज, अपराध और सामाजिक विघटन को केवल दिखाया ही नहीं जाता, बल्कि कई बार उन्हें सामान्य और स्वीकार्य जीवन-शैली के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह तर्क दिया जाता है कि समाज में जो कुछ मौजूद है, वही दिखाया जा रहा है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या समाज केवल अपराध, भ्रष्टाचार और विकृत संबंधों से ही बना है? क्या भारतीय जीवन में त्याग, करुणा, आस्था, परिवार, सामाजिक सहयोग, मातृत्व, शौर्य और सांस्कृतिक चेतना जैसी सकारात्मक शक्तियाँ नहीं हैं?

समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी समाज के हजारों रंगों में से बार-बार केवल उसका सबसे अंधकारमय और विकृत पक्ष ही चुना जाए। यह यथार्थ का संतुलित चित्रण नहीं, बल्कि चयनित यथार्थ की प्रस्तुति बन जाता है। अनेक लोकप्रिय श्रृंखलाओं और फिल्मों में भारतीय समाज, विशेषकर ग्रामीण और पारंपरिक समाज को इस प्रकार दिखाया जाता है मानो वहाँ केवल जातीय घृणा, अपराध, पाखंड और दमन ही मौजूद हो।

इस प्रवृत्ति का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि हिंदू समाज को अक्सर स्थायी दोषी या खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जाति, पितृसत्ता, धार्मिक पाखंड, सामाजिक हिंसा अथवा नैतिक विघटन जैसे विषयों में नकारात्मक पात्रों का संबंध प्रायः पारंपरिक या धार्मिक पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है। इससे धीरे-धीरे दर्शकों के मन में यह धारणा बन सकती है कि भारतीय परंपरा स्वयं समस्याओं की जड़ है।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि समाज की बुराइयों को दिखाना गलत नहीं है। कला और साहित्य का दायित्व ही है कि वे समाज की कमजोरियों पर प्रकाश डालें। किंतु यदि हर कथा का निष्कर्ष यही हो कि धर्म, परिवार, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत मूलतः दमनकारी हैं, तो यह आलोचना से आगे बढ़कर सभ्यतागत अभियोग का रूप ले लेता है। आत्मालोचना किसी भी समाज के विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन आत्मालोचना और आत्मद्वेष में स्पष्ट अंतर होता है।

पिछले कुछ वर्षों में जब धार्मिक प्रतीकों और आस्थाओं पर सीधे प्रहार करने वाली सामग्री का विरोध हुआ, तब अभिव्यक्ति की शैली में परिवर्तन दिखाई दिया। अब प्रत्यक्ष आक्रमण कम और अप्रत्यक्ष सांस्कृतिक विघटन अधिक दिखाई देता है। परिवार को विषैला, विवाह को बंधन, पुरुषत्व को हिंसक, परंपरा को पिछड़ा और धार्मिकता को पाखंड के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसके विपरीत सामाजिक अराजकता, नैतिक सीमाओं के विघटन और व्यक्तिगत स्वच्छंदता को आधुनिकता और स्वतंत्रता का पर्याय बताया जाता है।

यह समझना आवश्यक है कि सभ्यताओं को केवल युद्धक्षेत्र में नहीं हराया जाता। कई बार उन्हें उनकी अपनी नई पीढ़ी की चेतना में कमजोर कर दिया जाता है। यदि युवाओं को बार-बार यह बताया जाए कि उनकी संस्कृति पिछड़ी हुई है, उनका इतिहास शर्म का विषय है और उनके सामाजिक मूल्य दमनकारी हैं, तो धीरे-धीरे उनका सांस्कृतिक आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है। यही कारण है कि मनोरंजन को केवल मनोरंजन मान लेना पर्याप्त नहीं है; वह समाज की सामूहिक चेतना को भी प्रभावित करता है।

ओटीटी मंचों की पहुँच और प्रभाव को देखते हुए यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पहले मनोरंजन मुख्यतः सिनेमाघरों तक सीमित था, लेकिन अब मोबाइल, टेलीविजन, टैबलेट और लैपटॉप के माध्यम से यह सीधे घरों और व्यक्तिगत जीवन में प्रवेश कर चुका है। बच्चे, किशोर और युवा बड़ी मात्रा में ऐसी सामग्री देख रहे हैं, जो उनके दृष्टिकोण, व्यवहार और सामाजिक मान्यताओं को प्रभावित कर सकती है। एल्गोरिदम आधारित सुझाव प्रणाली इस प्रभाव को और गहरा करती है, क्योंकि दर्शक जो देखता है, उसे उसी प्रकार की और सामग्री दिखाई जाती है।

ओटीटी उद्योग प्रायः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तर्क देकर आलोचनाओं को खारिज कर देता है। निस्संदेह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण मूल्य है, लेकिन स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। यदि कोई मंच करोड़ों लोगों तक पहुँच रखता है और उनकी मानसिकता, सामाजिक दृष्टिकोण तथा सांस्कृतिक धारणाओं को प्रभावित करता है, तो उससे किसी प्रकार की नैतिक जवाबदेही की अपेक्षा करना अनुचित नहीं है।

समाधान कठोर नियंत्रण या सेंसरशिप में नहीं है। समाधान संतुलन में है। सामग्री का स्पष्ट आयु-वर्गीकरण, प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और विविध दृष्टिकोणों को स्थान देना आवश्यक है। यदि अधिकांश लोकप्रिय कथाओं में भारतीय समाज और हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों को एक ही प्रकार के साँचे में प्रस्तुत किया जा रहा है, तो इस प्रवृत्ति पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

भारतीय समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्य केवल विरोध करना नहीं, बल्कि सृजन करना है। यदि एक पक्ष लगातार कथाएँ रच रहा है और दूसरा केवल शिकायत कर रहा है, तो अंततः प्रभाव उसी का होगा जो कथा का निर्माण कर रहा है। इसलिए आवश्यकता है कि भारतीय सभ्यता, लोक-संस्कृति, परिवार, आस्था, नारी-शक्ति, सामाजिक जटिलताओं और ऐतिहासिक अनुभवों पर आधारित उच्च-गुणवत्ता की सामग्री तैयार की जाए। ऐसी सामग्री उपदेशात्मक नहीं, बल्कि कलात्मक, आधुनिक और प्रभावशाली होनी चाहिए।

इसके साथ ही मीडिया-साक्षरता को भी बढ़ाना होगा, ताकि दर्शक यह समझ सकें कि किसी कथा में क्या दिखाया जा रहा है और क्या जानबूझकर छोड़ा जा रहा है। प्रस्तुतीकरण, प्रतीकवाद और वैचारिक पूर्वाग्रहों की पहचान करने की क्षमता समाज को अधिक सजग बनाती है।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी कहानी स्वयं कहेगा या उसकी कथा दूसरे लिखेंगे? क्या परंपरा, धर्म, परिवार और सांस्कृतिक विरासत को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति ही आधुनिकता का नया मानदंड बन जाएगी? यदि ऐसा होता है तो यह केवल मनोरंजन का विषय नहीं रहेगा, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत निरंतरता का प्रश्न बन जाएगा, इसलिए समय की माँग स्पष्ट है, सजग दर्शक, उत्तरदायी मंच, वैकल्पिक सृजन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास। मनोरंजन के क्षेत्र में चल रहा यह संघर्ष केवल पर्दे पर दिखाई देने वाले दृश्यों का नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, पहचान और भविष्य की दिशा का संघर्ष भी है।

(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी