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स्मृति शेषः पद्म विभूषण तीजन बाई

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स्मृति शेषः पद्म विभूषण तीजन बाई


संजीव

चोला माटी के हे राम,

एकर का भरोसा,

द्रोणा जइसे गुरू चले गे,

करन जइसे दानी,

बाली जइसे बीर चले गे,

रावन कस अभिमानी,

चोला माटी के हे राम!

छत्तीसगढ़ी लोक गीत-नाट्य कला पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने वाली पद्म विभूषण तीजन बाई की आखिरी यात्रा के पार्श्व में इस छत्तीसगढ़ी गीत का गान किया गया। रविवार तड़के 69 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। पिछले कुछ समय से बीमार तीजन बाई रायपुर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती थीं। आज सुबह 11 बजे उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

छत्तीसगढ़ के अटारी गांव में 08 अगस्त, 1956 को जन्मीं तीजन बाई ने बालपन में ही पंडवानी गायन शुरू कर दिया था। कहते हैं कि जिस दिन उनका जन्म हुआ उस दिन लोकपर्व तीज था इसलिए माता-पिता ने उनका नाम तीजन रखा। आगे चलकर महाभारत की कथाओं को प्रभावी और अनूठे अंदाज में प्रस्तुत कर मंच पर कला का ऐसा सम्मोहक संसार रचा, जिसे देखने और उसका अनुभव करने के लिए दर्शक खिंचे चले आते थे। उनकी प्रस्तुति में ख़ास किस्म की आवाज के साथ भाव-भंगिमा और तंबूरा का विशेष महत्व था। मंच पर ज्यों ही उनका प्रदर्शन आरंभ होता, उनका तंबूरा कभी दुःशासन की बांह, कभी अर्जुन का रथ, कभी भीम की गदा तो कभी द्रौपदी के बाल में बदल कर दर्शकों को इतिहास के उस काल में पहुंचा देता जहां वे जोश, क्रोध, दर्द, उत्साह, उमंग और छलकपट की ऐतिहासिक संवेदना महसूस करते। उनके प्रशंसित प्रदर्शनों में द्रौपदी चीरहरण, दुशासन वध और भीष्म और अर्जुन के बीच महाभारत का युद्ध शामिल हैं।

उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में अपना पहला मंच प्रदर्शन किया। उस समय महिला पंडवानी गायिकाएं केवल बैठकर गा सकती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता है। जबकि पुरुष गायक खड़े होकर कापालिक शैली में गाते थे। तीजनबाई पहली महिला थीं जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन किया। एक दिन प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और तीजनबाई का जीवन बदल गया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर अनेक राष्ट्राध्यक्षों और अति विशिष्ट लोगों के सामने उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें 1987 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया। उन्हें १९९५ में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा २००७ में नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका कला पुरस्कार भी मिला था।

तीजनबाई को बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा डीलिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। 1980 के दशक में शुरू होकर उन्होंने एक सांस्कृतिक राजदूत के रूप में दुनिया भर की यात्रा की, जिसमें इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की, ट्यूनीशिया, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस जैसे देश शामिल हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश